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महात्मा गाँधी के पुस्तकालय में जिंदा हैं आम्बेडकर के विचार

महात्मा गाँधी के पुस्तकालय में जिंदा हैं आम्बेडकर के विचार

अहमदाबाद की गर्मी की एक शाम। न्योता मुदिता विद्रोही का था। सौरभ वाजपेयी के व्याख्यान को सुनने का। उन्हें ‘जनतंत्र: तब और अब’ पर बोलना था। 

अहमदाबाद की गर्मी की एक शाम। न्योता मुदिता विद्रोही का था। सौरभ वाजपेयी के व्याख्यान को सुनने का। उन्हें ‘जनतंत्र: तब और अब’ पर बोलना था। हमशहर से किसी और शहर में मिलने का आनंद तो कुछ और है ही, सुनने का उससे कहीं अलग। सो, तय किया कि जाना ही है। जगह का नाम ज़रा अटपटा था, अनक्यूबेट! इंक्युबेटर सुना है, हस्पताल में रहा करते हैं और शिक्षा संस्थानों में भी मिलते हैं। उसका उलटा अनक्यूबेट होगा।

जीपीएस में न सिर्फ़ जगह पहचानी गई बल्कि यह चेतावनी भी थी कि कहीं ऐसा न हो, आप पहुँचें और वह बंद हो जाए। यानी जहाँ से हम चले थे, वहाँ से लक्ष्य तक पहुँचने के वक़्त का अन्दाज़ कर वह हमें ज़हमत से बचाने की कोशिश ही कर रहा था। लेकिन हम निश्चिंत थे क्योंकि दावतनामे में वक़्त शायद काम का समय बीत जाने के बाद का ही था।

हम आख़िर निश्चित स्थान पर पहुँच गए। एक दक्षिण भारतीय रेस्तराँ दीख रहा था। बाहर ऊबे बैठे चौकीदार से जानना चाहा कि हम ठीक जगह पहुँचे हैं या नहीं। उसने अनक्यूबेट नाम से ही अनभिज्ञता प्रकट की। कुछ देर ख़ुद ही चारों ओर सर घुमाने के बाद भी जब कुछ नहीं पता चला तो मुदिता को फ़ोन किया। उन्होंने निश्चिंत किया कि ठीक जगह ही पहुँचे हैं, सिर्फ़ पहली मंज़िलपर जाना है।

सीढ़ियों से एक कमरे में पहुँचे। एक ख़ुशमिज़ाज नौजवान खड़ा था। मैंने इस अजीबोग़रीब नाम की जगह की ख़ासियत जानना चाही। यह एक साझा जगह है। जिसे कुछ काम करना हो, इस जगह का इस्तेमाल कर सकता है। मुफ़्त? इस सवाल पर वह बस हँसा, मैं ख़ुद एक छात्र हूँ।

बग़ल के कमरे में व्याख्यान की तैयारी चल रही थी। सौरभ आए और धीरे-धीरे श्रोता आने लगे। कमरा बहुत बड़ा न था। लेकिन वहाँ सिर्फ़ चिंतित अधेड़ न थे, नौजवान भी थे अपनी फ़िक्र के साथ। मुदिता, सौरभ, मुदिता के साथ और भी आयोजक जवान ही थे।

बातचीत ख़त्म होने के समय नीचे उतरा तो साथ कुछ युवक भी थे। मैंने देखा कि मेरे फ़ोन में उबर या ओला का ऐप न था। असमंजस छोड़कर एक से पूछा यह मानकर कि होगा ही उसके फ़ोन पर यह ऐप। उसने तुरंत डाउनलोड किया। लेकिन टैक्सी आने का नाम नहीं ले रही थी। हम गपशप करने लगे।

क्या यहाँ अक्सर आते हैं, मैंने पूछा। नहीं, पहली बार। हम दलित समूहों से जुड़े हैं। उनके ज़रिए ख़बर मिली तो आए। सब किसी न किसी कॉलेज में पढ़ते हैं। तो कॉलेज में ऐसी गोष्ठियाँ होती होंगी? “कहाँ? उसका सवाल ही नहीं पैदा होता।” सिर्फ़ मोदी मोदी होता है और एबीवीपी!

“हमारे कॉलेज के बाहर दीवार पर लिख देते हैं, लव जेहाद से हिंदू लड़कियों को बचाओ! फिर म्यूनिसिपैलिटीवाले मिटाते हैं।” हमने लिखा, प्यार किया तो डरना क्या!

पुस्तकालय के सवाल पर आंदोलन

यह सब कुछ जाना हुआ है। अधिक उत्साह की बात थी इन नौजवानों का वहाँ होना। वे जागरूक हैं और मानसिक रूप से फ़ुर्तीले। यहाँ दलितों का आंदोलन मज़बूत है। जिगनेश हैं, हार्दिक ने भी साथ दिया।

ऐसे जवानों के होते यह हाल क्यों? असल में अभी जो जवान मतदाता है, उसने तो मोदी के अलावा यहाँ कुछ देखा ही नहीं! गाँव में लेकिन बात अलग है। 2017 में चांस था। रह गया! अगर उस वक़्त कुछ हो पाता तो अभी नतीजे ऐसे न होते!

जब लगा कि टैक्सी आती नहीं दीखती तो हिचकिचाते हुए मुझसे पूछा गया कि क्या मैं मोटरसाइकल पर जाना पसंद करूँगा। एक स्कूटर पर पीछे बैठा। गली-गली होते हुए एक इमारत के अहाते में जा पहुँचा। यह लाइब्रेरी है। पीछे-पीछे बाक़ी भी आ गए।

यह शहर की मुख्य लाइब्रेरी है। पुरानी। बग़ल में गुजरात विद्यापीठ है। यह गाँधीजी की स्थापित की हुई लाइब्रेरी है। लेकिन इसकी मेम्बरशिप फ़ीस अब बहुत बढ़ा दी गई है। हमने उसके ख़िलाफ़ आंदोलन किया। लेकिन मेयर ने कहा, जो करना है कर लो। मेम्बरशिप फ़ीस कम नहीं होगी। हमें मेंबर नहीं बनाया। हम मेंबर नहीं हैं, लेकिन यहाँ जमा होते हैं। हमने यहाँ आम्बेडकर को ज़िंदा रखा है। यहाँ हम मिलते हैं, पढ़ते हैं, बातचीत करते हैं। 

बहुत दिनों के बाद मैं किसी सार्वजनिक पुस्तकालय परिसर में था। उससे भी अधिक दिन हुए नवयुवकों को पुस्तकालय पर चर्चा करते देखे हुए। पुस्तकालय के प्रश्न पर आंदोलन हो सकता है, अख़बार उसपर लिख सकते हैं और यह अहमदाबाद में, यह सोचा नहीं था।

इमारत पुरानी है, हेरिटेज बिल्डिंग है। 11 करोड़ का सालाना बजट है। किताबें लेकिन धार्मिक, कॉम्पटिशनवाली, बेकार ही आती हैं। फिर यहाँ की मेंबरशिप के लिए इतना ज़ोर क्यों?

हमारे घरों में पढ़ने की जगह नहीं, हेलमेट ऊपर करते हुए मेरे नए मित्र ने साफ़ किया। हम अपनी किताबें लेकर आते हैं। ज़्यादातर दलित और मुसलमान आते हैं यहाँ। हमें पढ़ने के लिए बहुत कम जगहें हैं। और लाइब्रेरी हैं नहीं। प्राइवेट हैं लेकिन अभी तो दो-तीन बंद हैं सूरत में आगज़नी के हादसे के बाद।

आम्बेडकर, भगत सिंह की तसवीर लगाने पर कमरा बंद!

लाइब्रेरी का मतलब वाचनालय है। लेकिन यह भी कि अहमदाबाद में किताब की दुकानें भी नहीं। रवीश कुमार की किताब हमें अपने दोस्त के ज़रिए दिल्ली से मंगानी पड़ी। लाइब्रेरी में हमने आम्बेडकर और भगत सिंह की तसवीर लगाई तो वह कमरा ही बंद कर दिया।

मोटरसाइकल ख़ान दरवाज़े से होकर बढ़ती है और हवाईअड्डे के रास्ते में अचानक जाम में फँस जाती है। इंच-इंच घिसटते हुए जब ट्रैफ़िक कैंट तक पहुँचता है तब जाम का राज खुलता है। भक्तगण का रेला कैंट के भीतर के हनुमानजी के दर्शनों के लिए उमड़ पड़ा है, रुकने का नाम नहीं लेता। वे शायद यहाँ कैंट हनुमान कहे जाते हैं। राम राम करके आगे निकलने पर मेरा युवक मित्र कहता है, इतनी दूर से हम जाते हैं वहाँ सिर्फ़ पढ़ने।

नज़र पड़ती है एक बड़ी तसवीर पर: भारत विजय के बाद दो गुजराती संतुष्ट भाव से हाथ उठाकर प्रजा का अभिवादन स्वीकार कर रहे हैं। मोटरसाइकल तेज़ी से गंतव्य तक बढ़ती जाती है।

हेलमेट उठाकर नौजवान कहता है, मेरा नाम भी अपूर्व है। अपूर्व? मैं पूछता हूँ। अपूर्व अमीन!

अपूर्व अमीन वापस लौट गया है। विज्ञान पढ़ रहा है लेकिन दलित साहित्य में दिलचस्पी है। कल फिर वह अपने दोस्तों से उसी लाइब्रेरी के अहाते में मिलेगा। मेम्बरशिप न होने पर भी उस जगह पर हक़ जताना नहीं छोड़ते। लेकिन इस जद्दोजहद से कोई शिकायत, कोई कुढ़न उनमें से किसी में न थी। ये भी गुजरात के नौजवान हैं। सिर्फ़ गुजरात के क्यों, हिंदुस्तान के भी तो हैं!

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