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अयोध्या विवाद में मध्यस्थता तो स्वीकार, पर मंदिर वहीं बनाएँगे

अयोध्या विवाद में मध्यस्थता तो स्वीकार, पर मंदिर वहीं बनाएँगे

अयोध्या विवाद पर मध्यस्थता की पेशकश को ज़्यादातर संत स्वीकार तो कर रहे हैं, पर अ्ड़े हैं कि वहाँ राम मंदिर ही बनना चाहिए। 

वर्षों पुराने अयोध्या विवाद का हल बातचीत और मध्यस्थता से निकालने की सुप्रीम कोर्ट की कोशिश के बावजूद कुछ हिन्दू संत इस पर अड़े हुए हैं कि विवादित जगह पर राम मंदिर से कम वे किसी सूरत पर नहीं मानेंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वह जल्द ही मध्यस्थों की मौजूदगी बंद कमरे में बातचीत करवाएगा और इसके लिए सभी पक्ष उसे अपनी पसंद के मध्यस्थों की सूची दे दें। लेकिन कुछ साधु संतों ने तुरन्त यह कह दिया कि बातचीत चाहे कुछ भी हो, लेकिन विवादित जगह पर राम मंदिर ही बन सकता है, दूसरा कुछ नहीं।  

सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता की पहल पर मंदिर व मसजिद के पक्षकारों व संतो ने स्वागत किया है। लेकिन विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े साधु संत किसी तरह की मध्यस्थता को मानने को तैयार नहीं हैं। वे तर्क देते हैं कि पहले भी कई बार आपसी सुलह से इस विवाद को हल करने के प्रयास हुए, जो नाकाम रहे। उन्होने इस क़दम को मामला कोर्ट में अटकाए रखने की कवायद क़रार दिया।

कोर्ट ही देरी के लिए ज़िम्मेदार

विहिप कैंप के संत व राम जन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के सहयोगी संत कमल नयन दास कहते हैं कि राम मंदिर के निर्माण पर कोई समझौता नहीं होगा। जिनके पास कुछ नहीं है वे ही मध्यस्थता की बात कर रहें हैं। उन्होंने कोर्ट पर सवाल उठाया और फ़ैसले में देरी के लिए उसे ज़िम्मेदार ठहराया। महंत ने कहा कि कोर्ट मध्यस्थता की पहल कर मामले को लंबे समय तक अटकाना चाहता है।

मसजिद के लिए ज़मीन देने की पहल की थी

मंदिर के पक्षकार निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेंद्र दास ने कोर्ट की पहल का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि कोर्ट जो भी निर्देश देगा, उसे वह मानेंगे। पर उन्होंने यह भी साफ़ किया कि विवादित स्थल पर केवल राम मंदिर ही बनना चाहिए। मंदिर के अलावा कुछ भी स्वीकार नही होगा। महंत ने कहा, 'मैने पहले भी मुसलिम पक्षकारों को विवादित स्थल पर अपना दावा छोड़ने पर विद्याकुंड में ज़मीन देने की पेशकश की थी, अब भी अखाड़ा के पंच  की सहमति पर मध्यस्थता को लेकर तैयार हैं।'

क्या कहते हैं बाबरी मसजिद के पक्षकार?

बाबरी मसजिद के पक्षकार इक़बाल अंसारी ने पहले मध्यस्थता को नकार दिया था, अब कोर्ट की पहल के पक्ष में आ गए हैं। उन्होंने कहा कि मुसलिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट की पहल को मानेगा, पर ज़िम्मेदार लोगों का पैनल बने जिससे किसी तरह की राजनीति न होने पाए। उन्होनें कहा कि अब तक जितने प्रयास किए गए, सब में राजनीति ही की गई है।

मध्यस्थता से मंदिर-मसजिद के विवाद को हल करना सबसे बेहतर रास्ता है। इससे दोनों कौमों में प्यार-मुहब्बत का रिश्ता कायम रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ख़ुद पक्षकारों, अधिकारियों, वकीलों ,साधु-संतों व बुद्धजीवियों को बुलाए। कोर्ट की निगरानी में ही आपसी सुलह की बातचीत करवाई जाए।


इक़बाल अंसारी, (बाबरी मसजिद के पक्षकार)

सीएम को नियुक्त करें मध्यस्थ

इस पर मंदिर के पक्षकार महंत धर्मदास ने कहा कि कोर्ट मंदिर मामले में जल्द फैसला सुनाए। चाहे मध्यस्थता कराए या फैसला सुनाए। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता के लिए किसी ज़िम्मेदार व्यक्ति को ही नियुक्त किया जाना चाहिए। जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री या किसी व्यक्ति विशेष को मध्यस्थता की जिम्मेदारी सौंपी जाने की बात कही। महंत धर्म दास ने कहा कि मध्यस्थ अयोध्या की ज़मीनी हकीकत भी देखें।

'विवादित स्थल पर मंदिर ही चाहिए'

विवादित परिसर में विराजमान राम लला के प्रधान पुजारी सत्येंद्र दास ने कहा कि कोर्ट की पहल स्वागत योग्य है, पर हिंदू पक्षकारों को विवादित स्थल पर राम मंदिर ही चाहिए। इसके अलावा कोई समझौता संभव ही नही है। ऐसे में मुसलिम पक्षकारों को अलग कहीं भी मसजिद बनाने के प्रस्ताव को मानने के लिए पहल करनी चाहिए। पुजारी ने कहा कि मसजिद अमन के नाम पर कहीं और बन जाए, लेकिन भव्य राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को ध्यान में रख कर मध्यस्थता से केस को सुलझाने का प्रयास करे।

राम वल्लभा कुंज के अधिकारी महंत राजकुमार दास ने कहा कि पहले का अनुभव रहा है कि सुलह-समझौते से कुछ भी निष्कर्ष नहीं निकला है। हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज भी सुलह-समझौते का प्रयास कर चुके हैं। हिंदू-मुसलिम दोनों पक्ष इसका प्रयास कर चुके हैं। अब सुप्रीम कोर्ट पर ही विश्वास है। वह ही जल्द इस केस में फैसला दे।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 90 मिनट की सुनवाई के बाद मध्यस्थता पर फैसला सुरक्षित रख लिया। मामले पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि वह फैसला जल्द सुनाना चाहते हैं, इसलिए मध्यस्थता के लिए सभी पक्ष नाम सुझाएँ। जस्टिस एस. ए. बोबड़े ने कहा कि यह धर्म, भावनाओं और विश्वास के बारें में है। उन्होंने कहा कि अतीत में जो हुआ, उस पर उनका कोई ज़ोर नहीं है, वहाँ पर मंदिर था या मसजिद। लेकिन वर्तमान विवाद के बारे में वह समझते हैं और मामले की गंभीरता के प्रति भी सचेत हैं।

इसके अलावा जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड़ ने कहा कि यह विवाद दो पार्टियों नहीं, दो समुदायों का है। हम मध्यस्थता पर लाखों लोगों को कैसे मनाएँगे? यह आसान काम नहीं होगा। हिंदू महासभा ने मध्यस्थता से हल निकालने की पहल का विरोध किया है।

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