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पुरुष कामगारों की संख्या 25 सालों में सबसे कम, मोदी सरकार दे जवाब 

पुरुष कामगारों की संख्या 25 सालों में सबसे कम, मोदी सरकार दे जवाब 

देश में 25 साल में पहली बार पुरुष कामगारों की संख्या घटी है। यह ख़बर नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस की ओर से किए गए पीएलएफ़एस सर्वे के आधार पर प्रकाशित हुई है।

देश में 25 साल में पहली बार पुरुष कामगारों की संख्या घटी है। अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस (एनएसएसओ) की ओर से किए गए पीरियडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे (पीएलएफ़एस) के आधार पर प्रकाशित ख़बर में यह दावा किया गया है। पीएलएफ़एस सर्वे के आँकड़ों के सामने आने के बाद विपक्षी दलों को मोदी सरकार पर हमला करने का एक बड़ा मौक़ा मिल गया है। बताया जा रहा है कि चुनाव के मौक़े पर किरकिरी होने से बचने के लिए सरकार ने एनएसएसओ की इस रिपोर्ट को जारी नहीं होने दिया है। 

बता दें कि हाल ही में एनएसएसओ की रिपोर्ट के आँकड़े लीक होने के बाद भी जोरदार हंगामा हुआ था और विपक्षी दलों ने मोदी सरकार को रोज़गार के मुद्दे पर घेरा था।

सर्वे के मुताबिक़, 1993-94 में देश में पुरुष श्रमिकों की संख्या 21.9 करोड़ थी और साल 2011-12 में कराए गए एनएसएसओ के सर्वे में यह 30.4 करोड़ थी। लेकिन पिछले पाँच साल के मुक़ाबले 2017-18 में बहुत कम पुरुष कामगारों को रोज़गार मिला है। 

रिपोर्ट के मुताबिक़, ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में पुरुष कामगार (क्रमशः) 7.1 प्रतिशत और 5.8 प्रतिशत कम हो गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन आँकड़ों से साफ़ तौर पर पता चलता है कि रोज़गार के नए मौक़े बहुत कम बने हैं।

यह सर्वे जुलाई 2017 और जून 2018 के बीच कराया गया है। सर्वे की रिपोर्ट यह भी कहती है कि 2017-18 में गाँवों में कुल 4.3 करोड़ नौकरियाँ कम हुईं हैं जबकि शहरों में 0.4 करोड़ नौकरियाँ कम हुई हैं।

यहाँ यह बताना बेहद ज़रूरी है कि दिसंबर 2018 में जब रोज़गार के आँकड़ों से जुड़ी एक रिपोर्ट को एक अंग्रेजी अख़बार ने छापा था तो इसे लेकर ख़ासा बवाल हुआ था। रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में बेरोज़गारी की दर 45 साल में सबसे ज़्यादा हो गई है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान हर साल दो करोड़ नये रोज़गार देने का वादा किया था। लेकिन हुआ इसके उलट और बेरोज़गारी 45 सालों में सबसे ज़्यादा हो गई।

इस पर विपक्ष ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था कि वह रोज़गार देने में विफ़ल रही है। किरकिरी से बचने के लिए मोदी सरकार को सफ़ाई देनी पड़ी थी कि यह ड्राफ़्ट रिपोर्ट थी न कि फ़ाइनल रिपोर्ट। लेकिन सरकार के इस बयान की केंद्रीय सांख्यिकी आयोग के पूर्व प्रमुख पीसी मोहनन ने हवा निकाल दी थी। मोहनन ने कहा था कि सरकार नौकरियों को लेकर एनएसएसओ की रिपोर्ट जारी नहीं कर रही थी। मोहनन ने कहा था कि अगर एक बार केंद्रीय सांख्यिकी आयोग रिपोर्ट को मंजूरी दे देता है तो यह फ़ाइनल होती है। उनके मुताबिक़, एनएसएसओ की रिपोर्ट आने के बाद भी इसे जारी नहीं किया जा रहा था और इसी कारण से उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था। 

नोटबंदी, जीएसटी ने तोड़ी कमर

इसके अलावा ऑल इंडिया मैन्युफ़ैक्चरर्स ऑरगनाइज़ेशन (आइमो) के अक्टूबर 2018 में कराए गए सर्वे में भी बेहद चिंताजनक आँकड़े सामने आए थे। सर्वे में यह दावा किया गया था कि नोटबंदी, जीएसटी और ई-कॉमर्स ने दुकानदारों, व्यापारियों और ग़रीब तबक़े की कमर तोड़ दी है। सर्वे के मुताबिक़, अति लघु उद्योगों में 32 प्रतिशत, लघु उद्योगों में 35 प्रतिशत और मँझोले उद्योगों में 24 प्रतिशत लोग बेरोज़गार हो गए हैं।

बेरोज़गारी पर चुनाव हारने का डर

यह साफ़ है कि मोदी सरकार नहीं चाहती कि लोकसभा चुनाव के मौक़े पर बेरोज़गारी को लेकर ख़राब तसवीर सामने आए। इसीलिए वह एनएसएसओ की रिपोर्ट जारी नहीं करना चाहती थी। लेकिन अब आए पीएलएफ़एस के सर्वे ने उसकी चिंता और बढ़ा दी है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और अन्य विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री मोदी के हर साल 2 करोड़ रोज़गार के मौक़ों पर उन्हें कई बार कठघरे में खड़ा किया है। लेकिन सवाल यह है कि आख़िर मोदी सरकार रोज़गार को लेकर इन आँकड़ों को क्यों छुपा रही है। क्या उसे इस बात का डर है कि बेरोज़गारी के मुद्दे पर वह लोकसभा का चुनाव हार सकती है। 

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