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'मित्रो मरजानी' की ज़रूरतें आज भी अधूरी हैं!

'मित्रो मरजानी' की ज़रूरतें आज भी अधूरी हैं!

स्त्री की शारीरिक ज़रूरतें और उस पर थोपे गई यौन शुचिता के पाखंड को अपने उपन्यास मित्रो मरजानी में कृष्णा सोबती ने बखूबी उभारा था। क्या कहना है मैत्रेयी पुष्पा का?

मेरी तब उन से औपचारिक मुलाक़ात नहीं थी जब मैंने उनको इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में खुली जगह पर एक गोष्ठी के दरमियान देखा। वे कौन हैं जो गरारे और कुर्ती के साथ सिर पर दुपट्टा ओढ़े हुए हैं! गौरवर्ण और अच्छी सेहत मैं उनको बहुत देर तक देखती रही, वे मेरी ओर देखकर मुस्कुराईं अपरिचित के बाद भी जैसे अक्सर इंग्लिश लोग मुस्कुराकर अभिवादन करते हैं। 

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मेरी हिम्मत बढ़ी , मैं आगे गई। मैंने अपना नाम बताया, वे हँसी और उन्होंने कहा - मैं कृष्णा सोबती। मैं एकदम सकपका गई। एकदम साक्षात खड़ी हैं मेरे सामने! मैं आँखें झपकाने लगी। वे मुस्कराए जा रही थीं। क्या कहूँ, मेरी समझ में नहीं आरहा था। एक ही उपाय सूझा, मैं हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। उन्होंने मेरे हाथों को अपने हाथों में लिया। उनका स्पर्श बड़ा नरम लगा। जब वे बोलीं - मैं तुम्हें जानती हूँ मैत्रेयी। तुम सहमी सी खड़ी थीं, क्यों

मैं क्या कहती मैं 'ज़िन्दगीनामा' और 'मित्रो मरजानी' के दृश्यों में डूब-उतरा रही थी जैसे कृष्णा जी नहीं, मेरे सामने मित्रो खड़ी हो, नहीं! नहीं! 'ज़िन्दगीनामा' की गरिमामयी नायिका खड़ी हो। मैं निशब्द, मैं खोई हुई। क्या अपने प्रिय लेखक के अचानक मिल जाने पर पाठक का यही हाल होता है फिर मैं उन्हीं के साथ गोष्ठी में पीछे वाली सीट पर बैठ गई। कृष्णा जी का नाम हर नए रचनाकार के लिये मिसाल रहा। राजेन्द्र यादव ने उनके बारे में मुझे बहुत कुछ बताया जिसके ज़रिये मैंने जाना कि वे एक खुद्दार स्त्री हैं। निर्भीक और अपनी शर्तों पर जीने वाली।  

हाँ, उन्होंने ही औरत के लिए तयशुदा उन बन्दिशों को नकार दिया और वे सारे भेद खोल डाले। नये रास्ते बनाये, जिनका उदाहरण ‘सूरजमुखी अंधेरे के‘ है। 'ज़िन्दगीनामा' उनकी अपने विस्तार में बड़ी कृति है, जिस पर उनको साहित्य अकादमी अवार्ड मिला।

और वे इस अवार्ड को पाने वाली पहली महिला रचनाकार हुईं। कृष्णा जी बडे व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। बड़ा व्यक्तित्व बडे हृदय वाले लोगों का ही होता है। उनसे मिल कर छोटे से छोटा लेखक संकोच में नहीं रह पाता था। मुझे अपने घर बुलाया, बहुत सी बातें हमारे बीच हुईं, कब ढाई घंटा बीत गया पता ही नहीं लगा। बीच बीच में तरह तरह के नाश्ते का दौर भी चलता रहा। बाद में पता चला कि राजकमल प्रकाशन के मालिक श्री अशोक महेश्वरी को मेरे लेखन की तारीफ में कुछ पैराग्राफ़ लिखकर भिजवाए हैं। 

हे कृष्णा जी! ऐसा कौन होता है लोग तो कहे कहे भी नहीं लिखते। ख़ुद को खु़दा जो समझते हैं। आप कितनी साधारण तबियत की मालकिन रहीं! कृष्णा जी को कई लोग स्त्रियों से अलग करके देखते रहे हैं जैसे सामान्य स्त्री की दुनिया से उनकी दुनिया अलग हो, लेकिन ऐसा नहीं था। वे हमारी साड़ी की भी ऐसे तारीफ़ करतीं जैसे कोई मामूली स्त्री साड़ी पर रीझ कर कर रही हो। वे इस तरह की न होतीं तो औरत के मन की परतों को कैसे खोल पातीं

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आज विश्वास नहीं हो रहा कि कृष्णा जी नहीं रहीं। उन्होंने लम्बा जीवन बड़ी ज़िन्दगी के साथ जिया। बहादुरी और दिलेरी से जिया। हमारे ऊपर जब इल्ज़ाम लगे तो कृष्णा जी ने हमारा सिर टिकाने के लिए अपना कंधा आगे कर दिया और अंत तक हमें अकेला नहीं छोड़ा।  

आपकी छांव मे हम अपने हक़ की लड़ाई लड पाए कृष्णा जी। सच कहें तो अपनी रचनाओं से और अपने साहसी जीवन से हमें प्रभावित करती ही नहीं रहीं, ललकारती भी रहीं कि हम अपनी हक़दारी के लिये लड़ना सीख गए।

यह भी एक लेखक के लिए ज़रूरी होता कि वह अपने पीछे आनेवाली पीढ़ी को किस किस तरह से हिम्मती बनाए। अगर ऐसा नहीं है तो लेखक होने का अर्थ भी क्याकृष्णा जी की कृतियाँ तो अमर रहेंगी क्योंकि जब-जब स्त्री के जीवन का इतिहास पढा जाएगा, कृष्णा जी का हस्तक्षेप उसमें नई धज का होगा। 

और जब जब देश के अतीत पर निगाह डाली जाएगी, 'ज़िन्दगीनामा' महत्वपूर्ण होगा। दिल्ली का पुराना हाल ‘दिलो दानिश‘ देगा। आप चली गईं हमारे बीच से ऐसा कहा जाएगा, मगर माना नहीं जाएगा, क्योंकि रचनाकार कभी कहीं नहीं जाते। वे अपनी किताबों में रहते हैं और हम से बराबर बतियाते हैं। हमारी मुसीबतों में हमें रास्ते सुझाते हैं।

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यूं तो आपकी छवि भी भूलने वाली नहीं जो अपने रूप में ऐसी विलक्षण थी कि लोगों की निगाह में अमिट रहेगी, साथ ही आपकी ऐसी दृढ़ता जिस का पालन करना हरेक के बस का नहीं। 

आपने ही सिखाया कि ईमानदारी के ख़मियाज़े बहुत होते हैं। मगर इसकी ताक़त भी अजेय होती है। अपनी रीढ़ को सीधी रखकर हमने चापलूस और मुनाफ़ाख़ोरों से जंग लड़ी है कृष्णा जी।

कोई है धन देता, दौलत बख़्शता, कुर्सी का रुतबा देता, तो भी उस से हम ऐसे भरेपूरे नहीं होते जैसे कि आपके व्यक्तित्व की प्रेरणा से हुए हैं। अपनी नई पीढ़ी को इतना कुछ सौंप कर जा रही हो कृष्णा जी कि हम रचनाकार इसे सम्भालकर रख पाएँ, ऐसी शक्ति की कामना करते हैं। पर आप के बिना अलविदा भी कैसे कहें ... बस श्रद्धांजलि!

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