+
एनआरसी का दर्द: ‘मैं एक मियाँ हूँ’ लिखना क्या अपराध है?

एनआरसी का दर्द: ‘मैं एक मियाँ हूँ’ लिखना क्या अपराध है?

हाफ़िज़ अहमद की 'मैं एक मियाँ हूँ' कविता को पढ़कर क्या आप पुलिस स्टेशन के लिए रवाना हो जाएँगे? हाफ़िज़ को इन पंक्तियों को लिखने के लिए सज़ा क्यों मिल रही है? 

‘लिखो

लिखो कि

मैं एक मियाँ हूँ

एनआरसी में मेरा सीरियल नंबर है 200543

मेरे दो बच्चे हैं

और तीसरा आनेवाला है

अगली गर्मियों में

क्या तुम उससे भी नफ़रत करोगे

जैसे मुझसे करते हो’

हाफ़िज़ अहमद की इस कविता को पढ़कर क्या आप पुलिस स्टेशन के लिए रवाना हो जाएँगे क्या इस कविता में किसी के ख़िलाफ़ नफ़रत व्यक्त हुई है या, क्या आप इसपर सोचने की कोशिश करेंगे कि कविता का तुम कौन है कहीं वह आप ही तो नहीं या, आपका दिल होगा कवि से पूछने का कि उसकी इस आशंका की वजह क्या है उसके लिए यह सीरियल नम्बर क्यों उसकी पहचान है और क्या आप अपना परिचय इस तरह देने की मजबूरी महसूस करते हैं

इस तरह के सवाल तो मन में उठ सकते हैं लेकिन क्या यह कविता किसी पाठक के मन में किसी हिंसा को जन्म देती है लेकिन हाफ़िज़ को इन पंक्तियों को लिखने के लिए सज़ा मिल रही है। उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई गई है। सिर्फ़ उनके नहीं, आठ और साथी कवियों के ख़िलाफ़ भी। वे सब जो ख़ुद को मियाँ कवि कहते हैं।

शायद यह कहा जाए कि मैं कविता आधी-अधूरी उद्धृत कर रहा हूँ। तो आगे का हिस्सा भी पढ़ें,

लिखो

मैं एक मियाँ हूँ

मैं बेकार, दलदली ज़मीन को

हरे धान खेतों में बदलता हूँ

कि तुम्हें खाना मिल सके।

मैं तुम्हारे मकान बनाने के लिए ईंटें ढोता हूँ

तुम्हारे आराम के लिए 

तुम्हारी ड्राइवरी करता हूँ

तुम्हें स्वस्थ रखने के लिए

तुम्हारी नाली साफ़ करता हूँ।

मैं हमेशा हाज़िर रहता हूँ

तुम्हारी ख़िदमत के लिए

फिर भी तुम नाख़ुश हो!

लिखो कि

मैं एक मियाँ हूँ

एक जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र का नागरिक

बिना किसी अधिकार के

मेरी माँ एक डी वोटर

हालाँकि उसके माँ-बाप भारतीय हैं।

अगर तुम मुझे मार डालना चाहते हो

निकाल देना चाहते हो मेरे गाँव से

मेरे सब्ज खेत छीन लेना चाहते हो

बुलडोज़र से मुझे कुचल देना चाहते हो

तुम्हारी गोलियाँ छलनी कर सकती हैं मेरा सीना

बिना किसी जुर्म के

लिखो कि मैं एक मियाँ हूँ

तुम्हारी यातना ने

जलाकर काली कर दी है मेरी पीठ

आग से लाल कर दी हैं मेरी आँखें

सावधान!

मेरे पास क्रोध के अलावा कुछ भी नहीं!

दूर रहो

या राख हो जाओ!

शायद पाठक यह कहे कि आख़िरी पंक्ति में ही कविता का आशय और इरादा छिपा है। वरना राख हो जाने जैसी धमकी क्यों और इस धमकी को हिंसा का आह्वान क्यों न माना जाए

ऐसा हम तभी कह पाएँगे जब हमारे संवेदना के तंतु पूरी तरह सूख चुके हों। जब हम हमलावर और हिंसा के निशाने के बीच के फ़र्क को भूल जाएँ। जब हम हिंसा से पैदा हुए क्षोभ को भी जुर्म ठहराने लगें! तब मान लेना चाहिए कि हमारी इंसानियत किसी बड़े हादसे का शिकार हो चुकी है!

यह कविता, जो अरब और फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश की कविता से प्रेरित है, उनकी तकलीफ़ की छटपटाहट ही है!

कवि की इस बेचैनी को समझने और उससे हमदर्दी की जगह हाफ़िज़ और उनके मित्र कवियों के ख़िलाफ़ चौतरफ़ा हमला बोल दिया गया है। एक उनके विरुद्ध आपराधिक रिपोर्ट लिखवाकर और दूसरा उनपर लेखों के ज़रिए। एफ़आईआर ऐसा रास्ता है जो हर किसी को क़ानूनी मालूम पड़ता है। इसलिए जायज़ भी। कवियों को ज़मानत ही तो लेनी है, अदालत में पेश ही तो होना है! एक ही मामले में और कई जगहों पर यह किया जा सकता है। जिसका अर्थ यह है कि कवि लगातार वकीलों के पास, अदालतों और थाने दौड़ते रहने को बाध्य हैं। आप कह सकते हैं कि उन्हें इसके लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन क्या हम नहीं जानते कि यह ऐसी हैरानी है जो हम ख़ुद नहीं चाहते

मियाँ कविता!

हाफ़िज़ और उनके साथी अपनी कविता को मियाँ कविता कह रहे हैं। सिर्फ़ कविता क्यों नहीं विश्व, भारतीय और असमिया साहित्य के इतिहास से मामूली परिचय रखनेवाले को भी मालूम है कि कविता हमेशा कविता होती है लेकिन अलग-अलग समय कवियों ने अलग-अलग विशेषण के सहारे उस नएपन को चिह्नित करने की कोशिश की है जो उनकी रचना में है। हिंदी में ही प्रगतिशील कविता, नई कविता, अकविता जैसे आंदोलनों से हम परिचित हैं। लेकिन अधिक चौंकनेवाले विशेषण भी इस्तेमाल किए गए। भूखी, शमसानी, दिगंबरी आदि विशेषण अहिंसक नहीं हैं। वे सौम्य साहित्यिक रुचि को जानबूझ कर धक्का देने के लिए ही अपनाए गए थे। नारीवाद से हम अच्छी तरह परिचित हैं।

दलित साहित्य पहला ऐसा आंदोलन था, जिसने सिर्फ़ साहित्यिक हलके तक ख़ुद को सीमित नहीं रखा। उसका राजनीतिक पक्ष किसी भी दूसरे साहित्यिक आंदोलन के मुक़ाबले अधिक स्पष्ट था। उसका उद्देश्य मात्र एक नया साहित्यिक स्वर देना न था, दुनिया को देखने का कोण और कहाँ से वह देखी जाए, उसे निश्चित करने का महत्त्वाकांक्षी प्रयास था। पहली बार उसमें जो लिख रहा या रही थी, उसकी ओर देखने को कहा जा रहा था। इससे पैदा हुई बेचैनियाँ अब तक ख़त्म नहीं हुई हैं।

दलित का कहना यही था कि असल बात है मेरा होना, मेरा वजूद, जिसे न सिर्फ़ स्वीकार नहीं किया गया बल्कि जिसे लुप्त ही कर दिया गया। नारीवादियों ने भी यही सवाल उठाया था। प्रश्न सिर्फ़ नई शैली का नहीं, लिखने के क्षेत्र में उनके प्रवेश का था जो अब तक मात्र ग्रहीता थे। अस्तित्व होते हुए अस्तित्वविहीनता को निरंतर झेलते हुए एक समय उससे इंकार कर देना और चीख़ कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराना भी एक फ़र्ज़ है। उससे इतिहास का भला होता है और भाषा का भी।

अक्सर कहा गया है कि साहित्य सिर्फ़ साहित्य होता है, उसकी कसौटियाँ मात्र साहित्यिक होती हैं। इस निर्दोष प्रतीत होते दावे में धोखा छिपा है।

असम के मियाँ कवियों ने एक तरह से यही किया है। मियाँ, जो होना चाहिए था सम्मानसूचक संबोधन, आख़िर हमने मियाँ तानसेन ही कहते सुना अपने अध्यापकों को, अरसे से मुसलमान मर्दों का अपमान करने के लिए ही प्रायः इस्तेमाल किया जाता है। यह सारे भारत के मुसलमानों का अनुभव है। वे इसे सुनते हुए अनसुना करने की आदत पीढ़ियों से डाल चुके हैं। उनका यह अभ्यास अपने देशवासियों से, जो प्रायः हिंदू हैं, उनकी निराशा का ही नतीजा है। मियाँ से और भी अपमानजनक शब्द बनाए जाते हैं। हिंदू बच्चों की सामाजिक भाषा इसी तरह विकसित होती है।

असम के वैसे मुसलमान, जो मूलतः बांग्लाभाषी रहे हैं लेकिन जिन्होंने असमिया अच्छी तरह सीख ली है, उसे बोलते, पढ़ते और लिखते भी हैं, हमेशा संदिग्ध रहे हैं। असमिया का तनाव बांग्ला से है ही, इसलिए वह धर्मनिरपेक्ष है, यह कहा जाता है। लेकिन मैमनसिंह जैसे इलाक़े में ख़ास तरह की बांग्ला बोली जाती थी जो साधु या कलकतिया बांग्ला से अलग है। भारत और पाकिस्तान के निर्माण के बाद से नहीं बल्कि उसके बहुत पहले से स्वाभाविक आवाजाही की प्रक्रिया के तहत बांग्ला भाषी हिंदू और मुसलमान असम आए और यहाँ बस गए। उनपर असम का रंग ज़रूर चढ़ा, लेकिन उनका पुराना रंग भी झाँकता रहा।

अपनी पहचान में हमेशा अपने स्रोत की खोज और उसकी संभाल एक अजब इंसानी फ़ितरत है। लेकिन क्या हमने सोचा है कि क्यों हम मॉरिशस या सूरीनाम में अभी भी भोजपुरी बोलने और मानस पढ़ने पर तो भाव विभोर हो जाते हैं, लेकिन असम में बांग्ला बोलनेवालों को कट्टर या अलगाव की भावना से ग्रस्त मानते हैं क्यों एक ईसाई बहुल इंग्लैंड या अमेरिका में हिंदूपन सुरक्षित रखना और प्रदर्शित करना अथवा हिंदू सामुदायिकता तो स्वाभाविक और उचित लगती है लेकिन यही अधिकार हम भारत में न तो मुसलमानों और न ही ईसाइयों को देना चाहते हैं क्यों उनकी सामुदायिकता से हमें भय लगता है

बांग्ला राष्ट्रवाद, असमिया राष्ट्रवाद

असम में ये सवाल अभी मात्र अकादमिक नहीं रह गए हैं। वे जीवन-मरण के प्रश्न हैं। असम में ज़माने से रह रहे, खेती-बारी, मज़दूरी करके वे सिर्फ़ अपना पेट नहीं पालते आए हैं, बल्कि जैसा मेरे युवा असमी मित्र सोहम दास कहते हैं, वे असम की अर्थव्यवस्था में भी योगदान करते रहे हैं। यानी हाड़तोड़ मेहनत से उन्होंने केवल ख़ुद को नहीं, असम को भी जीवन दिया है। क्या ख़ुद को शुद्ध असमिया कहनेवाले कभी सोचेंगे कि उनकी नसों में जो ख़ून बह रहा है, वह इन्हीं मियाँ लोगों द्वारा उगाए अन्न से बना है

असम में कुछ इलाक़ों के पूरे असमिया होने में वहाँ के लोगों को संदेह रहा है। भाषा का द्वंद्व, विशेषकर बांग्ला और असमिया का पुराना है। सिलचर के लोगों की स्मृति में 1961 का रक्तपात अभी भी ताज़ा है। वहाँ का बांग्ला राष्ट्रवाद असमिया राष्ट्रवाद से सहज नहीं हो पाया है। यहाँ सवाल हिंदू-मुसलमान का न था। लेकिन अब स्थिति 1961 की नहीं है।

असम में असम आंदोलन के समय से असमिया राष्ट्रवाद ने बाहरी लोगों को भगाने की जो हिंसक माँग रखी, वह अब तक ज़िंदा है। बाहरी कौन है 1971 से पहले असम में अपनी जड़ का सबूत अगर आप किसी काग़ज़ से दे सकें तो आप बच गए, वरना आपको विदेशी क़रार दिया जाएगा। जितनी जल्दी असमिया लोगों को है, उससे कहीं अधिक उच्चतम न्यायालय को इन्हें बाहर करने की है। चुन-चुनकर बाहरी लोगों की शिनाख्त के बाद नागरिकों की एक राष्ट्रीय सूची बनेगी। उसमें शामिल होना न होना अभी असम में रहनेवालों के लिए किसी भी सवाल से ऊपर है।

अगर आप काग़ज़ात के सहारे असमिया के तौर पर अपना दावा पेश न कर पाए तो आपको डिटेंशन कैंप में बंद कर दिया जाएगा। हज़ारों लोग पहले से वहाँ बंद हैं। सबसे बड़ी अदालत को हड़बड़ी है कि इन लोगों को फ़ौरन सीमा के बाहर फेंक दिया जाए। वह डाँटकर पूछती है, क्यों नहीं ऐसे लोगों को अब तक बाहर किया गया बाहर का मतलब, बांग्लादेश! मानो, आपके चाहने से बांग्लादेश उन्हें स्वीकार कर लेगा जिन्हें आप बांग्लादेशी कह रहे हैं।

एनआरसी का मक़सद

कहा जाता रहा है और सच भी है कि बाहर होनेवालों की तादाद लाखों में होगी और वे सिर्फ़ मुसलमान न होंगे। इसलिए इस अभियान को मुसलमान विरोधी कहना ग़लत है। लेकिन इसी बीच नागरिकता के क़ानून में संशोधन का एक क़ानून बनाने की कोशिश भी चल रही है। अगर वह क़ानून बन गया तो मुसलमानों के अलावा सारे लोग जो सूची से बाहर हैं, भारतीय नागरिकता के पात्र होंगे। इसका अर्थ यही है कि राष्ट्रीय नागरिकता सूची बनाने का मक़सद मुसलमानों को संदिग्ध बनाकर उन्हें कैंपों में डाल देने का है। क्योंकि भारत लाख चाह ले, वह उन्हें सीमा के बाहर किसी देश में नहीं भेज सकता। इस मामले में अंतरराष्ट्रीय नियम स्पष्ट हैं।

यह संदर्भ है मियाँ कविता का। जो विशुद्ध असमिया नहीं, जिनमें न सिर्फ़ बांग्लापन शेष है, बल्कि जो लुंगी भी पहनते हैं, वे मियाँ हैं। ध्यान रहे, यह सब कुछ पुरुषों के बारे में ही है! लेकिन एक बार मर्दों से निबट लिया तो औरतों का हिसाब आसान है! इसीलिए मुसलमान मर्दों को ख़ास निशाना बनाया है।

इस सबके बीच ही उभर उठा है मियाँ कविता का स्वर। कहते हुए कि तुम हमें मियाँ कहकर पुकारते हो तो लो हमी ख़ुद को मियाँ कहते हैं! हम अपनी वह पहचान ढँकते नहीं जिसके चलते हम तुम्हारा निशाना बनते हैं। उसे हम और उजागर कर देते हैं।

चुनौती यह है कि अब जब हमने यह पहचान धारण कर ली है, क्या तुम हमसे नफ़रत करोगे! इस सवाल के जवाब से मेरे बारे में तो कुछ न मालूम होगा, तुम्हारी इंसानियत के बारे में ज़रूर कुछ मालूम होगा।

असम के भद्रजन कह रहे हैं कि यह जो ज़िद है ख़ुद को मियाँ कहने की और असमिया छोड़कर अपनी ख़ास ज़ुबान में लिखने की, वह विभाजनकारी है। उनका कहना है कि यह एक साज़िश है असमिया पहचान को खंडित करने की। अगर ये कवि सुशिक्षित हैं और असमिया में अच्छी तरह लिख पढ़ सकते हैं तो फिर अलग एक ज़ुबान में क्यों कविता लिखना

इस तरह उन्हें जो अपने ऊपर हिंसा की शिकायत भर कर रहे हैं, उलटा दोषी ठहराया जा रहा है। उनपर आरोप है कि वे असमिया भावना को ठेस पहुँचा रहे हैं। यह विचित्र तर्क है। जो पीढ़ियों से अपमान और हिंसा झेल रहे हैं, उनसे उसके बारे में जिस तरह वे बात करना चाहते हैं, उससे भी रोका जा रहा है।

मियाँ कवि असमिया जानते हैं लेकिन वे एक भाषा वह भी बोलते हैं जो बांग्ला, असमिया और मैमनसिंघी का मिश्रण है। क्या हम सबके पास ऐसी एक भाषा नहीं जो हमारे समुदाय या पास-पड़ोस के अलावा कोई इस्तेमाल नहीं करता क्या उसमें बोलना-लिखना हिंदी विरोध है क्या इसी गढ़ भाषाओं के अलग-अलग रूप भारत के सभी इलाक़ों में नहीं 

क्या असम में सिर्फ़ असमी भाषी हैं क्या बोडो एक भाषा नहीं मिसिंग, करबी, तिवा, आदि का क्या जो मणिपुरी, नागा, मिज़ो असम में हैं, क्या उन्हें अपनी भाषा का हक़ नहीं असम इस भाषाई विविधता को नष्ट करके क्या असम रहेगा

हमें लेकिन यह कहा जाएगा कि समस्या अलग भाषा से नहीं, अलग भाषा का प्रयोग प्रतिरोध के लिए इस्तेमाल करने और ख़ुद को अलग दिखलाने की इस प्रवृत्ति से है। क्या ये कवि ख़ुद को मियाँ कहकर असमी जनता को चिढ़ा नहीं रहे

मियाँ कवियों की चिंता समझने और उनके साथ हमदर्दी की जगह उनपर हमला किया जा रहा है। इससे पता चलता है कि प्रत्येक राष्ट्रवाद अंततः संकीर्ण और कठोर होता है। वह असमी राष्ट्रवाद भी हो सकता है।

सत्य हिंदी ऐप डाउनलोड करें