
मराठी भाषा को लेकर राज ठाकरे की पार्टी MNS मुंबई में फैला रही अराजकता
कुछ भी हो जाए महाराष्ट्र में विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं। अब नया हंगामा है मराठी भाषा का। इसकी शुरुआत इस बार राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने की है। इस पार्टी ने एक बार फिर राज्य में मराठी भाषा को अनिवार्य करने की मांग शुरू कर दी है। इसे लेकर राज ठाकरे की पार्टी के लोग मराठी न जानने वाले आम लोगों पर थप्पड़ तक बरसा रहे हैं। इस सिलसिले में सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हैं।
बँकेतील संपुर्ण व्यवहार हा मराठीतच व्हावा याकरिता मनसेकडून मिरा भाईंदर शहरातील सर्व बँक व्यवस्थापनेला निवेदन देण्यात आले.#RajThackeray #Amitthackray #mnsadhikrut #mnvsadhikrut #mirabhayandar pic.twitter.com/HIhjJiGluE
— Abhinand Ganesh Chavhan (@Abhinandchavhan) April 1, 2025
सबसे ताजा मामला है ठाणे के अंबरनाथ शहर का। बुधवार को अंबरनाथ में मनसे के कार्यकर्ता बैंक पहुंचे और मैनेजर से मराठी में बात करने की मांग की। इस पर बैंक के लोगों ने जब लॉजिक दिया कि वे लोग नेशनल बैंक हैं और किसी भी मानक भाषा में संवाद कर सकते हैं तो मनसे कार्यकर्ता और आक्रामक हो गए। चीज़ों को इधर-उधर करने लगे। एक वीडियो में मनसे का एक कार्यकर्ता बैंक के कर्मचारी पर हाथ चलाते हुए भी दिख रहा है।
इस घटना में दरयाफ्त किए जाने पर मनसे की स्थानीय इकाई ने इस घटना में अपनी भूमिका कबूल की है, हालांकि अभी तक यह नहीं पता चल पाया है कि इस मामले में कोई पुलिस शिकायत दर्ज की गई है या नहीं। इस घटना के बाद क्षेत्र में तनाव का माहौल ज़रूर बन गया है।
यह पहला मौका नहीं है जब मनसे ने मराठी भाषा को लेकर आक्रामक रुख अपनाया है। हाल ही में मुंबई के पवई इलाके में एक सुरक्षा गार्ड को मराठी न बोल पाने के कारण मनसे कार्यकर्ताओं ने पीट दिया। इस घटना का वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें कार्यकर्ताओं को गार्ड को थप्पड़ मारते हुए देखा गया।
A security guard in Mumbai’s Powai was slapped and humiliated by MNS workers- all because he couldn’t speak Marathi. Forced to apologize, the shocking video raises an important question: Does language decide your right to work and live in a state? Watch now.#marathi #Mumbai #MO pic.twitter.com/DxuBm8PBd3
— IndiaToday (@IndiaToday) April 1, 2025
गौर किए जाने वाली बात यह है कि 30 मार्च को गुड़ी पड़वा रैली में मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने इस मराठी भाषा वाद को हवा दी। उन्होंने मराठी भाषा को सरकारी कामकाज में अनिवार्य करने की मांग दोहराई। इसके बाद से पार्टी कार्यकर्ताओं ने अपने आंदोलन को और तेज कर दिया। मंगलवार को मनसे कार्यकर्ताओं ने यस बैंक का दौरा किया। मनसे के इन कार्यकर्ताओं ने प्रतीकात्मक रूप से अधिकारियों को फूल और पत्थर दिए। यह एक तरह की चेतावनी थी कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो प्रदर्शन और उग्र हो सकते हैं।
मराठी भाषा को लेकर को लेकर हो रहे हो-हंगामे में मनसे की स्टूडेंट विंग भी सक्रिय हो गई है। मनसे के छात्र नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने ठाणे जिला परिषद के शिक्षा अधिकारी से मुलाकात की। उन्होंने उन स्कूलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की जो छात्रों को मराठी बोलने से रोकते हैं।
इसके अलावा भी मनसे के कार्यकर्ताओं ने अलग-अलग हरकतें की। उन्होंने मंगलवार को जिले के विभिन्न बैंकों में पत्र वितरित किए, जिसमें यह मांग की गई कि ग्राहकों से बात करने के लिए मराठी को प्राथमिक भाषा बनाया जाए। उन्होंने एक बैंक के बाहर लगा बैनर भी हटा दिया क्योंकि उस पर मराठी भाषा में कोई टेक्स्ट नहीं था।
राज ठाकरे का मराठी मानूस एजेंडा 2006 से ही चालू है। उस समय राज ठाकरे ने 2006 में शिवसेना से अलग होकर मनसे की स्थापना की थी। 2008 में मनसे कार्यकर्ताओं ने रेलवे भर्ती परीक्षा में शामिल होने आए उत्तर प्रदेश और बिहार के छात्रों पर हमला कर दिया था, यह तर्क देते हुए कि महाराष्ट्र में नौकरियां पहले स्थानीय युवाओं को मिलनी चाहिए। इस घटना की पूरे देश में कड़ी आलोचना हुई थी।
मनसे ने मराठी सिनेमा को बढ़ावा देने के लिए मल्टीप्लेक्स पर भी दबाव बनाया और मांग की कि मराठी फिल्मों के लिए विशेष स्क्रीनिंग अनिवार्य की जाए। इस दबाव के चलते सिनेमाघर मालिकों को मराठी फिल्मों को प्राथमिकता देनी पड़ी।
इन सब हरकतों का फायदा राज ठाकरे को 2009 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में मिला था। उस चुनाव में मनसे ने 13 सीटें जीतीं, लेकिन उसके बाद से पार्टी की लोकप्रियता में गिरावट आई है।
इस पार बात करते हुए ध्यान देना जरूरी है कि पिछले कुछ सालों में महाराष्ट्र में भाजपा तथा शिवसेना (शिंदे और उद्धव ठाकरे गुट) जैसे दलों की बढ़ती पकड़ के कारण मनसे का वोट बैंक सिमटता जा रहा है। वर्तमान में मुंबई में मराठी मतदाता लगभग 36-40% हैं, लेकिन उनका समर्थन कई दलों में बंटा हुआ है, जिससे मनसे को नुकसान हुआ है।
इस समय जब मुंबई महानगरपालिका चुनाव नजदीक हैं। राज ठाकरे का मराठी मानूस प्रेम जागना और मराठी भाषा पर ज़ोर डालना एक पॉलिटिकल स्टंट माना जा रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह आक्रामक मनसे के लिए कितना लाभदायक होता है? क्या राज ठाकरे की पार्टी भाषा के नाम पर गुंडई कर कुछ हासिल कर पाएगी या लोग आराम से यह ट्रिक समझकर इसे नजरंदाज कर देंगे? क्या महाराष्ट्रवासी भाषा के नाम पर बंटने से खुद को बचा पाएंगे?