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क्या सोशल मीडिया पर ‘नोट के बदले वोट’ का प्रचार जायज़?

क्या सोशल मीडिया पर ‘नोट के बदले वोट’ का प्रचार जायज़?

क्या वोट के लिए मुफ़्त में सामान बाँटने जैसी पेशकश करना चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है? यदि नहीं है तो क्या इसे उल्लंघन के दायरे में नहीं होना चाहिए? यह सवाल एक ऐसे ही विज्ञापन के बाद उठ रहा है। 

क्या वोट के लिए मुफ़्त में सामान बाँटने जैसी पेशकश करना चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है? यदि नहीं है तो क्या इसे उल्लंघन के दायरे में नहीं होना चाहिए? यह सवाल एक ऐसे ही विज्ञापन के बाद उठ रहा है। 'माई फ़र्स्ट वोट फॉर मोदी' नाम के फ़ेसबुक पेज पर मोदी को वोट देने का वचन लेने पर मुफ़्त में सामान बाँटने की पेशकश की गयी है। यह सवाल तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब इस बार आचार संहिता में कुछ संशोधन कर इसके दायरे में अब सोशल मीडिया को भी लाया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा कह चुके हैं कि सोशल मीडिया पर कड़ी नज़र रखी जाएगी।

लोकसभा चुनाव की तारीख़ की घोषणा के दिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा था, ‘सोशल मीडिया पर प्रचार के लिए राजनीतिक दलों की ओर से किए गए ख़र्चों भी जोड़ा जाएगा। सभी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों को किसी भी राजनीतिक पार्टी के विज्ञापन को जारी करने की जानकारी देनी होगी और स्वीकृति मिलने के बाद ही वह ऐसा कर सकते हैं। गूगल और फ़ेसबुक को भी ऐसे विज्ञापन दाताओं की पहचान करने के लिए कहा गया है।’ उन्होंने यह भी कहा था कि इस बार फ़ेक न्यूज़ और हेट स्पीच पर नियंत्रण एवं निगरानी के लिए भी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों से कोई अधिकारी नियुक्ति करने को कहा गया है।

'वोट दो और टी-शर्ट जीतो'

तो क्या इस पर निगरानी रखी जा रही है? इस पर मीडिया में सोशल मीडिया पर चल रहे ऐसे विज्ञापनों पर लंबी-चौड़ी रिपोर्टें छपी हैं। 'ऑल्ट न्यूज़' ने फ़ेसबुक की विज्ञापन डाटा लाइब्रेरी को खंगालकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें 'माई फ़र्स्ट वोट फॉर मोदी' नाम के फ़ेसबुक पेज और वेबसाइट का ज़िक्र है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 'माई फ़र्स्ट वोट फॉर मोदी' फ़ेसबुक पेज ने मोदी को वोट देने का वचन लेने पर मुफ़्त में टी-शर्ट, बैग जैसे सामान बाँटने की पेशकश की है। इस पेज के अभियान और इसके पोस्ट से पता चलता है कि इसका लक्ष्य पहली बार वोट करने वाले युवकों को लुभाने का है। इस पेज के माध्यम से फ़ेसबुक पर चले विज्ञापन में कहा गया है कि जो भी मोदी के लिए वोट करने के लिए वचन लेगा उसे टी-शर्ट, बैज, बैकपैक, फ़ोन कवर और कैप जैसे प्रोडक्ट दिए जाएँगे। इन पर ‘मैं भी चौकीदार’ और ‘मोदी है तो मुमकिन है’ लिखा है। ये 'नमो मर्चन्डाइज़' के प्रोडक्ट बताये जाते हैं।

 - Satya Hindi

फ़ेसबुक पर ऐसे किया गया प्रचार।ऑल्ट न्यूज़/फ़ेसबुक

'नमो मर्चन्डाइज़' के ट्वीट को प्रधानमंत्री मोदी ने 26 मार्च को रिट्वीट कर अपने समर्थकों से ऑर्डर मंगाने का आह्वान किया था। बताया जाता है कि 'नमो मर्चन्डाइज़' प्रधानमंत्री के चुनावी अभियान का हिस्सा है। पैसे का भुगतान कर इसके प्रोडक्ट ख़रीदे जा सकते हैं।

न्यूज़ वेबसाइट  'द क्विंट' ने भी इस पर रिपोर्ट की है। इसमें कहा गया है कि इस विज्ञापन को चलाने वाला 'माई फ़र्स्ट वोट फॉर मोदी' फ़ेसबुक पेज बीजेपी का आधिकारिक पेज है या नहीं, यह साफ़ नहीं है, हालाँकि इस पेज का आधिकारिक पता वही बताया गया है जो बीजेपी के हेडक्वार्टर का पता 6ए, पंडित दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ के पास, नई दिल्ली, इंडिया 110002 है। इस पेज पर सिर्फ़ प्रधानमंत्री मोदी और उनकी योजनाओं की तारीफ़ों वाले पोस्ट हैं।

‘द क्विंट’ ने अपनी रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि 'माई फ़र्स्ट वोट फॉर मोदी' के अलावा दो ऐसे और भी फ़ेसबुक पेज हैं जिनका आधिकारिक पता बीजेपी हेडक्वार्टर का ही दर्ज है। एक है- 'नेशन विथ नमो' और दूसरा है-   'भारत के मन की बात'। इन तीनों फ़ेसबुक पेजों में से सिर्फ़ 'भारत के मन की बात' ही बीजेपी का आधिकारिक पेज है जिसे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने तीन फ़रवरी को लॉन्च किया था। लेकिन यह साफ़ नहीं है कि बाक़ी के दोनों पेज 'माई फ़र्स्ट वोट फॉर मोदी' और 'नेशन विथ नमो' सीधे तौर पर बीजेपी से जुड़े हैं या नहीं।

वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी और बीजेपी से जुड़े तीनों फ़ेसबुक पेजों ने एक महीने में फ़ेसबुक पर 12000 राजनीतिक विज्ञापनों पर क़रीब चार करोड़ रुपये ख़र्च कर दिये।

क्या इस पर चुनाव आचार संहिता लागू नहीं?

चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव की तारीख़ों की घोषणा करते समय सोशल मीडिया पर राजनीतिक गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए उठाए गये कई क़दमों का भी ज़िक्र किया था। सोशल मीडिया पर दिये जाने वाले राजनीतिक विज्ञापनों के ख़र्च का ब्यौरा उम्मीदवारों को नामाँकन भरते समय देना होगा। सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के राजनीतिक विज्ञापनों की निगरानी होगी।

इसके बाद फ़ेसबुक सहित सभी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ने अपने स्तर पर ही आठ प्रतिबद्धताओं वाला 'कोड ऑफ़ इथिक्स' स्वीकार किया और इसे लिखित रूप में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को सौंप दिया। 

हालाँकि न तो चुनाव आयोग और न ही कोड ऑफ़ इथिक्स में इसका ज़िक्र है कि यदि ग़ैर-राजनीतिक दल और जो उम्मीदवार नहीं हैं वह राजनीतिक विज्ञापन दें तो क्या कार्रवाई होगी?

राजनीतिक विज्ञापनों पर ख़र्च में बीजेपी सबसे आगे

ऑल्ट न्यूज़ ने फ़ेसबुक पर राजनीतिक विज्ञापन पर पिछले सप्ताह सबसे ज़्यादा ख़र्च करने वाले फ़ेसबुक पेजों की सूची भी प्रकाशित की है। ये या तो किसी राजनीतिक दल के फ़ेसबुक पेज हैं या फिर किसी दल के समर्थित। सबसे ज़्यादा ख़र्च करने वाले टॉप 20 पेजों ने 17-23 मार्च के बीच 1.1 करोड़ रुपये से ज़्यादा ख़र्च किये। इसमें बीजेपी समर्थित 'माई फ़र्स्ट वोट फॉर मोदी' ने सबसे ज़्यादा 46.62 लाख रुपये ख़र्च किये। वाईएसआर समर्थित इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी ने 17.52 लाख रुपये, बीजेपी के आधिकारिक फ़ेसबुक पेज भारत के मन की बात ने 9.68 लाख रुपये, बीजेडी के नवीन पटनायक ने 9.13 लाख रुपये, बीजेपी समर्थित नेशन विथ नमो ने 6.61 लाख रुपये, कांग्रेस के इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 5.28 लाख रुपये ख़र्च किये। बाक़ी के पजों ने भी ऐसी ही रक़म ख़र्च की।

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