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‘नया भारत मोर्चा’ के नाम पर बीजेपी-विरोधी पार्टियों को एक मंच पर लाएँगे केसीआर?

‘नया भारत मोर्चा’ के नाम पर बीजेपी-विरोधी पार्टियों को एक मंच पर लाएँगे केसीआर?

क्या तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चन्द्रशेखर राव (केसीआर) एक बार फिर  ग़ैर-बीजेपी, ग़ैर-कांग्रेस राष्ट्रीय मोर्चा बनाने की कोशिश में जुट गए हैं?

क्या तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चन्द्रशेखर राव (केसीआर) एक बार फिर  ग़ैर-बीजेपी, ग़ैर-कांग्रेस राष्ट्रीय मोर्चा बनाने की कोशिश में जुट गए हैं सूत्रों की मानें तो केसीआर ने नए सिरे से राष्ट्रीय स्तर पर तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। केसीआर के करीबी सूत्रों से पता चला है कि वह ‘नया भारत मोर्चा’ के नाम से बीजेपी और कांग्रेस विरोधी राजनीतिक पार्टियों को एक मंच पर लाने की कोशिश करेंगे।

‘नया भारत मोर्चा’

केसीआर ने ‘नया भारत मोर्चा’ के सिलसिले में वामपंथी नेताओं से बातचीत भी की है। उन्होंने केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के अलावा वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता सीताराम येचुरी और सीपीआई के बड़े नेताओं – सुरवरम सुधाकर रेड्डी और डी. राजा से बातचीत कर ली है। केसीआर की नज़र ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, जगन मोहन रेड्डी, स्टालिन, अखिलेश यादव, महबूबा मुफ़्ती जैसे बड़े नेताओं पर भी है।

केंद्र से नाराज दलों पर भरोसा

केसीआर को उम्मीद है कि केंद्र सरकार से कई मुद्दों को लेकर नाराज़ चल रही पार्टियाँ तीसरे मोर्चे में शामिल होंगी। सूत्रों का कहना है कि कई राज्यों के मुख्यमंत्री इस बात को लेकर काफी नाराज़ हैं कि केंद्र राज्यों को जीएसटी बकाया का भुगतान नहीं कर रही है। केंद्र के पास कई विकल्प होने के बावजूद  इस राशि का भुगतान न करने से राज्यों की आर्थिक स्थिति कमज़ोर हो रही है। कई राज्यों ने मुख्यमंत्री ने स्वयं प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर राज्यों को जीएसटी से हुए नुक़सान की पूरी भरपाई करने का अनुरोध किया है, लेकिन अभी तक केंद्र से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला है।

कुछ ग़ैर-बीजेपी राज्य सरकारों का आरोप है कि केंद्र सरकार आर्थिक मोर्च पर भेदभाव कर रही है। बीजेपी- शासित राज्यों की तुलना में ग़ैर-बीजेपी शासित राज्यों को कम साधन-संसाधन मिल रहे हैं।

कई मुख्यमंत्री इस बात से भी नाराज़ है कि केंद्र सरकार राज्यों को क़र्ज़ लेने की सलाह दे रही है। अनुभवी नेताओं का कहना है कि क़र्ज़ लेने से राज्यों की स्थिति की सुधरेगी नहीं बल्कि बिगड़ेगी। इतना की नहीं, इससे राज्यों के संसाधनों पर भी बुरा असर पड़ेगा।

बिजली संशोधन विधेयक

बड़ी बात यह है कि केंद्र और राज्यों के बीच सिर्फ जीएसटी को लेकर ही नहीं, कई अन्य मुद्दों को लेकर भी टकराव की स्थिति है। प्रस्तावित बिजली संशोधन अधिनियम 2020 को लेकर भी कई क्षेत्रीय दल काफी नाराज़ हैं। तेलंगाना राष्ट्र समिति, शिव सेना, बीजू जनता दल, वामपंथी पार्टियाँ, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके जैसी कई पार्टियों का कहना है कि इस क़ानून के लागू होने पर बिजली राज्य का विषय न रहकर केंद्र का विषय होगी।

क्षेत्रीय दलों का कहना है कि बिजली विधेयक से न सिर्फ संघीय ढाँचे को नुक़सान पहुँचेगा, बल्कि राज्यों के हितों पर भी बुरा असर पड़ेगा। केंद्र की नई शिक्षा नीति और कृषि नीति को लेकर भी कई क्षेत्रीय पार्टियों में गुस्सा है।

विकल्प की तलाश

केसीआर का मानना है कि अगर सभी क्षेत्रीय दल मिलकर लड़े, तभी राज्यों के अधिकार बचाए जा सकते हैं। उनका यह भी मानना है कि देशभर में कांग्रेस कमज़ोर पड़ गई है और वह बीजेपी के ख़िलाफ़ एक ताक़तवर मोर्चा नहीं खड़ा कर सकती हैं। क्षेत्रीय पार्टियाँ ही मिलकर बीजेपी का विकल्प बन सकती हैं।

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि केसीआर ने अपने बेटे के. तारक रामा राव (केटीआर) को अपने राजनीतिक वारिस और तेलंगाना के नए मुख्यमंत्री के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है। पार्टी और सरकार में सभी बड़े फ़ैसले केटीआर ले रहे हैं। उन्हें पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है और मंत्री के नाते वे सरकार की बड़ी बैठकों में बड़े फैसले लेते हैं। 

सूत्रों का कहना है कि केसीआर सही समय के इंतज़ार में हैं और यह समय आते ही वे अपने बेटे को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप कर केंद्र की राजनीति में आ जाएँगे।

राज्य चुनावों पर नज़र

सूत्रों ने बताया कि केसीआर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के परिणाम देखने के बाद बड़ा फ़ैसला करेंगे। अगले साल पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम में विधानसभा चुनाव होंगे। सूत्रों के मुताबिक, केसीआर का आंकलन है कि इन राज्यों में बीजेपी का प्रदर्शन ख़ास नहीं होगा और इन चुनावों के परिणामों का असर दूसरे राज्यों में बीजेपी की लोकप्रियता पर भी पड़ेगा।

यही सही समय होगा बिना बीजेपी और बिना कांग्रेस वाला नया राष्ट्रीय मोर्चा बनाया जाये। कई क्षेत्रीय पार्टियों के मुखियाओं को लगता है कि अगले साल के विधानसभा चुनावों के बाद देश में राजनीतिक समीकरण बदलेंगे और कई पार्टियाँ बीजेपी और कांग्रेस का साथ छोड़ देंगी।

केंद्र की राजनीति करेंगे केसीआर

एनडीए और यूपीए छोड़ने वाली पार्टियाँ तीसरे मोर्चे में शामिल होंगी। केसीआर चाहते हैं कि अगर वह अभी से तीसरे मोर्चे की अगुवाई करें तो आगे चलकर केंद्र में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का भी कहना केसीआर तीसरे मोर्चे का नेतृत्व  करने में  सक्षम हैं। केसीआर के पास 40 साल का राजनीतिक अनुभव है। एक कामयाब क्षेत्रीय पार्टी के मुखिया हैं।

एक बड़े और सफल जन आंदोलन का नेतृत्व किया है। केंद्रीय मंत्री रहे हैं। 10 साल तक सांसद रहे हैं। कई सालों तक विधायक और मंत्री रहे हैं। मौजूदा समय में वह मुख्यमंत्री हैं। हिन्दी और अंग्रेज़ी पर ज़बरदस्त पकड़ है। अच्छे वक्ता हैं और गठबंधन की राजनीति के सभी पहलुओं को अच्छे से समझते हैं। 

पहले भी की थी कोशिश

ग़ौर करने वाली बात यह कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी केसीआर ने राष्ट्रीय स्तर पर तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश की थी। वह ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश यादव, नवीन पटनायक, पिनराई विजयन, स्टालिन, देवेगौड़ा जैसे दिग्गज नेताओं से भी मिले भी थे। लेकिन उस समय तेलुगु देशम पार्टी के मुखिया चंद्रबाबू नायुडु ने केसीआर की कोशिश में अड़चने पैदा की थीं।

चंद्रबाबू ने कई नेताओं को तीसरे मोर्चे के बजाय नरेंद्र मोदी को हराने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे में लामबंद करने की कोशिश की थी। इन कोशिशों की वजह से केसीआर ने अपने पैर पीछे खींच किए थे। चूंकि अब चंद्रबाबू नायुडु हाशिये पर हैं और पिछले चुनाव में क़रारी हार के बाद राष्ट्रीय राजनीति में उन्हें तवज्जो देने वाला कोई नहीं है, केसीआर को लगता है कि इस बार तीसरे मोर्चे वाले उनकी कोशिश कामयाब होगी।

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