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गिलानी के बाद कश्मीर में क्या होगा?

गिलानी के बाद कश्मीर में क्या होगा?

सबसे बड़े अलगाववादी नेताओं में से एक और पाकिस्तान समर्थक सैयद अली शाह गिलानी का निधन होने के बाद जम्मू कश्मीर में क्या बदलेगा?

सैयद अली शाह गिलानी 1947 के बाद से कश्मीर के अकेले ऐसे नेता रहे थे जिन पर दिल्ली का एजेंट होने का आरोप कभी नहीं लग पाया। वे ताउम्र पाकिस्तानपरस्त के तौर पर ही जाने गए। गिलानी न होते तो कश्मीरी अलगाववादी आंदोलन भी शायद इतना लंबा न चल पाता। उनके न रहने के बाद यह देखना रोचक होगा कि कश्मीर में अलगाववादी राजनीति क्या करवट लेगी?

गिलानी जमात-ए-इसलामी कश्मीर की ओर से 1972 में सोपोर से विधानसभा के लिए चुने गए थे। 1977 में दोबारा वे इसी सीट से चुनाव जीते। 1983 में वे हारे लेकिन 1987 में वे फिर विधानसभा पहुंचे। इस बार गिलानी मुसलिम यूनाइटेड फ्रंट (एमयूएफ) नाम से स्थानीय दलों का मोर्चा बनाकर चुनाव में उतरे थे। इस चुनाव में एमयूएफ को आठ सीटें भी मिली थीं और यही वह चुनाव है जिसमें सैयद सलाहुद्दीन (यूसुफ शाह) को चुनाव हराने का आरोप लगा। सीट थी श्रीनगर की अमीराकदल और यहाँ से जीते थे नेशनल कांफ्रेंस के गुलाम मोहिउद्दीन शाह। नतीजों की घोषणा से पहले यूसुफ शाह और यासीन मलिक समेत उनके दोनों काउंटिंग एजेंटों को गिरफ्तार कर लिया गया था। बाद में गिलानी के नेतृत्व में सभी आठ विधायकों ने चुनावों में धांधलेबाज़ी का आरोप लगा कर इस्तीफा दे दिया था।

यह वह समय था जब कश्मीर धधकना शुरू हुआ था। 2002 में एक बातचीत के दौरान गिलानी ने इन पक्तियों के लेखक से कहा था कि सब किया-धरा दिल्ली का है। अगर निष्पक्ष गिनती होती तो एमयूएफ ज़्यादा से ज़्यादा 12-15 सीटें जीत जाता। 12-15 सीटें लेकर हम असेंबली में क्या कर लेते? लेकिन दिल्ली ने हमको चुनाव हराकर कश्मीर में ज़मीन मुहैया कराने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्म पर खड़ा कर दिया। हम यही चाहते थे।

कश्मीर में अलगाववाद के लिए आइडियोलॉजिकल (इसलामी) आधार मज़बूत करने का काम भी गिलानी ने ही किया। इससे पहले तक बात सिर्फ़ कश्मीरियों के साथ दिल्ली की वादाख़िलाफ़ी की होती थी। 

हिजबुल मुजाहिदीन को सैद्धांतिक जामा पहनाने के बाद गिलानी ने ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस का गठन कर अलगाववाद की तहरीक को मज़बूती ही नहीं दी बल्कि एक समय स्थिति यह हो गई थी कि हुर्रियत के बिना कश्मीर पर कोई बात करना बेमानी माना जाने लगा था। 

कश्मीर में हड़ताल का सिलसिला भी गिलानी ने ही शुरू किया था और ये हड़तालें एक वक़्त कश्मीर की आवाज़ सरीखी नज़र आने लगी थीं।

गिलानी बहुत ही ज़िंदादिल लेकिन अड़ियल व्यक्तित्व वाले थे। अब्दुल गनी लोन, मौलवी उमर फारूक, यासीन मलिक समेत लगभग सभी वरिष्ठ अलगाववादी नेताओं ने भारतीय पासपोर्ट स्वीकार किया लेकिन गिलानी की शर्त थी कि वे पासपोर्ट स्वीकार कर लेंगे लेकिन उसमें नागरिकता कश्मीरी लिखी होनी चाहिए। 2006 में विशेष व्यवस्था के तहत भारत सरकार ने उनको हज की अनुमति दी थी। कश्मीर में 2002 के विधानसभा चुनाव के बाद से ही तमाम अलगाववादी नेताओं से उनका भरोसा चरमराने लगा था। चाहे प्रो. अब्दुल गनी बट हों, मौलाना अब्बास अंसारी, मीरवाइज उमर फारुक या यासीन मलिक आदि हों। इसके चलते हुर्रियत दो फाड़ भी हुआ।

लेकिन अनुच्छेद 370 को ख़त्म किये जाने के बाद तो गिलानी तमाम नेताओं से निराश हो गये। उन्होंने इस पार की हुर्रियत और पाकिस्तान के कब्जे के कश्मीर वाली हुर्रियत को खुला पत्र लिखकर निराशा जाहिर की थी। इसके बाद जून 2020 में उन्होंने हुर्रियत से अपने को अलग कर लिया। अस्वस्थ रह रहे गिलानी को इस बात से जबरदस्त झटका लगा कि जो अलगाववादी गिरफ्तार नहीं किये गये, वे भी पूरे मामले पर न कोई बयान दे रहे हैं और न ही कोई प्रतिरोध खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। सबसे ज़्यादा निराशा उनको हुई मीरवाइज उमर फारुक के उस वीडियो से जिसमें बैक ग्राउंड में बॉलीवुड की फ़िल्म थ्री ईडियट्स का गाना बज रहा था।

गिलानी के न रहने को किस तरह देखा जाए 

भारत सरकार के लिए रास्ते अब और आसान हो जाएँगे। कश्मीरी अलगाववादी लीडरशिप के सबसे मज़बूत स्तंभ के न रहने से बाक़ी नेताओं के लिए सुविधानुसार रास्ते चुनने में हर समय खड़ी रहने वाली अड़चन ख़त्म हो गई। दरअसल, अलगाववादियों में गिलानी को ही ज़मीनी सियासी नेता माना जाता था। अगर कोई नई लीडरशिप गिलानी के जाने से बने शून्य को नहीं भर पाई तो गुपकार एलायंस की पिच मज़बूत होगी और भारत सरकार के लिए सुविधा। कश्मीरियों के लिए इसका मतलब समझने के लिए थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा।

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