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भारतीय मूल के इतने ताक़तवर कैसे कि ब्रिटिश पीएम की दौड़ में?

भारतीय मूल के इतने ताक़तवर कैसे कि ब्रिटिश पीएम की दौड़ में?

ब्रिटेन में भारतीय मूल या पाकिस्तानी मूल के आप्रवासी इतने ताक़तवर कैसे हो गए कि वे प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में आगे चल रहे हैं?

बोरिस जॉनसन के इस्तीफा देते ही ब्रिटेन में अगले प्रधानमंत्री के नाम पर चर्चा तेज हो गई है। इसमें भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक ऋषि सुनाक और पाकिस्तानी मूल के ब्रिटश नागरिक साजिद जावीद का नाम भी सामने आ रहा है। यदि इनमें से कोई भी ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनता है तो यह पहला मौक़ा होगा कि भारतीय उपमहाद्वीप का कोई नेता इस पद पर पहुँचेगा। तो सवाल है कि ब्रिटेन में विदेशी मूल के लोग क्या इतनी ताक़तवर स्थिति में पहुँच गए हैं कि वे देश के प्रमुख पद पर पहुँचेंगे?

ब्रिटेन में आप्रवासियों की कैसी है स्थिति और ऐसी अहम स्थिति में कैसे पहुँचे, यह जान लेने से पहले यह जान लें कि मौजूदा राजनीतिक हालात कैसे बदले हैं।

मौजूदा राजनीतिक संकट जिसके इस्तीफ़े के साथ शुरू हुआ वह शख्स भारतीय मूल के ऋषि सुनाक हैं। सुनाक ने राजकोष के चांसलर या सामान्य अर्थों में कहें तो वित्तमंत्री के रूप में इस्तीफा दिया। सुनाक के साथ ही स्वास्थ्य मंत्री साजिद जावीद ने भी इस्तीफा दे दिया और इसी के साथ बोरिस जॉनसन की सरकार संकट में आ गई। सुनाक के इस्तीफ़े के बाद एक एक कर कई मंत्रियों और शीर्ष अधिकारियों ने इस्तीफ़ा दे दिया। और फिर बोरिस जॉनसन को भी इस्तीफा देना पड़ा। 

इसके बाद जिन लोगों के नाम अगले प्रधानमंत्री के तौर पर चल रहे हैं उसमें ऋषि सुनाक का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। इनके साथ साजिद जावीद का भी नाम आ रहा है। तो सवाल है कि भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के ब्रिटेन में इतने ऊँचे ओहदे के लिए नाम आने की वजह क्या है?

एक वजह तो यही है कि सुनाक और जावीद जैसे लोगों ने पार्टी में अपने दम पर जगह बनाई है। मिसाल के तौर पर ऋषि सुनक ने जॉनसन के चुनाव प्रचार में अहम भूमिका निभाई थी। ज़्यादातर समय उन्हें प्रेस ब्रीफिंग में भी देखा जाता था। 

कई बार ऐसा हुआ कि ऋषि ने बोरिस की जगह टीवी डिबेट में हिस्सा लिया। ब्रेक्सिट का पुरजोर समर्थन करके वह अपनी पार्टी में ताक़तवर बन गए थे। उन्होंने ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से बाहर करने की बोरिस जॉनसन की नीति का समर्थन किया था।

साजिद जावीद की भी ब्रिटेन की राजनीति में ताक़तवर नेता के तौर पर हैसियत है।

दूसरी वजह यह है कि ब्रिटेन में आप्रवासियों की संख्या काफ़ी बढ़ी है। इसमें भी ख़ासकर भारत और पाकिस्तान से वहाँ बसने वालों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है। 

ब्रिटेन में भारतीय प्रवासी सबसे बड़े जातीय अल्पसंख्यक समुदायों में से एक है। 2011 की जनगणना के अनुसार ब्रिटेन में भारतीय मूल के लगभग 1.5 मिलियन लोग रहते हैं जो ब्रिटेन की कुल जनसंख्या के लगभग 1.8% है। यह जनसंख्या बड़ी आर्थिक ताक़त भी रखती है। भारतीय मूल के लोगों की सिर्फ़ इतनी आबादी ब्रिटेन के सकल घरेलू उत्पाद में 6% तक का योगदान देती है। ब्रिटेन में भारतीय प्रवासियों की कंपनियाँ 1.74 से अधिक लोगों को रोज़गार देती हैं। खुद ऋषि सुनाक और उनकी पत्नी ही ब्रिटेन के बड़े उद्योगपतियों में आते हैं। इनके अलावा वहाँ के सबसे बड़े उद्योगपतियों में भारतीय मूल के हिंदुजा ब्रदर्स, लक्षमी मित्तल जैसे दिग्गज धन कुबेर भी हैं।

भारतीय मूल के लोगों की संख्या कितनी है, यह इससे भी समझा जा सकता है कि ब्रिटेन की मुख्यधारा में धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति, व्यंजन, सिनेमा, भाषा, धर्म, दर्शन, प्रदर्शन कला आदि की झलक मिलने लगी है। जब अर्थव्यवस्था और संस्कृति पर इतना असर होगा तो राजनीति भला कैसे अछूती रह सकती है। 2019 में ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में भारतीय मूल के 15 सदस्य थे।

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