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चीनी जहाज जा रहा श्रीलंकाई बंदरगाह, भारत चिंतित क्यों?

चीनी जहाज जा रहा श्रीलंकाई बंदरगाह, भारत चिंतित क्यों?

एक चीनी अनुसंधान जहाज के दक्षिणी श्रीलंका में के हंबनटोटा बंदरगाह पर जाने से भारत क्यों चिंतित है? आख़िर चीन का यह जहाज इतना अहम क्यों है?

एक चीनी अनुसंधान और सर्वेक्षण जहाज 11 अगस्त को दक्षिणी श्रीलंका में चीनी संचालित हंबनटोटा बंदरगाह जा रहा है। इस वजह से भारत की चिंताएँ बढ़ी हुई लगती हैं। भारत ने कहा है कि वह स्थिति की बारीकी से निगरानी कर रहा है। हंबनटोटा बंदरगाह को लेकर पहले भी भारत और चीन के बीच तनाव हो चुका है। हालाँकि यह तनाव ज़्यादा नहीं बढ़ा था। तो क्या इस बार भी यह मामला पहले की तरह ही है?

यह हंबनटोटा बंदरगाह दक्षिणी श्रीलंका में पूर्व-पश्चिम समुद्री मार्ग के क़रीब है। इस बंदरगाह का निर्माण 2008 में शुरू हुआ था, जिसके लिए चीन ने एक बड़ा कर्ज दिया था। इसको बनाने में चीन हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी (सीईसी) और चीन हाइड्रो कॉर्पोरेशन नाम की सरकारी कंपनियों ने एक साथ मिलकर काम किया था।

इस परियोजना के शुरू होने के समय व्यवहारिकता को लेकर किए गए अध्ययन में उपयुक्त नहीं पाया गया था। अध्ययन में बताया गया था कि इतनी महंगी परियोजना व्यवहारिक रूप से सही नहीं है। ऐसे में बार-बार होने वाले नुकसान के बहाने, एक विस्तृत योजना तैयार की गई ताकि चीन इस बंदरगाह के स्वामित्व को 99 वर्षों के लिए ले सके। ऐसे में बंदरगाह के प्रबंधन और संचालन की जिम्मेदारी पूरी तरह से चीन की कंपनियों के हाथ में चली गई।

इसी हंबनटोटा बंदरगाह पर चीनी जहाज जा रहा है। डेकन हेराल्ड ने ख़बर दी है कि एनालिटिक्स वेबसाइट मरीन ट्रैफिक के अनुसार, 11 अगस्त को अनुसंधान और सर्वेक्षण जहाज युआन वांग-5 दक्षिणी श्रीलंका में चीनी संचालित हंबनटोटा पोर्ट में डॉक करने वाला है। भारतीय मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि नई दिल्ली को चिंता थी कि जहाज का इस्तेमाल उसकी गतिविधियों की जासूसी करने के लिए किया जाएगा और उसने कोलंबो में शिकायत दर्ज कराई थी। 

इस पर श्रीलंका की ओर से सफाई आई है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार श्रीलंका के रक्षा मंत्रालय के मीडिया प्रवक्ता कर्नल नलिन हेराथ ने कहा है कि श्रीलंका भारत की चिंता को समझता है क्योंकि जहाज सैन्य प्रतिष्ठानों की निगरानी करने में सक्षम है, लेकिन यह एक नियमित अभ्यास है।

कर्नल हेराथ ने कहा, 'भारत, चीन, रूस, जापान और मलेशिया से समय-समय पर नौसेना के जहाजों ने अनुरोध किया है और इसलिए हमने चीन को अनुमति दी है। जब हमारे रास्ते में एक परमाणु-सक्षम जहाज आ रहा हो तभी हम पहुँच से इनकार कर सकते हैं। यह परमाणु सक्षम जहाज की तरह नहीं है।' उन्होंने यह भी कहा है कि चीन ने श्रीलंका को सूचित किया है कि वे हिंद महासागर में निगरानी और नेविगेशन के लिए जहाज भेज रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि श्रीलंका के रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा है कि चीनी जहाज 'बेहद सक्षम, उन्नत नौसैनिक पोत है जिसमें बहुत सारे परिष्कृत हिस्से हैं।' 

बता दें कि इसी तरह की स्थिति 2014 में सामने आई थी जब दो चीनी पनडुब्बियाँ हंबनटोटा पोर्ट पर आई थीं। इससे तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई थी। चीन ने तब श्रीलंका को भी यह नहीं बताया था कि उन्होंने एक पनडुब्बी भेजी है। तब से श्रीलंका के बंदरगाहों पर चीनी पनडुब्बी का ऐसा कोई दौरा नहीं हुआ है।

भारत ने यह साफ़ कर दिया है कि वह भारत की सुरक्षा और आर्थिक हितों पर किसी भी असर की बारीकी से निगरानी करेगा और उनकी सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय करेगा।

भारत को श्रीलंका में चीन के बढ़ते प्रभाव पर संदेह बना हुआ है। 1.4 अरब डॉलर के हंबनटोटा बंदरगाह सहित बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए बीजिंग का बड़ी मात्रा में धन बकाया है। ऋण चुकता करने में असमर्थ होने के बाद श्रीलंका ने 2017 में मुख्य पूर्व-पश्चिम अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लेन के साथ स्थित बंदरगाह पर एक चीनी कंपनी को 99 साल का पट्टा दिया। भारत के लिए यह चिंतित करने वाली घटना रही है और यही वजह है कि इससे भारत सशंकित रहता है। भारत के सशंकित होने की एक बड़ी वजह यह भी है कि चीन विस्तारवादी नीति अपना रहा है और हिंद महासागर में अपने प्रभाव बढ़ाना चाहता है। हंबनटोटा बंदरगाह सामरिक रूप से काफी अहम है। इसलिए भारत की चिंताएँ भी गैर वाजिब नहीं जान पड़ती हैं।

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