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भारत-चीन में बीच-बचाव की पेशकश ट्रम्प ने नादानी में की या यह कोई रणनीति है?

भारत-चीन में बीच-बचाव की पेशकश ट्रम्प ने नादानी में की या यह कोई रणनीति है?

भारत और चीन के बीच मध्यस्थता की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की बुधवार को की गई पेशकश को इसलिये हलके में नहीं लिया जाना चाहिये कि वह नादानी में अक्सर ऐसा बोलते हैं।

भारत और चीन के बीच मध्यस्थता की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की बुधवार को की गई पेशकश को इसलिये हलके में नहीं लिया जाना चाहिये कि वह नादानी में अक्सर ऐसा बोलते हैं। इसके पहले कई बार डोनल्ड ट्रम्प भारत और पाकिस्तान के बीच भी मध्यस्थता की पेशकश कर चुके हैं और भारत इसे ठुकरा चुका है। इसलिये नहीं कह सकते कि राष्ट्रपति ट्रम्प को इस बात का अहसास नहीं होगा कि भारत और चीन के बीच सीमा तनाव को दूर करने के लिये अपनी सेवाएँ देने की उनकी पेशकश को चीन तो ठुकरा ही देगा भारत भी स्वीकार नहीं करेगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ट्वीट के ज़रिये बीच-बचाव की पेशकश करने के पहले भारत और चीन के बीच उभरते हालात पर विश्व समुदाय की चिंता से अमेरिकी प्रशासन ने चीन और भारत को एक साथ सूचित किया था। यहाँ राजनयिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि  राष्ट्रपति ट्रम्प के अमेरिकी प्रशासन ने चीन पर दबाव बनाने के लिये इसका इस्तेमाल किया है और एक सुविचारित रणनीति के तहत राष्ट्रपति ट्रम्प से बीच-बचाव की पेशकश का ट्वीट जारी करवाया है। यह महज संयोग नहीं है कि डोनल्ड ट्रम्प का ताज़ा ट्वीट जारी होने के वक़्त ही पेइचिंग में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव को लेकर टिप्पणी करते हुए चीन का तेवर नरम करने के संकेत दिये थे। इसके साथ ही नई दिल्ली में चीनी राजदूत सुन वेईतुंग ने भी एक समारोह को सम्बोधित करते हुए सीमा पर ताज़ा तनातनी पर टिप्पणी करते हुए नरम रवैया दिखाते हुए कहा कि भारत और चीन के बीच सामरिक तौर पर परस्पर विश्वास बढ़ाने की ज़रूरत है और कभी भी मतभेदों की छाया को आपसी सहयोग पर नहीं पड़ने दें।

पर्यवेक्षक चीनी विदेश मंत्रालय की नवीनतम टिप्पणी और राजदूत सुन वेई तुंग के ताज़ा बयान को भारत चीन विवाद में बढ़ती अमेरिकी रुचि से भी जोड़ कर देखते हैं। अमेरिकी राजनयिकों को भली-भाँति पता है कि चीन अमेरिकी हस्तक्षेप को कभी स्वीकार नहीं करेगा लेकिन इसके बावजूद राष्ट्रपति ट्रम्प से मध्यस्थता की पेशकश का ट्वीट जारी करवाया गया। इसके पीछे अमेरिका का उद्देश्य चीन को यह बताना था कि भारत चीन सीमा तनाव पर उसकी नज़र है। ट्वीट के बहाने अमेरिका ने चीन पर राजनयिक दबाव बनाने की ही कोशिश की है। भारत के साथ सामरिक साझेदारी के अनुरूप अमेरिका ने इसके पहले भी चीन के ताज़ा आक्रामक रुख की निंदा की थी।

भारत चीन सीमा तनाव पर अमेरिकी प्रशासन ने पिछले सप्ताह  टिप्पणी करते हुए कहा था कि ताज़ा विवाद चीन की बढ़ती आक्रामकता और चिंतित करने वाला रवैया का सूचक है। अमेरिकी विदेश विभाग में आला राजनयिक एलिस वेल्स के इस कथन से साफ़ होता है कि लद्दाख में भारत चीन सैन्य तनातनी पर अमेरिकी प्रशासन की तीखी नज़र लगी है और वह इस बारे में भारत और चीन से सम्पर्क बनाए हुए है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस आशय का संकेत अपने ट्वीट संदेश में दिया है। राजदूत एलिस वेल्स ने यह भी अहम टिप्पणी की कि चीन के इसी बर्ताव की वजह से समान विचार वाले देश चुनिंदा राजनयिक गुटों में लामबंद होने लगे हैं। मिसाल के तौर पर उन्होंने कहा कि भारत–जापान और अमेरिका के बीच त्रिपक्षीय गुट के अलावा भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच चतुर्पक्षीय गुट भी सक्रिय हो चुका है।

एलिस वेल्स के मुताबिक़ चाहे वह दक्षिण चीन सागर हो या फिर भारत चीन सीमांत इलाक़ा हो, वे चीन के रवैये को उकसाने वाला और चिंताजनक मानते हैं और इससे सवाल उठता है कि कैसे चीन अपनी बढ़ती ताक़त का इस्तेमाल करना चाहता है।

एलिस वेल्स के मुताबिक़ भारत न केवल अमेरिका की दक्षिण एशिया रणनीति का अहम खिलाड़ी है, बल्कि अमेरिका के हिंद प्रशांत क्षेत्र के नज़रिये का मुख्य ध्रुव भी है। अमेरिका न केवल भारत के एक विश्व ताक़त के तौर पर उभरने का स्वागत करता है बल्कि क्षेत्र में सुरक्षा प्रदान करने वाले देश के तौर पर भी देखता है इसलिये अमेरिका ने भारत के साथ सामरिक साझेदारी को गहरा करने की अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है।

अमेरिकी राजनयिक विश्लेषक अक्सर कहते हैं कि चीन के उदय और विस्तारवादी नीतियों पर आँच डालने के लिये भारत को बढ़ावा देना ज़रूरी है। यही वजह है कि अमेरिका ने एशिया प्रशांत इलाक़े का नाम बदलकर हिंद प्रशांत इलाक़ा कहा और इसके लिये विशेष रणनीति में भारत को अहम स्थान दिया है। इसी के अनुरूप भारत और चीन की सेनाएँ जब आमने सामने होने लगी हैं तब अमेरिका ने एक अहम हस्तक्षेप किया है।

दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादी वाले भारत और चीन दुनिया की दो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के अलावा बड़ी सैनिक ताक़तें भी हैं। भले ही चीन की सैनिक ताक़त के मुक़ाबले भारत काफ़ी कमज़ोर है लेकिन इतनी ताक़त तो है ही कि किसी सैन्य टकराव में भारत चीन को लहूलुहान कर दे। दोनों देशों के बीच सैन्य झड़प का मतलब है कि पूरी दुनिया पर व्यापक अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष असर होना। दोनों देश परमाणु हथियारों से लैस हैं और दोनों देशों के पास लम्बी दूरी की परमाणु बैलिस्टिक मिसाइलें भी हैं। इसलिये युद्ध का नतीजा किसी भी देश के प्रतिकूल जाने लगेगा तो वह देश दुश्मन देश पर परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल चलाने से नहीं हिचकेगा। भारत की परमाणु ताक़त से चीन अवगत है और उसे पता है कि भारत अपने सामरिक हितों की रक्षा के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार होगा।

इसलिये भारत और चीन के बीच सैन्य तनातनी ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का बुधवार को जारी ताज़ा ट्वीट इसी बात की ओर इशारा करता है कि अमेरिकी प्रशासन चीन पर अप्रत्यक्ष दबाव डालना चाहता है कि वह भारत के साथ सीमा मसले को तुल नहीं दे। वास्तव में अमेरिका को यह भी चिंता होगी कि चीन यदि भारत को ताज़ा विवाद में झुकाने में कामयाब हो गया तो इससे उसकी हिंद प्रशांत रणनीति पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति का ताज़ा हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि अमेरिकी प्रशासन इस शंका को लेकर चिंतित है कि  भारत और चीन के बीच बढ़ती तनातनी कोविड-19 महामारी के मौजूदा दौर में पूरी दुनिया के लिये एक और बड़ी त्रासदी साबित होगी।

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