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कोई प्रोफ़ेसर कैसे इस माहौल में पढ़ा सकता है ? 

कोई प्रोफ़ेसर कैसे इस माहौल में पढ़ा सकता है ? 

कॉलेजों के क्लासरूम में टीचरों का पढ़ाना बहुत बड़ा संकट बनने जा रहा है। कुछ छात्र उस हिन्दुत्ववादी एजेंडे के तहत ही पढ़ना और सुनना चाहते हैं, जिसके लिए उन्हें तैयार किया गया है। लेकिन कोई टीचर किसी धार्मिक एजेंडे के तहत क्लासरूम में कैसे पढ़ा सकता है। स्तंभकार और चिन्तक अपूर्वानंद ने यही मसला इस बार उठाया है। जानिएः 

कोल्हापुर की प्रोफ़ेसर तेजस्विनी देसाई के साथ जो हुआ,वह हम अध्यापकों में किसी के भी साथ हो सकता है। कोल्हापुर इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में भौतिक शास्त्र की अध्यापिका तेजस्विनी देसाई को तब तक के लिए अवकाश पर भेज दिया गया है जब तक उनके ख़िलाफ़ जाँच पूरी नहीं हो जाती। लेकिन यह जाँच किस चीज़ की है?

एक दिन कक्षा में प्रोफ़ेसर देसाई से छात्रों ने धार्मिक भेदभाव पर चर्चा के लिए कहा। उन्होंने बतलाया कि इसके पहले वे आपस में कुछ विषयों पर चर्चा कर रहे थे और आगे भी विचार विमर्श जारी रखना चाहते थे। वे तैयार हो गईं और उनसे जेंडर के आधार पर भेदभाव पर चर्चा का प्रस्ताव दिया। छात्रों ने धार्मिक भेदभाव पर ही चर्चा के लिए ज़ोर दिया।

यह विषय आजकल कितना नाज़ुक है, बताने की ज़रूरत नहीं। लेकिन प्रोफ़ेसर देसाई तैयार हो गईं। इसके बावजूद कि अभी कोल्हापुर में हिंसा हुई थी।कारण था किसी ने औरंगज़ेब की तस्वीर अपने किसी सोशल मीडिया खाते में लगा ली थी। इससे राष्ट्रवादी भावनाएँ या हिंदू भावनाएँ आहत हो गईं और हिंसा भड़क उठी। उस कोल्हापुर में इस विषय पर चर्चा के लिए तैयार होना साहस की बात है। लेकिन जैसा हम अध्यापकों का स्वभाव है, अपने छात्रों से चर्चा में हमें किसी हिचक क्यों होनी चाहिए?

चर्चा में कुछ छात्रों ने मुसलमानों के बारे में वही धारणा दुहराई जो बाहर हिंदू समाज में प्रचलित  है: मुसलमान बलात्कारी होते हैं, हिंसक होते हैं। यही नहीं, उन्होंने आगे कहा कि बाबरी मस्जिद को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर गिराया गया था।

प्रोफ़ेसर देसाई ने इसके जवाब में एक बहुत मामूली सी बात कही कि बलात्कारी किसी भी धर्म के हो सकते हैं। वे देशमुख और पाटिल समुदाय के भी  हो सकते हैं। लेकिन वे छात्र अपनी बात पर अड़े रहे कि मुसलमान अपराधी, हिंसक, बलात्कारी होते हैं, वे हिंदुओं के त्योहारों में अड़ंगा लगाते हैं।

प्रोफ़ेसर देसाई ने अगर इस बात को काटा तो ठीक ही किया। दो कारणों से। वे इसे लेकर भी चिंतित थीं कि कक्षा में मुसलमान छात्रों को इस चर्चा से असुविधा हो रही होगी या अपमान का अनुभव भी हो रहा होगा। उसके अलावा यह बात तो थी ही कि यह धारणा पूरी तरह ग़लत और मुसलमान विरोधी घृणा प्रचार का हिस्सा थी। वे इस धारणा को ख़ामोश कैसे सुन सकती थीं?

कुछ छात्र इस चर्चा का वीडियो बना रहे थे। इस बात के कोई 8 दिन बीत जाने के बाद प्रोफ़ेसर देसाई को प्राचार्य ने बुलाया जहाँ  एक पुलिस अधिकारी मौजूद था। तब उन्हें मालूम हुआ कि चर्चा के वीडियो को संपादित करके कई सोशल मीडिया माध्यमों से प्रसारित कर दिया गया है और आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने कहा है कि औरंगज़ेब भला था और पाटिल और देशमुख बलात्कारी होते हैं। प्रोफ़ेसर देसाई यह जानकर सकते में आ गईं क्योंकि  चर्चा में उनकी बात को पूरी तरह विकृत करके  बाहर दिखलाया जा रहा था।  

पुलिस को यह बात ट्विटर से मालूम हुई और वह कॉलेज पहुँच गई।पुलिस की इस तत्परता के बारे में आप क्या कहेंगे? ख़ैर! प्रोफ़ेसर देसाई को कॉलेज प्रशासन ने माफ़ी माँग लेने को कहा। लेकिन उनके परिवार ने भी कहा, माफ़ी किस बात की! तब एक समिति बना दी  गई जो पूरे मामले की जाँच करेगी लेकिन तब तक के लिए उन्हें बाहर रहना पड़ेगा।

प्रोफ़ेसर देसाई के साहस के लिए हम उनकी तारीफ़ कर सकते हैं लेकिन अध्यापकों को इस  असाधारण साहस की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। उन्होंने वह किया जो हम सारे अध्यापक करते हैं।लेकिन उनके छात्रों में से कुछ ने कक्षा की मर्यादा का उल्लंघन किया। कक्षा सार्वजनिक मंच नहीं है। वह अध्यापक और छात्रों के बीच की जगह है। वह इस रूप में सड़क से अधिक खुली है कि वहाँ आप बिना हिचक अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं । ऐसे विचार भी जो बाहर ज़ाहिर करने पर आप संकट में पड़ सकते हैं। इसीलिए हम अध्यापक कभी भी कक्षा में छात्रों  द्वारा व्यक्त विचारों को सार्वजनिक नहीं करते। उनके नाम के साथ तो भी कभी नहीं।

हम हमेशा छात्रों को अपनी बात कहने के लिए उत्साहित करते हैं। परिसर और कक्षा विचारों की प्रयोगशालाएँ हैं। यहाँ वे खुलकर अपनी बात नहीं कहेंगे तो और कहाँ उन्हें यह मौक़ा होगा क्योंकि समाज में तो हर जगह तरह-तरह के संकोच, सेंसर लगे होते हैं।

कक्षा छात्रों और शिक्षकों के बीच एक तरह के अनुबंध पर आधारित है,परस्पर विश्वास पर। जैसे छात्रों को इसकी इजाज़त है कि वे अपना पक्ष रखें, अध्यापक को भी अपना मत रखने की आज़ादी है।उसका काम विचारों के खेल में अंपायर भर का नहीं है। उसका दायित्व अपने प्रशिक्षण के कारण अधिक अवश्य है। छात्रों को सोचने का तरीक़ा सिखलाने का जिम्मा उसका है। उत्तरदायित्वपूर्ण तरीक़े से कैसे सोचा जाए, यह बतलाना उसका फर्ज है।यही काम प्रोफ़ेसर तेजस्विनी देसाई कर रही थीं।

जिन छात्रों ने चर्चा को रिकॉर्ड किया और सार्वजनिक किया, उन्होंने कक्षा की मर्यादा तोड़ी। उस अनुबंध को तोड़ दिया जिसके आधार पर कक्षा का व्यापार चलता है। ऐसा करके उन्होंने प्रोफ़ेसर देसाई को संकट में डाला लेकिन बाक़ी छात्रों का भी नुक़सान  किया।सिर्फ़ अपने कॉलेज के नहीं, भारत में अन्य संस्थानों के छात्रों का भी। क्योंकि अब उनके अध्यापक सावधान और ख़ामोश भी हो जाएँगे।वे ख़ुद को सेंसर करेंगे और छात्रों से ख़ुद को दूर करेंगे। 

इस घटना से  केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉक्टर गिल्बर्ट सेबेस्टियन की याद हो आई। फासिज्म पर उनकी कक्षा की प्रस्तुति को प्रोफ़ेसर देसाई की बात की तरह ही सार्वजनिक कर दिया गया था। फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे संगठनों ने हंगामा करके उन्हें निलंबित करवा दिया। कुछ महीने बाद उनका निलंबन वापस हुआ लेकिन क्या उसके बाद वे उतने ही इत्मीनान से अध्यापन कर पा रहे होंगे?

कक्षा में अगर अध्यापक छात्रों की नीयत हर क्षण भाँपने को बाध्य हो तो कक्षा से इत्मीनान चला जाता है और वह सीखने-सिखाने की जगह नहीं रह जाती। हिंदुत्ववादी संगठन यही चाहते हैं लेकिन क्या सभी छात्र भी उनके साथ हैं?

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