+
क्या सरकार हेट स्पीच पर कार्रवाई का साहस दिखा पाएगी?

क्या सरकार हेट स्पीच पर कार्रवाई का साहस दिखा पाएगी?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच पर टीवी एंकरों और सरकार को तमाम नसीहतें दी हैं। कोर्ट ने टीवी एंकरों से कहा कि वो अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। उसने सरकार से कहा कि वो हेट स्पीच पर मूक दर्शक बनी हुई है। वंदना मिश्रा ने यही सवाल किया है कि क्या सरकार अब हेट स्पीच वालों पर एक्शन का साहस दिखा पाएगी। पढ़िए, यह लेख। 

अपनी प्रकृति की वजह से या किसी बाह्य कारण से,जब कोई भूमि अपनी उर्वरता ख़त्म कर लेती है, तब उसमें वाह्य हस्तक्षेप अवश्यंभावी हो जाता है।  यह हस्तक्षेप ऑर्गैनिक या केमिकल फर्टिलाइज़र और पेस्टिसाइड्स के रूप में सामने आते हैं और अगर फिर भी इससे आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती तो खाद्य ‘सुरक्षा’ के लिए मिट्टी में ऐसे पौधों को रोपित किया जाना चाहिए जिनमें जेनेटिक बदलाव किया गया हो। इस समय भारत में टीवी न्यूज मीडिया में इसी किस्म के ‘जेनेटिक बदलाव’ की आवश्यकता है क्योंकि पिछले आठ सालों में पत्रकारिता की ज़मीन ने अपनी उर्वरता खो दी है। 

मीडिया में सेल्फ रेग्युलेशन एक मिथ बन चुका है।तीन दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की टीवी मीडिया को लेकर टिप्पणी और सख्त रवैया इस बात की ओर संकेत कर रहा है कि न्यायालय अब बिना देरी के ‘पेस्टिसाइड्स’ इस्तेमाल करने का मन बना रहा है। जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ सुप्रीम कोर्ट में 11 सामूहिक रिट याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी, जिसमें याचिकाकर्ताओं द्वारा हेट स्पीच को नियंत्रित करने के लिए न्यायालय से दिशा निर्देश देने की मांग की गई थी।

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने एंकर की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि "एंकर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। हेट स्पीच या तो मुख्यधारा के टेलीविजन में होती है या यह सोशल मीडिया में होती है।.…जहां तक मुख्यधारा के टेलीविजन चैनल का सवाल है, ….वहां एंकर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि जैसे ही आप किसी को हेट स्पीच करते हुए देखते हैं, वैसे ही एंकर का कर्तव्य बन जाता है कि….वह उस व्यक्ति को आगे कुछ भी कहने के लिए अनुमति ना दे।….”

एंकर की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ऑब्ज़र्वैशन कितना सटीक है उसे नूपुर शर्मा मामले से समझा जा सकता है। भाजपा नेता नूपुर शर्मा के मामले में देखा गया कि जिस कार्यक्रम में उन्होंने पैगंबर मोहम्मद के बारे में टिप्पणी की थी, यदि उस कार्यक्रम की एंकर चाहतीं तो उन्हे रोक या म्यूट कर सकती थीं लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इससे परिणाम यह हुआ कि महीनों तक देश का एक बड़ा क्षेत्र संवेदनशील बना रहा; अरब देशों से भारत के लिए जो टिप्पणी आई वह तो अपमानजनक थी ही। विदेशी संबंधों और देश की आंतरिक कानून व्यवस्था को तबाह करने वाली इस टिप्पणी को रोका जा सकता था लेकिन नहीं रोका गया। इसके बावजूद सरकार ने टीवी चैनल पर कोई कार्यवाही नहीं की।

ऐसा ही एक मामला तब आया जब सुदर्शन न्यूज के मालिक सुरेश चवानके अपने कार्यक्रम ‘बिंदास बोल’ पर ‘यूपीएससी जिहाद’ का कार्यक्रम चलाने वाले थे। कई दिनों से इस कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार कर रहे सुरेश एक धर्म विशेष से चयनित होकर आने वाले सिविल सेवा के अधिकारियों के खिलाफ घृणा फैला रहे थे। केंद्र सरकार की नाक के नीचे चल रहे इस मिथ्या प्रचार को सरकार ने नजरंदाज कर दिया लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के सख्त रुख ने इस कार्यक्रम के प्रसारण पर रोक लगा दी। लेकिन न्यायालय सुरेश चवानके की हेट स्पीच की मंशा को नहीं रोक सका। शायद कोई ‘ऊपर’ से उनके साथ खड़ा था इसीलिए जब उनके कार्यक्रम पर रोक लगी तो उन्होंने हिन्दू युवा वाहिनी के दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि "मुझे सुरेश चव्हाणके होने पर गर्व है, जिनके शो पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी।" वो यहीं नहीं रुके उन्होंने आगे कहा "सच्चाई को सत्ता या अदालत द्वारा दबाया नहीं जा सकता। मेरे पास ऐसे 100 लोगों की सूची है जो आईएएस, आईपीएस हैं...लेकिन वे इस्लाम के लिए काम करते हैं देश के लिए नहीं।"

यूपीएससी में कुछ खामियाँ हो सकती हैं, उन पर चर्चा की जा सकती है और अपनी आपत्ति भी दर्ज कराई जा सकती है लेकिन एक परीक्षा जिससे देश के लिए, देश को चलाने वाले अधिकारी चयनित किए जाते हैं, वह धर्म के आधार पर षड्यंत्र का कोई अड्डा है, ऐसा मानना उचित नहीं है। यूपीएससी देश के संघीय ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ है, इसलिए कोर्ट से पहले भारत सरकार को ‘ऐक्शन’ लेना चाहिए था क्योंकि सुदर्शन न्यूज का यह कार्यक्रम देश की अखंडता के साथ खिलवाड़ का एक तरीका था।


लेकिन देश को जलाने और नफरत फैलाने की कोशिश करने वाले ऐसे लोगों के खिलाफ कोई भी कार्यवाही दिल्ली पुलिस द्वारा नहीं की गई। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के अंतर्गत आने वाली दिल्ली पुलिस ने हद तो तब कर दी जब उसने सर्वोच्च न्यायालय में हलफ़नामा देकर भरोसे के साथ कहा कि हिन्दू युवा वाहिनी के दिल्ली कार्यक्रम में “कुछ नहीं कहा गया”। हेट स्पीच को जायज ठहराते हुए दिल्ली पुलिस ने कहा “हमें दूसरों के विचारों के प्रति सहिष्णुरहना चाहिए”। हेट स्पीच को लेकर पुलिस और प्रशासन का एकतरफा नजरिया इस अपराध को लगातार गति प्रदान कर रहा है।

हेट स्पीच का मुद्दा सिर्फ टीवी न्यूज एंकरों का ही एकतरफा मुद्दा नहीं है। लेकिन टीवी न्यूज बिना यह जाने कि किसी हेडलाइन या बहस का समाज की एकता पर क्या असर पड़ेगा, उसे लगातार प्रसारित करते रहते हैं। टीवी मीडिया की किसी खबर या अफवाह को प्रसारित करने की गति व प्रभाव आज अप्रत्याशित हो चुका है। लेकिन अपने इस प्रभाव को लेकर जिम्मेदारी का अभाव बेलगाम टीवी मीडिया को खतरनाक बना रहा है। TRP की अफ़ीम का असर न्यूज चैनलों के प्राइमटाइम कार्यक्रमों में देखा जा सकता है। 2014 के बाद से हर दिनइस नशे का असर बढ़ता जा रहा है जिसकी परिणति 2014 के बाद से समाज में बढ़ते हेट स्पीच सम्बधी अपराधों में हो रही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो(NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार जहां वर्ष 2014 में हेट स्पीच को लेकर 323 मामले दर्ज हुए थे वहीं यह आंकड़ा 2020 में लगभग 600% बढ़कर 1804 मामलों तक जा पहुँचा। यह आंकड़ा ‘नए भारत’ की ‘नई दिशा’ की ओर संकेत कर रहा है, जिसे किसी भी हालत में रोका जाना चाहिए।

भारत के विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट ने नस्ल, जातीयता, लिंग, लैंगिक पहचान और धार्मिक विश्वास के रूप में परिभाषित व्यक्तियों के समूह के खिलाफ घृणा फैलाने और उकसाने को हेट स्पीच माना है। घृणा और उकसावा राजनीतिक हितों के लिए और सांप्रदायिक तनावों को उभारने के उद्देश्य से किया जाता है।चमकदार और साफ-सुथरे दिखने वाले तमाम टीवी एंकर राजनीति के लिए घृणा के टूल बन चुके हैं। एक ऐसा टूल जिसे इन्फॉर्मैशन और मिसइन्फर्मैशन को सतर्कता के साथ फैलाने के लिए तैयार और संवारा गया है। आश्चर्य नहीं कि जो 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा था वह एक नकली वीडियो से शुरू हुआ था उसकी जड़ें इसी झूठी खबरों को परोसने वाली मीडिया के तंत्र में थीं। मीडिया में ऐसे लोगों का कब्जा हो गया है जो मुश्किल से मिली आजादी और इस देश की एकता व अखंडता को मात्र TRP से तौल देना चाहते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की चिंता जायज है कि"हेट स्पीच ताने-बाने में ही जहर घोल देती है...इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।” और यह भी सच है कि "राजनीतिक दल आयेंगे और जायेंगे लेकिन यह देश प्रेस सहित सभी संस्थाओं के साथ अस्तित्व में रहेगा, …पूरी तरह से स्वतंत्र प्रेस के बिना कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता है,…लेकिन सरकार को चाहिए कि वह एक ऐसी मेकेनिज़्म बनाए जिसे सभी मानें..."

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने हाल के दिनों में देश में बढ़ी हेट स्पीच पर चिंता व्यक्त की है। एक वेबिनार में उन्होंने कहा कि "दुर्भाग्य से, सत्तारूढ़ दल में उच्च पदों पर आसीन लोग न केवल हेट स्पीच पर चुप हैं, बल्कि उन्हे समर्थन भी दे रहे हैं।" उन्होंने कहा कि ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने "वास्तव में पूरी कम्यूनिटी के नरसंहार का आह्वान किया है" इसके बावजूद "इनके खिलाफ मुकदमा चलाने में अधिकारी भी तत्पर नही दिखते हैं।"

हेट स्पीच की परिभाषा क्या है? क्या पहले इसे परिभाषित किया जाना चाहिए? ये सभी विचार कुछ और दिन भारत की एकता से खेलने की अनुमति मांगने का एक सूडो-लीगल तरीका है। जिस तरह गाली-गलौज को परिभाषित करने की जरूरत नहीं उसी तरह हेट स्पीच की भी परिभाषा की जरूरत नहीं। समाज का हर वो व्यक्ति जो स्वयं हेट स्पीच से नहीं जुड़ा हुआ है वह अच्छे से जानता है कि हेटस्पीच क्या है!


वर्तमान उपलब्ध ढांचा हेट स्पीच को लेकर पर्याप्त नहीं है इसकी पुष्टि हेट स्पीच को लेकर बनी दोनों प्रमुख कमेटियाँ टी. के. विश्वनाथन कमेटी और बेज़बरूआ कमेटी से हो जाती है। यह दोनों ही कमेटियाँ भारतीय दंड संहिता में कुछ और धाराएं जोड़ने की सिफारिश कर चुकी हैं ताकि हेट स्पीच के लिए दंड सुनिश्चित और कठोर हो। स्वयं जस्टिस रोहिंटन नरीमन का भी मानना है कि हेट स्पीच के खिलाफ सजा के प्रावधानों पर संशोधन की जरूरत है।

हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने कहा कि, "यह उद्योग (मीडिया) अनियंत्रित है और इस पर कोई प्रतिबंध नहीं हैं।" वास्तविकता यह है कि मीडिया के लिए सेल्फ-रेगुलेशन नाम की सीधी साधी गाय से कोई असर नहीं होने वाला है। खबरों के नाम पर घृणा बांटने के काम में लगा मीडिया ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ और ‘विचारों की स्वतंत्रता’ के नाम पर देश को गिरवी तक रखने को तैयार है। 

विचारों और अभिव्यक्तियों का सरकार के सामने समर्पण का नाम मीडिया नहीं है।


1957 में रामजी लाल मोदी केस में सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायधीशों की बेंच ने भारतीय दंड संहिता की धारा 295 (ए) की वैधता की पुष्टि की थी। यह धारा, ऐसे दुर्भावनापूर्ण कृत्यों जो जानबूझकर इसलिए किए गए हैं जिससे किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं का अपमान होता हो, को दंडित करने का प्रावधान करती है। इस धारा को वैधता प्रदान करने के लिए न्यायालय का तर्क था कि- अनुच्छेद 19(2) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सार्वजनिक-व्यवस्था(पब्लिक ऑर्डर)को ध्यान में रखते हुए उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है। 

यदि संविधान का यह अनुच्छेद आज भी लागू है,जो कि है, तो कालीचरण और नरसिंहानंद जैसे छद्म गुरुओं, व सुरेश चवानके समेत तमाम अन्य टीवी पत्रकार, एंकर, एडिटर और इनके मालिक समय समय पर सार्वजनिक कारागार की यात्रा पर जरूर जाते! यह मानते हुए कि देश किसी एक दल विशेष का विशेषाधिकार नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह चुनावी लाभ और वैधानिक पेंचीदगियों से ऊपर उठकर देश को प्राथमिकता दें। ताकि धर्म विशेष के ‘इकोसिस्टम’ बनाकर सियासी लाभ कमाने को आतुर, इधर उधर पार्टियां छोड़-तोड़कर आने वाले, चुनाव-वीर नेताओं, को देश की एकता से खेलने से रोका जा सके। 

सत्य हिंदी ऐप डाउनलोड करें