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हरियाणाः गांवों में जबरदस्त भाजपा विरोधी लहर, जेजेपी विधायक ने कराई रायशुमारी- किधर जाएं?

हरियाणाः गांवों में जबरदस्त भाजपा विरोधी लहर, जेजेपी विधायक ने कराई रायशुमारी- किधर जाएं?

हरियाणा के गांवों में जबरदस्त भाजपा विरोधी लहर है। जेजेपी के तमाम विधायक पसोपेश में हैं कि आखिर वो किस तरफ जाएं, किस पार्टी का समर्थन करें। क्योंकि लोकसभा चुनाव के 6 महीने बाद राज्य में विधानसभा चुनाव हैं। टोहाना के जेजेपी विधायक ने ऐसे में अपने मतदाताओं के बीच रायशुमारी (ओपिनियन पोल) कराई कि आखिर वो क्या फैसला लें। इस रायशुमारी में सबसे कम वोट भाजपा को मिले हैं। जानिए हरियाणा का अंडरकरंट क्या हैः

हरियाणा में लोकसभा चुनाव चरम पर है। राज्य में 25 मई को मतदान है। तमाम पार्टियों में हलचल है लेकिन वो हलचल अगले विधानसभा चुनाव को लेकर है। हरियाणा में विधानसभा चुनाव लोकसभा के 6 महीने बाद है। सबसे ज्यादा परेशान जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के विधायक हैं। कुछ तो कांग्रेस के समर्थन में खुल कर आ गए हैं, कुछ फैसला नहीं ले पा रहे हैं कि किधर जाएं, इधर जाएं या उधर जाएं। ऐसे में टोहाना के जेजेपी विधायक और पूर्व मंत्री देवेंद्र बबली ने अपने मतदाताओं के बीच जनमत सर्वेक्षण (ओपिनियन पोल) करा डाला। इस जनमत सर्वेक्षण के नतीजे दिलचस्प आए। टोहाना में शनिवार शाम को उन्होंने इसके आंकड़े जारी किए, जिससे पता चलता है कि उनके मतदाता भाजपा से नाराज नजर आए, जबकि बबली भाजपा सरकार का समर्थन कर रहे हैं।

जेजेपी विधायक बबली पार्टी आलाकमान से बहुत दिनों से नाराज चल रहे थे। इस लोकसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी के प्रत्याशियों का प्रचार तक नहीं किया। वो काफी दिनों से यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वो अगला राजनीतिक फैसला क्या लें, क्योंकि उनके कुछ साथी विधायकों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और कांग्रेस का दामन थाम लिया, जबकि वो भाजपा सरकार के समर्थन में थे। अपने मतदाताओं से यह बात पूछने के लिए कि वो किधर जाएं, बबली ने एक जनमत सर्वेंक्षण कराया। 

इस सर्वे का नतीजा तो बबली के मनमुताबिक ही निकलना था, क्योंकि सर्वे उन्होंने कराया था। लेकिन इस सर्वे का सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि आखिर उनके कितने मतदाताओं ने पार्टियों में से किसकी तरफ जाने का संकेत दिया। बबली का दावा है कि लगभग 73.5% समर्थकों ने उन्हें निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया है। यानी बबली जो फैसला लेंगे, वो उन्हें मंजूर होगा। 

जहां बबली, वहां हमः जेजेपी विधायक बबली ने कहा कि 73.5% लोगों ने "जहां बबली वहां हम" विकल्प को चुना, वहीं 17% समर्थकों ने कांग्रेस और 9% ने भाजपा को चुना है। कुल मतपत्रों में से उनके केवल .5% समर्थकों ने जेजेपी में रहने का विकल्प चुना है। यानी बबली के सर्वे में सबसे आखिरी पायदान पर जेजेपी है और उससे थोड़ा आगे भाजपा है। कांग्रेस और भाजपा के बीच में वोट प्रतिशत का अंतर 8 फीसदी है। अगर जेजेपी से तुलना की जाए तो यह अंतर 16.5 फीसदी का है।

बबली ने कुल वोट की संख्या नहीं बताई लेकिन यह कहा कि उनके दफ्तर में जो मतदान पेटियां रखी थीं, उनमें करीब तीन हजार लोगों ने वोट डाले थे। लेकिन इन नतीजों के बाद भी बबली का कहना है कि वे अपने करीबी लोगों से सलाह करेंगे और उसके बाद निर्णय लेंगे। निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा तो आजाद उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ेंगे। कम से कम अब जेजेपी में बने रहने और भाजपा का दामन थामने की संभावना नहीं के बराबर है।

बबली फंस गए चक्रव्यूह मेंः विधायक बबली की मुसीबत एक नहीं है। कई है। जैसे अगर वो कांग्रेस में जाते हैं तो वहां विधानसभा चुनाव में टिकट मिलने की संभावना बहुत क्षीण है। क्योंकि टोहाना में कांग्रेस के अपने तमाम नेता दावेदार है। वैसे भी इस बेल्ट में चौधरी बीरेंद्र सिंह का दबदबा है जो वापस कांग्रेस में अपने बेटे ब्रिजेंद्र सिंह के साथ लौट आए हैं। भाजपा में उनके साथ सबसे बड़ी दिक्कत पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सुभाष बराला है जो राज्यसभा में जा चुके हैं। लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में बबली ने ही बराला को 52000 से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया था। बराला उन्हें भाजपा का टिकट हर्गिज नहीं पाने देंगे। जेजेपी में रहने का मतलब अपना अस्तित्व खत्म करना है, क्योंकि पूरी पार्टी बाप-बेटों (अजय चौटाला-दुष्यंत चौटाला-दिग्विजय चौटाला) की पार्टी बनकर रह गई है। बबली इसीलिए परेशान हैं कि करें तो करें क्या।

सूत्रों का कहना है कि बबली इस जनमत सर्वे का नतीजा चाहे जो बताएं लेकिन उनके ग्रामीण मतदाताओं ने भाजपा और जेजेपी को पूरी तरह खारिज कर दिया है। गांवों में जबरदस्त भाजपा विरोधी लहर है। जेजेपी से ग्रामीणों की नाराजगी की वजह यही है कि पिछले चुनाव में उन लोगों ने दुष्यंत चौटाला की पार्टी को वोट इसलिए नहीं दिए थे कि वो राज्य में भाजपा की सरकार बनवा दें। वो वोट कांग्रेस-जेजेपी के लिए था। लेकिन दुष्यंत ने अपने पिता अजय चौटाला को जेल से बाहर लाने के लिए भाजपा से सौदा कर डाला। अब भाजपा ने भी उन्हें छोड़ दिया। 

यह एक विधानसभा क्षेत्र या एक बेल्ट की बात नहीं है कि सिर्फ टोहाना के ग्रामीण या किसान सत्तारूढ़ भाजपा से नाराज हैं। हरियाणा-पंजाब के प्रतिष्ठित अखबार द ट्रिब्यून ने रोहतक के गांवों के बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिससे पता चलता है कि गांवों में भाजपा विरोधी लहर इतनी जबरदस्त है कि वो भाजपा के लिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मुश्किलें पैदा कर सकती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक किसान आंदोलन का प्रभाव हरियाणा के किसानों में बरकरार है। रिपोर्ट बता रही है कि रोहतक बेल्ट में किसानों का एक बड़ा वर्ग भाजपा के 'असंवेदनशील' रवैये से नाराज है।

ट्रिब्यून अखबार ने जाट बहुल मोखरा गांव के किसान सतपाल को कोट किया है। सतपाल ने कहा- किसानों का आंदोलन मुख्य मुद्दा है, जिसने किसान समुदाय में भाजपा सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा कर दिया है... अब, गेंद किसानों के पाले में है और वे लोकसभा चुनाव में अपने अपमान का बदला लेने के लिए तैयार हैं। अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक गांवों में यह देखने को मिल रहा है कि जब लोकसभा चुनाव में मुख्य मुद्दों की बात पूछी जाती है तो किसान और गांवों के बाकी लोग किसान आंदोलन पर खासतौर से चर्चा करने लगते हैं। बातचीत में गांव वालों ने राज्य के विभिन्न स्थानों पर किसान कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा नेताओं को काले झंडे दिखाने को भी उचित ठहराया। 

बहलाबा, बहु अकबरपुर आदि गांवों के लोगों का कहना था कि "हरियाणा किसानों और खेती के लिए जाना जाता है। हर चुनाव में हर राजनीतिक दल किसानों की भलाई की बात करता है, लेकिन चुनाव के बाद उस बात को भुला दिया जाता है। भाजपा ने पिछले चुनावों में किसानों की आय दोगुनी करने के बड़े-बड़े दावे भी किए लेकिन किया कुछ नहीं। आंदोलन करने पर हमें पीटा गया। इसलिए हम लोग भी अब किसान आंदोलन को ध्यान में रखते हुए ही वोट डालेंगे।”

द ट्रिब्यून के मुताबिक भाजपा के राज्य प्रवक्ता कृष्णमूर्ति हुड्डा ने तमाम बातों को खारिज करते हुए कहा कि किसान आंदोलन का कोई भी प्रभाव लोकसभा चुनाव पर नहीं पड़ेगा। किसी भी और सरकार ने हरियाणा में किसानों के लिए इतना काम नहीं किया है, जितना भाजपा सरकार ने पिछले 10 वर्षों में हरियाणा के किसानों के लिए काम किया है। कुछ गांवों में मुट्ठीभर लोग कांग्रेस के उकसाने पर भाजपा प्रत्याशियों का विरोध कर रहे हैं। लेकिन किसानों का बड़ा हिस्सा उसमें शामिल नहीं है। 

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