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कॉमेडी, ड्रामा और इमोशन से भरी है फ़िल्म 'गुलाबो सिताबो' की कहानी

कॉमेडी, ड्रामा और इमोशन से भरी है फ़िल्म 'गुलाबो सिताबो' की कहानी

शुक्रवार 12 जून को अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई है फ़िल्म 'गुलाबो सिताबो'। बॉलीवुड के जाने-माने डायरेक्टर शूजित सरकार ने फ़िल्म का डायरेक्शन किया है और इसकी कहानी जूही चतुर्वेदी ने लिखी है।

फ़िल्म- गुलाबो सिताबो

डायरेक्टर- शूजित सरकार

स्टार कास्ट- अमिताभ बच्चन, फारुख ज़फ़र, आयुष्मान खुराना, विजय राज, श्रृष्टि श्रीवास्तव, ब्रिजेंद्र काला

स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म- अमेज़न प्राइम

शैली- कॉमेडी-ड्रामा

रेटिंग- 3/5

पहले सिनेमाघरों में हर शुक्रवार कोई न कोई फ़िल्म रिलीज़ होती थी लेकिन अब कोरोना महामारी के चलते सभी सिनेमाघर बंद हैं। इस वजह से अब फ़िल्म ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज़ होंगी। शुक्रवार 12 जून को अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई है फ़िल्म 'गुलाबो सिताबो'। बॉलीवुड के जाने-माने डायरेक्टर शूजित सरकार ने फ़िल्म का डायरेक्शन किया है और इसकी कहानी जूही चतुर्वेदी ने लिखी है। मुख्य भूमिका में महानायक अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना के अलावा अन्य कई स्टार भी हैं। शूजित सरकार द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'गुलाबो सिताबो' में कॉमेडी है, इमोशन है और ड्रामा है। आप सभी लोग इसे अपनी पूरी फ़ैमिली के साथ देख सकते हैं, लेकिन उससे पहले आइये जानते हैं कि क्या है फ़िल्म की कहानी-

फ़िल्म की शुरुआत होती है मिर्ज़ा (अमिताभ बच्चन) से जो लखनऊ में एक काफ़ी पुरानी हवेली के मालिक हैं और वह काफ़ी लालची और कंजूस भी हैं। तो वहीं इस हवेली में कई किराएदार भी रहते हैं और उसमें से एक है बाँके (आयुष्मान खुराना) जो आटा चक्की में काम करता है और अपनी माँ और 4 बहनों के साथ रहता है। मिर्ज़ा की बेगम (फारुख ज़फर) भी हवेली में ही रहती हैं और क़ानूनी तौर पर हवेली बेगम के नाम है। तो मसला यह है कि मिर्ज़ा और बाँके में 36 का आँकड़ा है और दोनों एक-दूसरे को दबाना चाहते हैं। बाँके हवेली खाली नहीं करना चाहता है और मिर्ज़ा चाहते हैं कि बाँके या किराया बढ़ाए या हवेली खाली कर दे।

इसी बीच हवेली पर पुरातत्व विभाग के एएसआई अफ़सर ग्यानेश शुक्ला (विजय राज) की नजर पड़ जाती है और दूसरी तरफ़ मिर्ज़ा बाँके से घर खाली कराने के लिए वकील क्रिस्टोफर क्लार्क (ब्रिजेंद्र काला) के चक्कर लगाने लगते हैं। वकील साहब मामला तो सुलझा नहीं पाते लेकिन मिर्ज़ा और बाँके की बहन गुड्डो (श्रृष्टि श्रीवास्तव) को लेकर हवेली को बेचने के लिए एक बिल्डर से मिलवाने पहुँच जाते है। अब अंत में देखना दिलचस्प रहेगा कि आख़िर हवेली का क्या होगा पुरातत्व विभाग के लोग हवेली को अपने क़ब्ज़े में ले लेंगे या बिल्डर हवेली को खरीद लेगा बाँके और मिर्ज़ा की लड़ाई कभी ख़त्म होगी या नहीं या दोनों वैसे ही हवेली में रहते हुए लड़ते रहेंगे ये सब जानने के लिए आपको अमेज़न प्राइम पर रिलीज़ हुई फ़िल्म 'गुलाबो सिताबो' देखनी पड़ेगी।

 - Satya Hindi

फ़िल्म गुलाबो सिताबो का एक सीन।

निर्देशन

शूजित सरकार ने फ़िल्म का डायरेक्शन अच्छे से किया है। फ़िल्म का स्क्रीनप्ले एकदम सीधा-सरल और सिमटा हुआ है और इसी दायरे में रहते हुए शूजित ने फ़िल्म का निर्देशन किया है। फ़िल्म का कैमरा वर्क काफ़ी अच्छा किया गया है और नवाबों के शहर लखनऊ की कई जगहों को बड़ी खूबसूरती के साथ पर्दे पर उतारा गया है। 'गुलाबो सिताबो' का म्यूजिक आपको फ़िल्म से बांधे रखेगा।

एक्टिंग

महानायक अमिताभ बच्चन को कोई भी रोल दे दिया जाए उनके लिए करना सब आसान रहता है और उसे वो बखूबी करते हैं। फ़िल्म 'गुलाबो सिताबो' में मिर्ज़ा के किरदार में बिग बी ने शानदार अभिनय किया है। तो वहीं आयुष्मान खुराना ने हमेशा की तरह बेहतरीन एक्टिंग की है। फारुख जफर ने बेगम के किरदार को बखूबी निभाया। विजय राज ने अपने रोल को शानदार तरीक़े से प्ले किया और वहीं ब्रिजेंद्र काला और श्रृष्टि श्रीवास्तव ने भी काफ़ी अच्छी एक्टिंग की है। इसके अलावा फ़िल्म के सभी किरदारों ने अपने-अपने रोल को बखूबी निभाया। 

फ़िल्म 'गुलाबो सिताबो' में आपको कॉमेडी, ड्रामा और साथ में इमोशन का फुल डोज़ मिलेगा। फ़िल्म के हर एक किरदार से आप इमोशनली कनेक्ट करेंगे और इसके डायलॉग भी काफ़ी मजेदार हैं। गोल सी नाक और उसपर चश्मा लगाए ढीला-ढाला सा कुर्ता पहने मिर्ज़ा पर कभी आपको तरस आएगा तो कभी आपको लगेगा कि कितना लालची है। तो वहीं आयुष्मान खुराना ने अमिताभ बच्चन के साथ पहली बार काम किया है और पर्दे पर पहली बार की दोनों की केमेस्ट्री आपको ख़ूब पसंद आएगी। फ़िल्म 'पा' के बाद 'गुलाबो सिताबो' में अमिताभ बच्चन के अपने चेहरे पर प्रोसथेटिक मेकअप किया गया है जो काफी अच्छे से किया गया। फ़िल्म आपको इमोशनली बांधे रखेगी साथ ही इसके गाने और बीच-बीच में आने वाले कुछ सीन्स आपको ख़ूब हसाएँगे। तो वहीं कहीं न कहीं यह फ़िल्म आपको थोड़ी सी स्लो भी लग सकती है। फ़िल्म में थोड़ी और एडिटिंग की ज़रूरत थी। इसके अलावा सीधी-सादी सी कहानी को उसी तरह से आपके सामने पेश कर दिया गया है।

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