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ट्रिपल तलाक़: क़ानून से ज़्यादा ज़रूरी है मुसलमानों की सोच बदलना

ट्रिपल तलाक़: क़ानून से ज़्यादा ज़रूरी है मुसलमानों की सोच बदलना

हज़ार साल या उससे भी ज़्यादा समय से चली आ रही किसी सामाजिक बुराई को एक क़ानून बनाकर दो-चार साल में ख़त्म करने के सपने देखना कोई बहुत बड़ी अक़्लमंदी का काम तो नहीं है।

लोकसभा में मुसलिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक-2019 तीसरी बार पारित हो गया है। आसान भाषा में इसी को ट्रिपल तलाक़ रोकथाम विधेयक कहते हैं। इस विधेयक को लोकसभा में तीसरी बार पास कराने में भी सरकार को विपक्ष के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। विधेयक के पक्ष में सिर्फ़ उतने ही वोट पड़े जितने कि बीजेपी के सांसद हैं। इसका मतलब साफ़ है कि बीजेपी के सहयोगी दल भी इस विधेयक पर उसके साथ नहीं हैं।

हालाँकि कांग्रेस और इस विधेयक का विरोध कर रहे अन्य दल राज्यसभा में विधेयक को पारित कराने के सरकार के मंसूबों में रोड़ा अटकाने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सरकार का दावा है कि इस बार उसने बहुत इंतज़ार कर लिया है। राज्यसभा में यह विधेयक पास होकर रहेगा। अगर यह विधेयक फ़िलहाल राज्यसभा में पास नहीं भी होता है तो भी अध्यादेश के रूप में यह क़ानून लागू है। जब तक यह विधेयक राज्यसभा में पास होकर राष्ट्रपति के दस्तख़त होकर क़ानून नहीं बन जाता तब तक अध्यादेश के रूप में यह लागू रहेगा।

अब सवाल उठता है कि क्या यह क़ानून मुसलिम समाज के एक बड़े हिस्से में मौजूद ट्रिपल तलाक़ जैसी कुप्रथा को ख़त्म करने में कारगर साबित हो पाएगा आमतौर पर इस सवाल का जवाब दिया जाता है कि जब देश के ख़िलाफ़ क़ानून बनने से दहेज प्रथा ख़त्म नहीं हुई और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने से भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हुआ तो ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ क़ानून बनने से ट्रिपल तलाक़ भला कैसे ख़त्म हो जाएगी। यह बातें कुछ हद तक ठीक हैं। क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने लोकसभा में इस विधेयक पर बहस का जवाब देते हुए बताया कि 2017 से अब तक ट्रिपल तलाक़ के 574 मामले मीडिया के ज़रिए सामने आए हैं। इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद ऐसे 345 मामले सामने आए हैं, और अध्यादेश जारी होने के बाद 101 मामले सामने आ चुके हैं।

आँकड़े को सरसरी तौर पर देखकर लगता है कि मुसलिम समाज में अभी ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ बनाए जा रहे इस क़ानून की स्वीकार्यता नहीं है। ऐसा लगता है कि मोटे तौर पर मुसलिम समाज ट्रिपल तलाक़ को लेकर अपनी परंपरा के अनुसार ही आगे बढ़ना चाहता है।

इसकी पुरज़ोर मुख़ालफ़त करने वाले कुछ मुसलिम संगठनों के सर्वेसर्वा तो यहाँ तक कहते हैं कि सरकार चाहे लाख क़ानून बना ले ट्रिपल तलाक़ बदस्तूर जारी रहेगा। ऐसे लोगों की हिम्मत और बढ़ जाती है जब असदुद्दीन ओवैसी लोकसभा में बहस के दौरान कहते हैं कि मुसलिम समाज ट्रिपल तलाक़ की व्यवस्था से खुश है।

मुसलिमों में ही अलग-अलग राय

यह बात सच है कि ट्रिपल तलाक़ पूरे मुसलिम समाज का मुद्दा नहीं है। मुसलिम समाज अपनी धार्मिक परंपराओं को लेकर एक जैसा नहीं है। मुसलिम समाज कई फ़िरक़ों में बँटा हुआ है। अलग-अलग फ़िरक़ों की तलाक़ के मामले में अलग-अलग मान्यता है। जहाँ अहले हदीस और शिया समुदाय तलाक़ के मामले में क़ुरान की दी हुई व्यवस्था को मानते हैं। वहीं सुन्नी मुसलमानों में हनफ़ी यानी इमाम अबू हनीफा के अनुयायी मुसलमान एक बार दी गई तीन तलाक़ को तीन मानते हैं और इसी पर शादी का रिश्ता ख़त्म कर देने को सही ठहराते हैं।

हालाँकि यह तरीक़ा क़ुरान में दी गई तलाक़ की व्यवस्था के एकदम विपरीत है। लेकिन पिछले हज़ार से ज़्यादा सालों में मज़हबी रहनुमाओं ने इस तरीक़े पर इतनी बार मुहर लगाई है कि आज आम मुसलमान क़ुरान की बात मानना तो दूर की बात है सुनने तक को तैयार नहीं है।

किसी भी समाज में कोई बुराई तब तक दूर नहीं हो सकती जब तक उसके ख़िलाफ़ समाज के अंदर बड़े पैमाने पर अभियान और आंदोलन न छेड़ा जाए। हज़ार साल या उससे भी ज़्यादा समय से चली आ रही किसी सामाजिक बुराई को एक क़ानून बनाकर दो-चार साल में ख़त्म करने के सपने देखना कोई बहुत बड़ी अक़्लमंदी का काम तो नहीं है।

लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि सामाजिक बुराई को ख़त्म करने के लिए पहल ही न की जाए। क़ानून सामाजिक बुराई को ख़त्म करने की दिशा में पहला क़दम तो हो सकता है, आख़िरी नहीं। किसी भी सामाजिक बुराई के ताबूत में आख़िरी किल तभी ठुकती है जब समाज उसके ख़िलाफ़ मज़बूती से डटकर खड़ा हो जाए। हिंदू समाज में सती प्रथा इसका जीता जागता उदाहरण है। 100 साल पहले जब राजा राममोहन राय ने इस प्रथा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी तब उनका जमकर विरोध हुआ था लेकिन आज पूरा समाज सती प्रथा के ख़िलाफ़ खड़ा है।

समाज से बुराई ज़रूर दूर होगी

इसी तरह मुसलिम समाज में ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ भी काफ़ी मज़बूत आवाज़ें उठ रही हैं। कई महिला संगठन पिछले कई साल से इसके ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर कर आंदोलन चला रहे हैं। मुसलिम समाज का एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग इसका पुरज़ोर विरोध कर रहा है। मुसलिम समाज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया पर जमकर इसके ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रही है। जब समाज किसी बुराई को बुराई मानने लगता है तो धीरे-धीरे उसके ख़ात्मे की शुरुआत हो जाती है। हज़ार साल से चली आ रही कोई बुराई एक झटके में पूरी तरह ख़त्म नहीं हो सकती। हाँ, धीरे-धीरे इसके वजूद में कमी ज़रूर आ सकती है। मुसलिम समाज में इसके ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू हो चुका है। देर-सबेर यह बुराई समाज से दूर हो जाएगी। अगर समाज में रहेगी भी तो इस बुराई को अपनाने वाले को भारी ख़मियाज़ा भुगतना पड़ेगा। ऐसी व्यवस्था मुसलिम समाज आगे चलकर ज़रूर बना लेगा।

सरकार को पूरा अधिकार 

ट्रिपल तलाक़ की रोकथाम के लिए सरकार की क़ानून बनाने की कोशिशों को यह कर कह कर ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता कि यह मुसलिम समाज का अंदरूनी मामला है और सरकार इसमें  दखल नहीं दे सकती। सरकार को पूरा अधिकार है। वह किसी समुदाय के भले के लिए कोई क़ानून बना सकती है। हाँ, यह ज़रूरी है कि उस समुदाय के बीच इसे लेकर सरकार को चर्चा अवश्य करनी चाहिए। सरकार की हठधर्मिता समझ से परे है। ट्रिपल तलाक़ क़ानून के बारे में सरकार मुसलिम समुदाय के बीच चर्चा क्यों नहीं करना चाहती जब से यह क़ानून बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई है तब से सरकार ने किसी भी मुसलिम संगठन से किसी भी स्तर पर कोई बातचीत नहीं की है। यहाँ तक कि जिन महिलाओं ने ट्रिपल तलाक़ की व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी उन महिला संगठनों से भी सरकार ने क़ानून बनाने से पहले सलाह-मशवरा नहीं किया। किसी भी नए विषय पर बनने वाले क़ानून के विधेयक व्यापक विचार-विमर्श के लिए उसे संसद की स्थाई समिति में भेजने की संसदीय परंपरा है। सरकार ने ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ बनाए जा रहे इस क़ानून के मामले में इस परंपरा को भी नहीं निभाया। सरकार की यह हठधर्मिता उसकी नीयत पर सवाल खड़े करती है।

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