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माफिया से माननीय तक, जानिए अतीक अहमद की कहानी

माफिया से माननीय तक, जानिए अतीक अहमद की कहानी

जिस प्रयागराज में उसकी हत्या हुई है, वहां सुरक्षा का खास ख्याल रखा गया है। इसको मद्देनजर रखते हुए प्रयागराज में धारा 144 के साथ इंटरनेट सेवा भी बंद कर दी गई है

बीती रात प्रयागराज में अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की गोली मारकर हत्या कर दी गई। दोनों भाईयों की हत्या से दो दिन पहले अतीक के बेटे असद को भी एक एनकाउंटर में मार दिया गया। अतीक की हत्या के बाद से पूरे उत्तर प्रदेश में धारा 144 लगा दी गई है। इसके साथ ही राज्य के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। जिस प्रयागराज में उसकी हत्या हुई है, वहां सुरक्षा का खास ख्याल रखा गया है। इसको मद्देनजर रखते हुए प्रयागराज में धारा 144 के साथ इंटरनेट सेवा भी बंद कर दी गई है।

जिस अतीक अहमद के लिए इतना सब किया जा रहा है वह 2019 से गुजरात की साबरमती जेल में बंद था। बीते फरवरी में उसने अपने खिलाफ चल रहे हत्या के एक मामले के गवाह रहे उमेश पाल की दिनदहाड़े हत्या करवा दी थी। इसमें उसके बेटे असद और शूटर गुलाम का नाम सामने आया था।

उमेश पाल की हत्या, अतीक अहमद के चालीस से ज्यादा सालों के आपराधिक इतिहास की आखिरी हत्या है। इसके साथ ही कल हुई उसकी हत्या से अतीक अहमद हमेशा के लिए इतिहास का एक पन्ना बन गया।

अतीक का जन्म एक साधारण और गरीब परिवार में हुआ, पिता इलाहाबाद की सड़कों पर तांगा चलाकर परिवार का गुजारा करते थे। इलाहाबाद के पुराने जानकारों के अनुसार अतीक के पिता भी छोटे किस्म के दबंग आदमी थे, और उनकी इसी दबंगई के चलते लोग उन्हें पहलवान के नाम से भी जानते थे। दबंगई का यह शौक अतीक को भी लगा और उसने छोटे मोटे कांड करने करने शुरु कर दिये। अतीक की कहानी में सबसे बड़ा मोड़ आया अस्सी के दशक में जब 17 साल की उम्र में उसके खिलाफ हत्या का पहला मामला दर्ज हुआ।

अपराध की दुनिया में यह अतीक की औपचारिक शुरुआत थी। इसके कुछ समय बाद इलाहाबाद के एक और छोटे स्तर के माफिया चांद बाबा के साथ हुई पिता की झड़प, दुश्मनी में बदल गई। चांद बाबा के साथ उसकी यह दुश्मनी करीब एक दशक तक चलती रही, फिर आया साल 1989, राज्य में विधानसभा चुनाव का ऐलान हुआ, अतीक को समझ आया कि माफियागिरी बनाए रखने के लिए राजनीतिक संरक्षण जरूरी है। इस संरक्षण को पाने की उम्मीद में उसने निर्दलीय पर्चा दाखिल कर दिया। एक दशक से उसके दुश्मन रहे शौक इलाही उर्फ चांद बाबा ने भी पर्चा दाखिल कर दिया। उत्तर भारत के राज्यों में यह राजनीति के अपराधीकरण के बाद, अपराधियों के राजनीतिकरण का दौर था। जिसमें, अतीक अहमद और चांद बाबा जैसे लोग खुलकर मैदान में आ रहे थे, भले ही निर्दलीय।

अतीक और चांद बाबा एक दूसरे के सामने मैदान में थे, पुरानी दुश्मनी और ऊंची महत्वाकांक्षाओं वाले अतीक ने चांद बाबा से पर्चा वापस लेने के लिए कहा, लेकिन चांद बाबा अपराध की दुनिया में अतीक पहले से था, इसलिए उसका रुतबा भी ज्यादा था। इसलिए उसने पर्चा वापस लेने से मना कर दिया। चांद बाबा द्वारा मना करने के बाद अतीक ने उसकी हत्या करा दी। चांद बाबा की हत्या और प्रयागराज (इलाहाबाद) की शहर पश्चिमी सीट से पहली चुनावी जीत से उसका रुतबा बढ़ गया। और इस जीत के साथ उदय हुआ माननीय और माफिया अतीक अहमद का। पहला चुनाव जीतने के बाद उसने लगातार पांच चुनाव जीते।  

दसवीं तक पढ़े अतीक अहमद ने उस समय की राजनीतिक अस्थिरता के दौर में सपा, बसपा और अपना दल के साथ राजनीतिक करियर को आगे बढ़ाया। उसकी राजनीतिक पारी में सबसे बड़ा योगदान रहा समाजवादी पार्टी का, जिसने उसे इलाहाबाद की फूलपुर सीट से लोकसभा का टिकट देकर संसद तक पहुंचाया। प्रयागराज(इलाहाबाद) की फूलपुर सीट कई मायनों में ऐतिहासिक सीट मानी जाती है, इसमें सबसे बड़ा कारण तो उसका देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ जुड़ा होना है। नेहरू अपने आखिरी वक्त तक फूलपुर का ही प्रतिनिधित्व करते रहे। उस सीट पर अतीक जैसे माफिया का सांसद होना वहां के लिए शर्म के जैसे है।

2004 अतीक के राजनीतिक और गुंडई के करियर का सबसे अहम और सबसे उत्कर्ष दौर था, जब वह सब कुछ खुलेआम होकर कर सकता था। यह सब करते हुए उसके ऊपर वसूली, अपहरण, मर्डर के सौ से ज्यादा केस दर्ज किये गये।

फिर आया साल 2005 जब उसके करियर में थोड़ा सा ब्रेक लगा और आखिर में उसकी बर्बादी का कारण बना। अतीक के सांसद बनने के बाद शहर पश्चिमी विधानसभा सीट खाली हो गई, और यहां हो रहे उपचुनाव में अतीक ने अपने छोटे भाई अशरफ को चुनाव के मैदान में उतार दिया। चुनाव में अशरफ का मुकाबला था बसपा के उम्मीदवार राजू पाल से। राजू पाल यह चुनाव जीत गया, लेकिन अतीक से दुश्मनी मोल ले ली।

अशरफ के चुनाव हारने की वजह से अतीक अहमद ने जनवरी 2005 में राजू पाल की हत्या करा दी। राजू पाल को पूरे शहर में दौड़ाकर मार दिया गया।

अशरफ के चुनाव हारने की वजह से अतीक अहमद ने जनवरी 2005 में राजू पाल की हत्या करा दी। राजू पाल को पूरे शहर में दौड़ाकर मार दिया गया। राजू की हत्या के बाद एक बार फिर उपचुनाव हुए, अशरफ एक बार फिर मैदान में था और उसके सामने थी राजू पाल की विधवा पत्नी पूजा पाल, जिसे उसने हरा दिया और विधायक बन गया। हालांकि 2007 के चुनाव में पूजा ने अशरफ को चुनाव में हरा दिया।

राजू पाल की हत्या के मामले में अतीक और उसके भाई के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई। और इस मामले के गवाह बने उमेश पाल जिसकी बीते फरवरी को अतीक के बेटे ने हत्या कर दी। पुलिस द्वारा गवाह बनाए जाने के बाद उमेश अपनी गवाही से मुकर गया, मुकरने का कारण 2006 में हुआ उसका अपहरण जिसने उसे डरा दिया। लेकिन मायावती की सरकार आने पर वह 2008 में बसपा में शामिल हुआ, इसके बाद 2008 में उमेश ने अतीक के खिलाफ अपहरण की शिकायत दर्ज कराई।

चुनावी हार जीत से इतर अतीक अब इस मामले में फंस चुका था, क्योंकि बसपा पूजा पाल के साथ खड़ी रही, और पूजा ने अतीक से लड़ने का निश्चय कर लिया था। बसपा की सरकार आने के बाद अतीक अहमद को उमेश पाल की शिकायत के बाद गिरफ्तार कर लिया गया, और चार साल जेल में रहा, इस दौरान मायावती सरकार ने भी अतीक पर कार्रवाई करनी शुरू कर दी थी।

चार साल जेल में रहने के बाद अतीक 2012 में एक बार फिर से बाहर आया लेकिन तब तक उसकी राजनीतिक पकड़ कमजोर हो चुकी थी, और जिस सपा का उसका संरक्षण मिला हुआ था, अखिलेश की नई सपा में वह भी कम हो गया। लेकिन अभी तक सब कुछ खत्म नहीं हुआ था, अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस पाने के लिए अतीक ने सपा के टिकट पर 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन हार गया। इसके बाद 2017 में बनी बीजेपी सरकार ने उसके खिलाफ कार्रवाई शुरु कर दी।

अतीक को 2017 में गिरफ्तार कर लिया गया, इस दौरान उसे यूपी की देवरिया जेल में रखा गया, जहां पर उसने एक व्यापारी को जेल में बुलाकर पीटा, इसकी शिकायत की गई और आखिर में 2019 में उसे देवरिया से गुजरात की साबरमती जेल में भेज दिया गया। वहां रहते हुए ही उसने फरवरी में उमेश पाल की हत्या की प्लानिंग की, जिसे उसके बेटे ने अंजाम दिया।

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