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बीजेपी सांसद का था, इसलिए फ़ेक अकाउंट को नहीं हटाया फ़ेसबुक ने

बीजेपी सांसद का था, इसलिए फ़ेक अकाउंट को नहीं हटाया फ़ेसबुक ने

भारत में सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी को ग़लत ढंग से फ़ायदा पहुँचाने और उसके लिए अपने नियम क़ानून को ताक पर रखने के लिए फ़ेसबुक एक बार फिर विवादों में है।

भारत में सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी को ग़लत ढंग से फ़ायदा पहुँचाने और उसके लिए अपने नियम क़ानून को ताक पर रखने के लिए फ़ेसबुक एक बार फिर विवादों में है। ताज़ा विवाद में फ़ेसबुक ने कई फ़ेक अकाउंट का पता लगाया और उन्हें हटा देने का निर्णय ले लिया था, पर जब उसे यह पता चला कि वे तमाम फ़ेक अकाउंट एक बीजेपी सांसद से जुड़े हुए हैं तो फ़ेसबुक ने अपना हाथ पीछे खींच लिया।

याद दिला दें कि बीते साल फ़ेसबुक एक बड़े विवाद में फँसा था जब यह बात सामने आई थी कि उसने बीजेपी के तेलंगाना विधायक टी राजा सिंह के मुसलमान विरोधी हेट स्पीच को हटाने का निर्णय कर लिया था, लेकिन फ़ेसबुक इंडिया की तत्कालीन पब्लिक पॉलिसी निदेशक आँखी दास के कहने पर ऐसा नहीं किया गया।

आँखी दास का कहना था कि उस बीजेपी विधायक को 'डैंजरस मैन' की श्रेणी में रखने से केंद्र सरकार से कंपनी के रिश्ते ख़राब होंगे और उससे कंपनी के भारत में कामकाज पर बुरा असर पड़ेगा।

क्या है ताज़ा विवाद?

अंतरराष्ट्रीय अख़बार 'द गॉर्डियन' ने अपनी एक ख़बर में कहा है कि फ़ेसबुक ने कई फ़ेक अकाउंट को सिर्फ इसलिए नहीं हटाया कि वे एक बीजेपी सांसद से जुड़े हुए थे।

इसके अनुसार, सोफ़ी झांग नामक फ़ेसबुक के एक डेटा साइंटिस्ट ने उस फ़ेक अकाउंट के उस नेटवर्क का पता लगाया था। उन्होंने अपने शोध में पाया कि भारत के लगभग सभी राजनीतिक दल फ़ेक लाइक, शेयर व कमेंट का इंतजाम कर लेते हैं।

झांग ने 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले इस तरह के घटिया किस्म के फ़ेक अकाउंट को हटाया था। इसका नतीजा यह हुआ था कि उन्हें 22 लाख फ़ेक लाइक्स, 17 लाख फ़ेक शेयर और 3.30 लाख फ़ेक कमेंट हटाने पड़े।

फ़ेक अकाउंट्स का नेटवर्क

इसी तरह झांग ने 2019 में ही चार ऐसे नेटवर्क का पता लगाया था, जिसमें फ़ेक अकाउंट थे, जिनका इस्तेमाल फ़ेक शेयर, लाइक्स, कमेंट व रिएक्शन्स के लिए किया जाता था। इनमें से दो नेटवर्क बीजेपी नेताओं से जुड़े हुए थे, जिनमें से एक सांसद था। इसके अलावा दो फ़ेक नेटवर्क एक कांग्रेसी नेता से जुड़े हुए थे।

फ़ेसबुक की एक अंदरूनी जाँच टीम ने पाया कि दोनों नेटवर्क में ऐसे फ़ेक अकाउंट थे जो एक दूसरे से जुड़े हुए थे और आपस में ही एक दूसरे को चलाते थे।

फ़ेसबुक के जाँचकर्ताओं ने सिफारिश की इन अकाउंटों को 'चेकप्वाइंट' को भेज जाए, जिसका मतलब यह हुआ कि इन्हें तब तक लॉक कर दिया जाता जब तक इन्हें चलाने वाला खुद सामने आकर उसकी सच्चाई की पुष्टि नहीं करता।

फ़ेसबुक ने 19 दिसंबर 2020 को 500 अकाउंटों को 'चेकप्वाइंट' को भेज दिया। वही कर्मचारी 20 दिसंबर को दूसरे 50 अकाउंटों को भी 'चेकप्वाइंट' के हवाले करने की प्रक्रिया पर काम कर रहा था। उसने अपने वरिष्ठ को वह भेजा और उसके साथ सरकारी साझेदार और उच्च वरीयता का भारतीय से टैग भी कर दिया।

झांग ने पाया कि ये सारे 50 फ़ेक अकाउंट उस सांसद और उससे जुड़े लोगों के थे। 'द गॉर्डियन' अखबार को उस सांसद का नाम पता है, लेकिन उसने उसका खुलासा अपनी खबर में नहीं किया है।

झांग ने अखबार से कहा,

मैंने बार-बार पूछा कि उन फ़ेक अकाउंट पर आगे की क्या कार्रवाई करनी है। लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिल रहा था। मुझे पता था कि मैंने एक सासंद को रंगे हाथों पकड़ लिया है, पर इससे उन फ़ेक अकाउंटों को हटाना ज्यादा ज़रूरी था, कम ज़रूरी नहीं।


सोफ़ी झांग, पूर्व डेटा साइंटिस्ट, फ़ेसबुक

क्या कहना है फ़ेसबुक का?

फेसबुक की प्रवक्ता लिज़ बुर्जुआ ने अखबार से कहा कि झांग ने जो कुछ कहा है, वह गलत है। इस प्रवक्ता के अनुसार फ़ेसबुक पूरी दुनिया में प्लैटफ़ॉर्म के दुरुपयोग का पता लगाता है और उसे रोकता है, इसके लिए उसके पास अलग से लोग हैं।

प्रवक्ता ने यह भी कहा कि इसके पहले उसकी टीम ने भारत में भी इस तरह के दुरुपयोग का पता लगाया और उन अकाउंटों को हटाया है। लेकिन उस प्रवक्ता ने यह साफ नहीं कहा कि उसमें ये फे़क अकाउंट शामिल हैं या नहीं।

'द गॉर्डियन' का कहना है कि उसने इस मुद्दे पर फ़ेसबुक को मेल किया, जानकारी मांगी, लेकिन कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। कभी फ़ेसबुक ने कहा कि उन अकाउंट पर निगरानी रखी जा रही है तो कभी यह कहा कि उसके एक छोटे से हिस्से को वैसा नहीं पाया गया कि उन्हें हटा दिया जाए तो कभी कंपनी ने कहा कि वे अकाउंट अब निष्क्रिय पड़े हुए हैं।

फ़ेसबुक पर पहले भी लगे थे आरोप

इसके पहले साल 2020 में ही अमेरिकी अखबार 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने एक रिपोर्ट छापी थी। उस रिपोर्ट के मुताबिक़ फेसबुक इंडिया की पब्लिक पॉलिसी डाइरेक्टर आंखी दास पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने और अपनी ही कंपनी के दिशा निर्देशों का उल्लंघन करने के आरोप लगाये हैं।

अमेरिकी पत्रिका वॉल स्ट्रीट जर्नल ने कहा था कि कंपनी के कर्मचारियों के आपसी संचार के लिए बने ग्रुप पर आंखी दास ने पोस्ट किया, “हमने उनके (नरेंद्र मोदी) के लिए सोशल मीडिया की चिनगारी सुलगाई और बाकी तो इतिहास बन गया।”

 - Satya Hindi

इसी तरह अक्टूबर 2012 में दास ने कहा था, “मोदी की बीजेपी टीम को चुनाव के पहले हमने प्रशिक्षित किया और गुजरात में हमें कामयाबी मिली।”

इतना ही नहीं, फ़ेसबुक इंडिया की पब्लिक पॉलिसी डाइरेक्टर ने 2014 में आंतरिक पोस्ट में यह भी कहा था कि उन्होंने बीजेपी के लिए लॉबीइंग की है। उन्होंने लिखा, “बस अब वे आगे बढ़ें और यह चुनाव जीत जाएं।”

इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार, पिछले लोकसभा चुनाव के पहले जनवरी में बीजेपी ने 44 फ़ेसबुक पेजों की शिकायत यह कह कर की कि उन पर पोस्ट 'अपेक्षित मानकों का के ख़िलाफ़' हैं और 'तथ्यों से परे' हैं। 

उनमें से 14 पेज हटाए जा चुके हैं, वे इस समय फ़ेसबुक पर नहीं हैं।

नए खुलासे के बाद फिर सवाल उठने लगे हैं कि क्या बीजेपी और सत्तारूढ़ बीजेपी के बीच कोई सांठगांठ है। देखें यह वीडियो। 

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