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अब ईपीएफओ ब्याज दर तय करने में वित्त मंत्रालय का हस्तक्षेप होगा!

अब ईपीएफओ ब्याज दर तय करने में वित्त मंत्रालय का हस्तक्षेप होगा!

क्या अब ईपीएफओ के सदस्यों को उनकी जमा राशि पर उतना ब्याज नहीं मिलेगा जितना ज़्यादा मिलता रहा है? जानिए, आख़िर ब्याज दर की घोषणा से पहले वित्त मंत्रालय से मंजूरी लेने को क्यों कहा गया।

क्या कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ के सदस्यों की जमा राशि पर ब्याज दर तय करने में संगठन के केंद्रीय न्यासी बोर्ड के हाथ अब बंध गये हैं? अब तक बिना मंत्रालय से मंजूरी के ही ब्याज दर की घोषणा करते आ रहे ईपीएफ़ओ को ब्याज दर की सार्वजनिक घोषणा से पहले वित्त मंत्रालय से मंजूरी लेने को कहा गया है। ईपीएफओ श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अंतर्गत आता है। सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्राप्त ईपीएफ़ओ, वित्त मंत्रालय और श्रम और रोजगार मंत्रालय से मिली जानकारी के आधार पर यह दावा किया गया है।

वैसे, पिछले कुछ वर्षों में वित्त मंत्रालय ने ईपीएफओ द्वारा बरकरार रखी गई ऊँची ब्याज दर पर सवाल उठाया है। इसने लगातार समग्र ब्याज दर की स्थिति के अनुकूल ही इसे घटाकर 8 प्रतिशत से कम करने के लिए कहा है। फिलहाल, वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (8.2 प्रतिशत) के लिए ब्याज दर को छोड़कर, अन्य सभी छोटी बचत योजनाओं पर ईपीएफओ द्वारा घोषित ब्याज दर से कम ब्याज दर है।

बहरहाल, रिपोर्ट में कहा गया है कि ईपीएफ़ओ द्वारा तय की जाने वाली ब्याज दर में वित्त मंत्रालय का यह हस्तक्षेप तब किया गया है जब इस बार ईपीएफओ इस साल घाटे में चला गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 6 करोड़ ग्राहकों के लिए कर्मचारी भविष्य निधि और कर्मचारी पेंशन योजना संभालने वाला संगठन घाटे में चला गया। इसका अनुमानित अधिशेष 449.34 करोड़ रुपये का था, जबकि 197.72 करोड़ रुपये कम ही पड़ गये।

घाटे में जाने पर मंत्रालय को ठोस बहाना मिल गया और इसी को वजह बताते हुए इसने श्रम विभाग को चिट्ठी लिख दी। ईपीएफओ श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अंतर्गत आता है।

ईपीएफ़ओ के लिए सीबीटी ब्याज दर तय करने का फ़ैसला लेता है। सीबीटी, श्रम और रोजगार मंत्री की अध्यक्षता में एक वैधानिक निकाय है, जिसमें एक उपाध्यक्ष होता है, केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त, केंद्र सरकार के पांच प्रतिनिधि, 15 राज्य सरकार के प्रतिनिधि, 10 नियोक्ताओं के प्रतिनिधि और 10 कर्मचारियों के प्रतिनिधि।

घाटे होने के मुद्दे को वित्त मंत्रालय द्वारा जुलाई में श्रम मंत्रालय को एक पत्र में उठाया गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्याज दर घोषणा से पहले वित्त मंत्रालय से मंजूरी लेने की वजह इसी को बताया गया है।

घाटे को लेकर वित्त मंत्रालय ने यह भी सुझाव दिया है कि उच्च ईपीएफ़ ब्याज दरों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। मंत्रालय ने कहा, 'मौजूदा बाजार ब्याज दर और ईपीएफ़ओ ब्याज दर के बीच सामंजस्य सरकार के मौद्रिक नीति प्रसारण प्रयासों को मज़बूत करती है।'

बता दें कि 2016 में श्रम मंत्रालय द्वारा 8.80 प्रतिशत ब्याज दर की घोषणा के बाद वित्त मंत्रालय ने 2015-16 के लिए 8.70 प्रतिशत की कम ईपीएफ दर को मंजूरी दी। ट्रेड यूनियनों के विरोध के बाद वित्त मंत्रालय 2015-16 के लिए 8.8 प्रतिशत ब्याज दर की प्रारंभिक घोषणा पर वापस लौट आया। हालाँकि, इस बार प्रक्रिया में ही भारी बदलाव किया जा रहा है।

इस साल मार्च में ईपीएफओ के सीबीटी ने 2022-23 के लिए 8.15 प्रतिशत की ब्याज दर की सिफारिश की, जो पिछले वर्ष के 8.1 प्रतिशत से मामूली अधिक है। 2022-23 के लिए ईपीएफ ब्याज दर में बढ़ोतरी सेवानिवृत्ति निधि निकाय के 2021-22 के घाटे में जाने के बावजूद हुई थी। सीबीटी बैठक के बाद मार्च में श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2013 के लिए 8.15 प्रतिशत भुगतान के बाद, ईपीएफ के पास 663.91 करोड़ रुपये का अधिशेष बचे होने का अनुमान है।

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