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चुनाव के दौरान चुनावी बॉन्ड योजना में बदलाव आखिर क्यों?

चुनाव के दौरान चुनावी बॉन्ड योजना में बदलाव आखिर क्यों?

केंद्र सरकार ने 7 नवंबर को इलेक्ट्रोरल बॉन्ड में संशोधन कर दिया। उसके तहत नवंबर में भी इस बॉन्ड के जरिए डोनेशन लेने की छूट राजनीतिक दलों को दी गई। यह बदलाव हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए लागू चुनाव आचार संहिता के दौरान किया गया। सरकार के इस बदलाव पर तमाम शक और सवाल हो रहे हैं। क्यों है यह एजराज, जानिएः

केंद्र ने 7 नवंबर, 2022 को चुनावी बॉन्ड योजना में संशोधन कर दिया। यह संशोधन ऐसे समय किया गया है जब हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आचार संहिता लागू है। हिमाचल में तो 12 नवंबर को वोट पड़ने वाले हैं यानी पांच दिनों पहले केंद्र सरकार ने चुनावी बॉन्ड योजना में संशोधन कर दिया। तमाम राजनीतिक दलों और सिविल सोसाइटी के लोग इस पर एतराज कर रहे हैं। सरकार की ओर फिलहाल कोई सफाई नहीं आई है।

क्या है चुनावी बॉन्ड

मोदी सरकार ने 2017 में देश को बताया कि वो चुनावी डोनेशन के लिए एक योजना ला रही है। यह योजना 2018 में केंद्र सरकार लेकर आई। 2019 के आम चुनाव से एक साल पहले। इसके तहत साल में  चार बार चुनावी बॉन्ड खरीदे जा सकेंगे। अप्रैल, जनवरी, जुलाई और अक्टूबर महीने के पहले दस दिनों तक चुनावी बॉन्ड खरीदने का नियम तय हुआ था। इस बॉन्ड को आप या बड़े कॉरपोरेट, उद्योगपति भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की शाखा से खरीद सकते हैं। यह एक तरह का पैसे के रूप में वचन है जो आप किसी राजनीतिक दल को डोनेशन के तौर पर देते हैं। इसमें आपकी पहचान छिपी रहती है। यानी कोई भी उद्योगपति, कॉरपोरेट, आम आदमी चुनावी बॉन्ड खरीदकर अपनी पहचान बताए बिना किसी भी राजनीतिक दल को डोनेशन दे सकता है। पुराने नियम में उद्योगपतियों, कॉरपोरेट के अलावा राजनीतिक दलों को बताना पड़ता था कि उन्हें चंदा या डोनेशन कहां से आया है। 

क्या बदलाव हुआ

मोदी सरकार ने 7 नवंबर को इसमें जो बदलाव किया है, उसके मुताबिक "केंद्र सरकार द्वारा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभा के आम चुनावों के वर्ष में पंद्रह दिनों की अतिरिक्त अवधि में चुनावी बॉन्ड खरीदने की तारीख तय की जाएगी।”

इस बदलाव के फौरन बाद सरकार ने घोषणा की कि चुनावी बॉन्ड 9 नवंबर यानी आज से एसबीआई की शाखाओं पर एक हफ्ते के लिए बिक्री को उपलब्ध होंगे। इस घोषणा का अप्रत्यक्ष मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान अगर कोई किसी राजनीतिक दल को डोनेशन देना चाहता है तो वो चुनावी बॉन्ड के जरिए दे सकता है। फिर से दोहराते चलें कि यह बदलाव केंद्र सरकार ने 7 नवंबर को तब किया जब हिमाचल और गुजरात चुनाव की तारीख घोषित हो चुकी थी और आचार संहिता लागू थी।

विरोध के स्वर उठे

द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एस. कृष्णमूर्ति ने सरकार के इस कदम का विरोध किया। उन्होंने कहा: मैं चुनावी फंडिंग के लिए चुनावी बॉन्ड को मंजूरी नहीं देता। हमें एक राष्ट्रीय चुनाव कोष बनाकर चुनावों की सार्वजनिक फंडिंग करना चाहिए, जिसमें डोनेशन पर 100 फीसदी टैक्स छूट हो। ताकि डोनेशन देने वालों और राजनीतिक दलों के बीच कोई गठजोड़ न हो सके।

पूर्व केंद्रीय सचिव ई.ए.एस. सरमा ने चुनाव आयोग से इलेक्टोरल बॉन्ड की इस बिक्री को रोकने की मांग की है। उन्होंने इसे अनुचित कदम बताया और इसे सत्तारूढ़ पार्टी यानी बीजेपी द्वारा अनुचित फायदा उठाने का आरोप लगाया।

मौजूदा मामले में, मुझे लगता है कि वित्त मंत्रालय ने 7-11-2022 को गलत समय पर अधिसूचना जारी की है। यह अनुचित है। सत्तारूढ़ राजनीतिक दल द्वारा खुले तौर पर आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। वो एमसीसी की अनदेखी कर रही है। यह सुप्रीम कोर्ट को नजरन्दाज करना भी है, क्योंकि उसके सामने इससे संबंधित याचिका मौजूद है। ये कदम बाकी राजनीतिक दलों के लिए अवसर कम करेगा। मुझे लगता है कि चुनाव आयोग के लिए यह एक उपयुक्त मामला है कि वह सरकार को तुरंत कारण बताओ नोटिस जारी करे। अधिसूचना को तुरंत रद्द कर दिया जाए। ऐसा न करने पर निर्धारित चुनाव स्थगित कर दिए जाएं। अगर ऐसा नहीं किया गया तो आयोग सत्ताधारी दल (बीजेपी) को संवैधानिक अधिकार का अनुचित लाभ उठाने की अनुमति दे देगा।


ई.ए.एस. सरमा, पूर्व केंद्रीय सचिव, 9 नवंबर

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने भी चुनावी बॉन्ड में संशोधन का मुद्दा उठाया। उनका सवाल है कि दो राज्यों में विधानसभा चुनाव और आचार संहिता लागू रहने के दौरान चुनावी बॉन्ड योजना में क्यों बदलाव किया गया। महुआ ने चुनाव आयोग से जागने को कहा।

सीपीएम और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने भी सरकार के इस संशोधन का विरोध किया है। चुनावी बॉन्ड के खिलाफ 2017 में सीपीएम और एडीआर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। जिस पर अगले महीने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होना है। जैसा कि ऊपर बताया गया है मोदी सरकार ने 2018 में चुनावी बॉन्ड योजना लागू की थी लेकिन 2017 में इसके ड्रॉफ्ट पर जब बहस हो रही थी, सीपीएम और एडीआर ने इसके खतरे उसी समय भांप लिए थे और याचिका दायर कर दी थी।

अमीर होते राजनीतिक दलः चुनावी बॉन्ड योजना का सीपीएम के अलावा किसी भी राजनीतिक दल ने विरोध नहीं किया। ऐसा इसलिए हुआ कि चुनावी बॉन्ड से कुछ राजनीतिक दल मालामाल हो रहे हैं। जिसमें बीजेपी नंबर 1 पार्टी है। जितना डोनेशन उसे मिलता है, उसका मुकाबला भारत की कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं कर सकती।

 एडीआर ने इसी साल जून में एक रिपोर्ट जारी की थी। उस रिपोर्ट में एडीआर ने बताया था कि बीजेपी ने 4.23 हजार करोड़ के चुनावी बॉन्ड कैश कराए हैं या अपने खाते में जमा कराए हैं। यह 2018 से लेकर2020-21 का आंकड़ा है। बीजेपी को इन वर्षों में मिले कुल डोनेशन का 65 फीसदी पैसा चुनावी बॉन्ड से आया है। यह कांग्रेस को मिले कुल डोनेशन का छह गुणा ज्यादा है। यानी डोनेशन लेने में भी बीजेपी ने कांग्रेस को हाशिए पर पहुंचा दिया है। कांग्रेस पार्टी को इन वर्षों में महज 716 करोड़ का डोनेशन चुनावी बॉन्ड से मिला है। बाकी राजनीतिक दलों की हिस्सेदारी इससे भी कम है।  

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