चुनाव आयोग मतदाता सूची पर फैसला लेने के लिए 3 महीने क्यों मांग रहा?

02:43 pm Feb 26, 2025 | सत्य ब्यूरो

दिल्ली हाईकोर्ट को मंगलवार को चुनाव आयोग यानी ECI ने बताया कि वो तीन महीने में फैसला लेगा कि कांग्रेस सांसद रणदीप सुरजेवाला को मतदाता सूची देना है या नहीं। सुरजेवाला ने आयोग से 2009 से 2024 के बीच हरियाणा और महाराष्ट्र में हुए चुनावों की मतदाता सूची मांगी है। आयोग के पास यह मतदाता सूची हर समय तैयार रहती है लेकिन इसके बावजूद आयोग बहाने बना रहा है। हरियाणा और महाराष्ट्र की मतदाता सूचियों में गड़बड़ी की काफी शिकायतें चुनाव के दौरान आई थीं। लेकिन आयोग ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया।

हाईकोर्ट में जस्टिस ज्योति सिंह ने ECI के वकील की दलील को रिकॉर्ड किया। जिसमें वकील ने कहा कि चूंकि यह मामला 2009 से संबंधित है, इसलिए फौरन फैसला लेना संभव नहीं होगा। उन्होंने तीन महीने का समय मांगा।  

अदालत ने कहा, "ECI ने रिकॉर्ड पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि 29 दिसंबर, 2024 के ज्ञापन पर जल्द निर्णय लिया जाएगा और आज से तीन महीने से अधिक समय नहीं लिया जाएगा। इसलिए इस रिट याचिका का निपटारा मामले की तथ्यात्मक विवेचना में जाए बिना किया जाता है।" 

कांग्रेस नेता गुरदीप सप्पल ने इस घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा- फाइल कॉपी पेस्ट करने के लिए तीन महीने और! चुनाव आयोग ने हाई कोर्ट को कहा है कि कांग्रेस को वोटर लिस्ट का डेटा देने का फैसला वो तीन महीनों में करेगा। करीब तीन महीने पहले कांग्रेस ने 2009 से अब तक की हरियाणा और महाराष्ट्र की वोटर लिस्ट का डेटा मांगा था। सप्पल ने कहा कि जब सभी वोटरलिस्ट का डेटा चुनाव आयोग के सर्वर पर है। उसमें कोई बदलाव करना नहीं है। कोई विश्लेषण करना नहीं है। इनके प्रिंट आयोग, पार्टियों और उम्मीदवारों को चुनावों में दे चुका है। कुछ डेटा फाइल को कॉपी और पेस्ट करके देना है। इसमें क्या लाजिस्टिक चुनौती है?

सुरजेवाला की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने बताया कि ECI ने 29 दिसंबर के उस ज्ञापन पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है, जिसमें 2009 से 2024 के बीच हरियाणा और महाराष्ट्र में हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों की मतदाता सूची की मांग की गई थी।  

सिंघवी ने कहा कि 24 फरवरी को ECI ने संबंधित राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को एक पत्र जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि ज्ञापन पर कानून के अनुसार निर्णय लिया जाए और यदि जरूरी हो तो सांसद को सुनवाई का अवसर देने के बाद एक स्पीकिंग ऑर्डर पारित किया जाए। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिनिधित्व पर निर्णय लेने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई थी।

अदालत के समय सीमा तय करने के सवाल पर ECI के वकील ने कहा कि जल्द से जल्द निर्णय लिया जाएगा। सिंघवी ने तब कहा, "मैंने यह बात केवल इसलिए कही क्योंकि उन्हें यह कहने के लिए कि अब हम जवाब देंगे, दो महीने लग गए। दो महीने में उन्होंने कहा है कि अब हमें जवाब देने के लिए और समय चाहिए। यदि उनकी समझ में 'यथाशीघ्र' का मतलब यही है, तो यह एलिस इन वंडरलैंड की समय सीमा जैसा हो सकता है।"  

सुरजेवाला की याचिका में कहा गया था कि ECI से अपने कामकाज में पूरी पारदर्शिता की उम्मीद की जाती है, साथ ही चुनाव प्रक्रिया पर किसी भी स्तर पर, चाहे वह चुनाव से पहले, दौरान या बाद में हो, सत्यापन और जवाबदेही के लिए तैयार रहना चाहिए। याचिका में कहा गया, "इस प्रकार, यह जरूरी है कि निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों को आयोग द्वारा एकत्र किए गए डेटा की जांच करने की अनुमति दे, ताकि यह तय किया जा सके कि चुनाव प्रक्रिया में कोई अनदेखी विसंगतियां नहीं हैं।"

हरियाणा चुनाव में धांधली का आरोपहरियाणा विधानसभा चुनाव के मतदान के बाद एग्जिट पोल ने बताया कि राज्य में कांग्रेस सरकार बनने जा रही है। लेकिन नतीजे ठीक उल्टे आये। हरियाणा चुनाव को लेकर वोट फ़ॉर डेमोक्रेसी (वीएफ़डी) ने आयोग की बखिया उधेड़ दी। इस रिपोर्ट पर चुनाव आयोग ने चुप्पी साध ली थी। कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं। रिपोर्ट में बताया गया है कि हरियाणा में 5 अक्टूबर यानी मतदान के दिन शाम 7 बजे से मतगणना की पूर्वसंध्या यानी 7 अक्टूबर शाम 8:45 तक मतदान का वोट 6.71 प्रतिशत बढ़ाया गया। कुल मिलाकर 13 लाख वोट बढ़े जिसका अर्थ है प्रति विधानसभा औसतन 15 हज़ार वोटों की बढ़त। मतगणना शुरू होने के 12 घंटे पहले तक कुल मतदान की तादाद में हुई इस बढ़ोतरी का चुनाव आयोग ने कोई समझ में आने वाला तर्क नहीं दिया। हैरानी की बात ये है कि चुनाव आयोग ने अभी तक यह नहीं बताया कि हरियाणा में कुल कितने वोट पड़े। सिर्फ़ मतदान का प्रतिशत ही बताया गया है।

रिपोर्ट बताती है कि हरियाणा के पंचकूला और चरखी दादरी सहित कई ज़िलों में कुल वोटों की संख्या में 10 फ़ीसदी से अधिक की बढ़ोतरी देखी गयी जहाँ बीजेपी क़रीबी मुक़ाबले में फँसी थी। इन इलाक़ों में बीजेपी को आश्चर्यजनक रूप से फ़ायदा पहुँचा। वह मामूली अंतर से जीतने में सक्षम रही। रिपोर्ट बताती है कि इन दस ज़िलों में बीजेपी को काफ़ी कामयाबी मिली। वह यहाँ की 44 में से 37 सीटें जीतने में सफल रही, जबकि बाक़ी 12 ज़िलों में उसका प्रदर्शन बहुत ख़राब रहा जहाँ वह 46 में से केवल 11 सीटें ही जीत सकी। हैरानी की बात ये है कि एक ज़िले में मतदान का अंतिम आँकड़ा घटा भी। वह ज़िला मेवात है जहाँ अल्पसंख्यक आबादी काफ़ी ज़्यादा है।

वीएफडी की रिपोर्ट बताती है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में भी इसी तरह की अस्पष्टता देखने को मिली थी जिसका नतीजा बीजेपी के हक़ में गया था। आँकड़ों के हेरफेर की यह निरंतरता चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्र चुनाव कराने की उसकी क्षमता पर संदेह पैदा करती है। हरियाणा में आँकड़े के हेरफेर का असर ख़ासकर उन 17 निर्वाचन क्षेत्रों में पड़ा जहाँ बीजेपी की जीत का अंतर पाँच हज़ार वोटों से कम था। इंडियन नेशनल लोकदल जैसी पार्टियों को बहुत कम लाभ हुआ। रिपोर्ट बताती है कि इस हेरफेर ने बीजेपी को संभवत: 24 अतिरिक्त सीटों पर जीत दिलायी।

महाराष्ट्र में कम धांधली नहींः राज्य विधानसभा चुनाव के दौरान मतदान केंद्रों पर पीठासीन अधिकारियों द्वारा जारी निर्वाचन क्षेत्र और खंड-वार पूर्व-क्रमांकित पर्चियों (pre-numbered slips) की कुल संख्या के बारे में चुनाव आयोग के पास कोई जानकारी नहीं है। यह बात खुद केंद्रीय चुनाव आयोग या ईसीआई ने एक आरटीआई के जवाब में स्वीकार की है।

कांग्रेस पार्टी ने महाराष्ट्र में मतदान प्रतिशत बढ़ाने पर चिंता जताई थी और ईसीआई से स्पष्टीकरण मांगा था। ईसीआई को लिखे एक पत्र में, कांग्रेस ने मतदान के दिन शाम 5 बजे और रात 11.30 बजे ईसीआई द्वारा घोषित अंतिम मतदान प्रतिशत के बीच मतदान प्रतिशत में "बढ़ोतरी" पर प्रकाश डाला। कांग्रेस ने यह भी बताया कि, जिन 50 विधानसभा सीटों पर औसतन 50,000 मतदाताओं की वृद्धि हुई, उनमें से सत्तारूढ़ महायुति ने 47 पर जीत हासिल की। 

दिसंबर 2024 में, ईसीआई ने स्पष्ट किया कि शाम 5 बजे से रात 11.45 बजे तक मतदान प्रतिशत में वृद्धि "सामान्य" थी। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोकलिंगम ने बताया कि मतदान के अंतिम घंटे में मतदान प्रतिशत में 7 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। आयोग ने विपक्ष की आपत्तियों को ठुकरा दिया। हरियाणा-महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव और उससे पहले हुए लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार थे। लेकिन राजीव कुमार ने हर आपत्ति के जवाब को शेर-शायरी करके उड़ा दिया। राजीव कुमार के समय में भारत के चुनाव आयोग की संदिग्ध भूमिका पर आज भी सवाल उठ रहे हैं।