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हिमाचल के साथ ही गुजरात का चुनाव क्यों नहीं?

हिमाचल के साथ ही गुजरात का चुनाव क्यों नहीं?

हिमाचल प्रदेश के लिए आज चुनाव की घोषणा हो गई तो गुजरात विधानसभा के लिए आख़िर क्यों नहीं की गई? जबकि छह महीने के दायरे में होने वाले दो राज्यों के चुनावों को साथ कराने का प्रावधान है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार भले ही 'एक देश एक चुनाव' की बात करती रही है, लेकिन चुनाव आयोग ने तो क़रीब डेढ़ महीने के अंतराल पर पड़ने वाले दो राज्यों के चुनावों को ही अलग-अलग कराना तय किया है। ऐसा क्यों किया गया? मोदी सरकार आख़िर क्यों पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने पर जोर देती रही है? और आसपास की तारीख में ही पड़ते दो राज्यों के चुनाव साथ क्यों नहीं कराए जा रहे हैं?

इन सवालों के जवाब जानने से पहले जानिए कि आज चुनाव आयोग ने गुजरात का चुनाव हिमाचल प्रदेश के साथ नहीं कराने को लेकर क्या तर्क दिया है।

परंपरागत रूप से गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव एक साथ होते रहे हैं। इस बीच जब गुजरात चुनाव की घोषणा नहीं की गई तो यह फ़ैसला चौंकाने वाला लगा। ऐसा इसलिए भी क्योंकि नियमों के तहत यदि दो विधानसभाएँ छह महीने के दायरे में ख़त्म हो रही होती हैं तो ऐसे मामलों में चुनावों की घोषणा एक साथ की जाती है और परिणाम एक तारीख़ पर ही आते हैं।

जब इस मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के सामने सवाल खड़े किए गए तो उन्होंने कहा कि किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया गया है। उन्होंने कहा, 'दोनों राज्यों की विधानसभाओं की समाप्ति के बीच 40 दिनों का अंतर है। नियमों के अनुसार, यह कम से कम 30 दिन होना चाहिए ताकि एक परिणाम दूसरे को प्रभावित न करे।' एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा, 'मौसम जैसे कई कारण हैं। हम हिमपात शुरू होने से पहले हिमाचल का चुनाव कराना चाहते हैं।'

जिस तरह इस बार का चुनाव गुजरात और हिमाचल में अलग-अलग कराए जाने का फ़ैसला लिया गया है, वैसा ही फ़ैसला पिछले विधानसभा चुनाव में भी चुनाव आयोग ने लिया था। उस फ़ैसले के लिए चुनाव आयोग की तीखी आलोचना की गई थी। गुजरात में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि भाजपा ने घोषणा में देरी के लिए चुनाव आयोग पर दबाव डाला था।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने भी 2017 में गुजरात व हिमाचल के चुनाव अलग-अलग कराने को लेकर कहा था कि फ़ैसले से 'गंभीर सवाल' उठे।

कुरैशी ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा था, 'यह कुछ गंभीर सवाल उठाता है। दोनों राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल लगभग एक जैसा है। तो चुनाव आयोग को गुजरात के लिए तारीखों की घोषणा का इंतज़ार क्यों करना चाहिए?'

उन्होंने मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट यानी समान आचार संहिता (एमसीसी) को लेकर भी सवाल खड़े किए थे। एमसीसी एक समान कोड है जिसका उद्देश्य मौजूदा सरकार, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के आचरण पर नज़र रखकर चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों को समान अवसर प्रदान करना है। मिसाल के तौर पर एमसीसी के दिशानिर्देशों के तहत सत्ता में रहने वाली सरकार मतदाताओं को प्रभावित करने वाली किसी भी छूट या नए निर्णय की घोषणा नहीं कर सकती है। एमसीसी चुनाव आयोग द्वारा मतदान की तारीख़ों की घोषणा की तारीख़ से लागू होता है और मतदान के दिन तक चलता है।

पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी पर ऐसे ही आरोप लगे थे। आरोप लगाया गया था कि हिमाचल प्रदेश के चुनाव की घोषणा तो कर दी गई, लेकिन गुजरात के लिए घोषणा इसलिए नहीं की गई कि करोड़ों रुपये की योजनाओं का उद्घाटन किया जाना था। 

ऐसा तब है जब मोदी सरकार इसकी पैरवी करती रही है कि 'एक देश एक चुनाव' होना चाहिए। 2019 में तो प्रधानमंत्री मोदी ने सभी राजनीतिक दलों के प्रमुखों की बैठक बुलाई थी। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार सार्वजनिक मंचों से इस मुद्दे पर बात कर चुके हैं। मोदी कह चुके हैं कि यह किसी एक पार्टी या एक व्यक्ति का एजेंडा नहीं है, यह देश के हित से जुड़ा काम है और इसके लिए सबको मिलकर आगे आना होगा।

बीजेपी नेता अमित शाह ने 2018 में विधि आयोग को पत्र लिखकर ‘एक देश-एक चुनाव’ के समर्थन में कई तर्क दिए थे। बीजेपी का तर्क है कि भारत में अलग-अलग चुनाव होने से ज़्यादा सरकारी रकम ख़र्च होती है और क़ीमती समय भी नष्ट होता है।

बीजेपी का कहना है कि अगर औसत देखा जाए तो साल में लगभग तीन सौ दिन कहीं न कहीं किसी न किसी तरह के चुनाव होते रहते हैं और आचार संहिता लागू रहती है। इसका सीधा असर विकास पर पड़ता है। 

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