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लोकसभा चुनाव 2019 में किसे कितनी सीटें और कितने प्रतिशत वोट मिले थे 

लोकसभा चुनाव 2019 में किसे कितनी सीटें और कितने प्रतिशत वोट मिले थे 

आम चुनाव 2024 की घोषणा हो चुकी है। लेकिन इस समय लोगों को 2019 के आम चुनाव की याद आ रही होगी कि उस समय किस दल को कितनी सीटें और कितने प्रतिशत वोट मिले थे। यह भी जानिए की मोदी मैजिक के आगे बाकी सारी पार्टियां ढेर हो गईं। 

लोकसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड जीत मिली थी और ‘मोदी मैजिक’ वोटरों के सिर चढ़कर बोला था। बीजेपी ने अपने दम पर 2014 से भी ज़्यादा सीटों पर जीत दर्ज की। 2014 में बीजेपी को 282 सीटें मिली थीं। 2019 में उसने 303 सीटों पर जीत दर्ज की है और एनडीए को कुल 348 सीटों पर जीत मिली है। चुनाव में मोदी के जादू के आगे सब ढेर हो गए। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी अमेठी में चुनाव हार गए थे तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के किले में गहरी सेंध लग गई। उधर, उड़ीसा में नवीन पटनायक विधानसभा चुनाव में तो ख़ुद को बचा पाने में कामयाब रहे लेकिन लोकसभा में उनका प्रदर्शन भी ख़राब रहा था।

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वोटरों पर नरेंद्र मोदी का ऐसा सम्मोहन चला कि विपक्ष का गठबंधनी फ़ॉर्मूला बुरी तरह फ़्लॉप हो गया। उत्तर प्रदेश में माना जा रहा था कि सपा और बसपा का गठबंधन बीजेपी के लिए बहुत बड़ी मुसीबत बनेगा लेकिन वह मुश्किल से बस अपनी ही नाक ही बचा सका। बीजेपी को कुल 63 सीटों पर जीत मिली थी जबकि गठबंधन सिर्फ़ 16 सीटों पर सिमट गया। कांग्रेस सिर्फ़ रायबरेली में जीत हासिल कर सकी। कहा जा रहा है कि इस बार भाजपा की सीटें यूपी में बढ़ने जा रही हैं।

2019 चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़कर 33.3 फीसदी हो गया। जबकि कांग्रेस का वोट प्रतिशत 19.4 फीसदी रह गया। अन्य का वोट प्रतिशत 41 फीसदी रहा था। इसमें डीएमके और टीमसी के 6 फीसदी से कुछ ज्यादा को जोड़ दिया जाए तो विपक्ष का वोट प्रतिशत भाजपा से कहीं ज्यादा बैठता है। लेकिन विपक्ष जिस तरह 2019 में बंटा था, उसी तरह 2024 में भी बंटा हुआ है और इसीलिए भाजपा चुनाव सर्वे में बाजी मारती दिख रही है।

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बिहार में तो विपक्ष के गठबंधन का बहुत ही बुरा हाल रहा था, जहाँ कांग्रेस-आरजेडी-आरएलएसपी-वीआईपी-हम गठजोड़ 40 में से केवल 1 सीट पर जीत हासिल कर सका था। कर्नाटक में भी गठबंधन के जुए से कांग्रेस को कुछ हासिल नहीं हुआ था। लोकसभा चुनाव को देखते हुए ही कांग्रेस ने जनता दल एस की सरकार बनवाने के लिए अपना दावा छोड़ दिया था। लेकिन वहाँ भी यह गठबंधन कुल 28 में से सिर्फ़ 2 सीटें जीत सका। कर्नाटक में यह कांग्रेस का एक दशक का सबसे ख़राब प्रदर्शन था। मोदी-शाह की जोड़ी के नेतृत्व में बीजेपी असम और उत्तर-पूर्व के बाद बंगाल और उड़ीसा में काफ़ी हद तक अपने पैर जमाने में कामयाब रही थी। लेकिन उसके बाद 2023 में जब कर्नाटक के विधानसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस ने भाजपा को बुरी तरह पराजित कर दिया था। 

बीजेपी को केरल में भी निराशा का सामना करना पड़ा था, जहां इस बार वो एक-दो सीट जीतने की फिराक में है। 2019 में सबरीमला मुद्दे के जरिये उसने हिंदुत्व की धार चमकाने की कोशिश की थी लेकिन वह कोई भी सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी। बीजेपी को हिंदी पट्टी के राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, छत्तीसगढ़ में ही बड़ी जीत मिली थी। इसके अलावा महाराष्ट्र, गुजरात में भी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया था। लेकिन तमिलनाडु में बीजेपी और उसके सहयोगी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाये। तमिलनाडु में कांग्रेस की सहयोगी डीएमके ने शानदार प्रदर्शन किया है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी अपनी परंपरागत सीट अमेठी में बीजेपी उम्मीदवार स्मृति ईरानी से हार गए थे। लखनऊ से राजनाथ सिंह, सुल्तानपुर से मेनका गाँधी, पीलीभीत से वरुण गाँधी, इलाहाबाद से रीता बहुगुणा जोशी, गौतम बुद्ध नगर से डॉ. महेश शर्मा सहित कई दिग्गज नेता चुनाव जीत गए थे। आज़मगढ़ में एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बीजेपी प्रत्याशी दिनेश लाल यादव निरहुआ को हराया था। लेकिन बाद में उपचुनाव हुआ तो निरहुआ जीत गए थे। मोदी की सुनामी के दौरान कई दिग्गजों का भी सूपड़ा साफ़ हो गया था। बीजेपी से कांग्रेस में आए फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा बीजेपी उम्मीदवार रवि शंकर प्रसाद से चुनाव हार गए। बिहार की बेगूसराय सीट से मैदान में उतरे सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार को बीजेपी उम्मीदवार गिरिराज सिंह के हाथों हार का मुँह देखना पड़ा था। 

ज्योतिरादित्य सिंधिया 2019 में मध्य प्रदेश की गुना सीट से चुनाव हार गए थे। उसके बाद वो कुछ विधायकों के साथ बगावत करके भाजपा में चले गए। हालांकि जब वो चुनाव हारे थे तो उस समय मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे। भोपाल से चुनाव लड़ रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह बीजेपी की उम्मीदवार और मालेगाँव धमाकों की आरोपी साध्वी प्रज्ञा के हाथों शिकस्त खा बैठे था। हालांकि भाजपा ने इस बार साध्वी प्रज्ञा को टिकट ही नहीं दिया।

भाजपा ने 2019 का चुनाव राष्ट्रवाद के मुद्दे को आधार बनाकर लड़ा था। जबकि कांग्रेस ने बेरोज़गारी, किसानों की ख़राब हालत, रफ़ाल सौदे में गड़बड़ी को मुद्दा बनाया था। कांग्रेस ने रफ़ाल सौदे को लेकर जोर-शोर से ‘चौकीदार चोर है’ का भी नारा दिया था और उसे उम्मीद थी कि वह इसके दम पर चुनाव जीत जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हालाँकि कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेताओं ने एग्ज़िट पोल के नतीजों को खारिज कर एकजुट होने की कोशिशें शुरू कर दी थीं, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि एनडीए बहुमत के आंकड़े से दूर रह जाएगा। इस चुनाव में भाजपा राम मंदिर को भुनाने की कोशिश में है। हालांकि पूरा राम मंदिर अयोध्या में अभी बन नहीं पाया है। उसका सिर्फ एक हिस्सा बना है लेकिन 22 जनवरी को पीएम मोदी ने वहां प्राण प्रतिष्ठा कर दी और उसके बाद जनता के लिए उसे खोल दिया गया। भाजपा शासित राज्यों से श्रद्धालुओं को अयोध्या में ट्रेनों और बसों से लाया जा रहा है। रेलवे ने स्पेसल ट्रेनें इसी के लिए चलाई हैं।

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