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क्या बीत चुके हैं अर्थव्यवस्था के दुख भरे दिन? 

क्या बीत चुके हैं अर्थव्यवस्था के दुख भरे दिन? 

देश के आर्थिक विमर्श में इन दिनों नई हरी पत्तियों की चर्चा अचानक ही शुरू हो गई है। सितंबर महीने के जो आँकड़ें हैं वे भले ही कोई बड़ी उम्मीद न बंधी रही हो, राहत तो दे ही रहे हैं। 

देश के आर्थिक विमर्श में इन दिनों नई हरी पत्तियों की चर्चा अचानक ही शुरू हो गई है। मार्च महीने में लॉकडाउन शुरू होने के बाद अर्थव्यवस्था की जो बेलें सूखने लग गई थीं, उन पर अब यहाँ वहाँ उम्मीद के कुछ कल्ले फूटते दिख रहे हैं। सितंबर महीने के जो आँकड़े हैं, वे भले ही कोई बड़ी उम्मीद न दे रहे हों, राहत तो दे ही रहे हैं। इससे कम से कम यह अनुमान तो लगाया ही जा रहा है कि इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में पूरी अर्थव्यवस्था जिस तरह गोता लगाकर शून्य से 23 प्रतिशत नीचे तक डूबती दिखाई दी थी, इस बार हालात शायद उतने बुरे नहीं होंगे।

बंधती उम्मीदें

उम्मीद बंधाने वालों के हाथ जो आँकड़े लगे हैं वे काफी प्रभावशाली हैं, और उनकी सरल व्याख्याएँ भी सामने आ चुकी हैं। जीएसटी की उगाही काफी तेजी से बढ़ी है। पेट्रोल की खपत जो अप्रैल महीने में 60 फ़ीसदी से भी नीचे चली गई थी, अब शून्य से उपर उठते हुए 2 फ़ीसदी तक जा चुकी है। लेकिन अगर डीज़ल फिर भी शून्य से नीचे ही अटका हुआ है तो इसका अर्थ हम कुछ और भी लगा सकते हैं, फिर भी यह अप्रैल से तो बेहतर स्थिति में है।

फिर राजमार्गों पर टोल का संग्रह भी बढ़ा है। कारों की बढ़ती बिक्री पर तो खैर अख़बारों के पन्ने बहुत पहले ही रंगे जाने लगे थे। अब एक नई ख़बर आई है कि राष्ट्रीय स्तर पर अगर हम 7 दिन के औसत के हिसाब से देखें तो सितंबर में खपत भी तेज़ी से बढ़ी है। बंदरगाहों पर कंटेनरों की आवजाही अब कोविड काल से पहले की स्थिति में पहुँचती दिख रही है।

क्या यह मान लिया जाए कि दुख भरे दिन अब बीत चुके हैं और अर्थव्यवस्था अब हरियाली की ओर बढ़ी चली है अगर नई हरियाली की बात न भी करें तो क्या अर्थव्यवस्था कोविड के पहले वाले युग यानी मार्च से पहले के सामान्य हालात की ओर लौट रही है

आर्थिक गतिविधियाँ

कोरोना वायरस के संक्रमण को हम भले ही पूरी मात न दे सकें हों, लेकिन जैसे-जैसे देश लॉकडाउन से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है, इसमें से बहुत सी चीजें तो होनी ही थीं। अगर सड़कों पर गाड़ियाँ लौटेंगी तो पेट्रोल की खपत तो बढ़ेगी ही। टोल कलेक्शन भी बढ़ेगा। 

5 महीने तक मुट्ठी कसने के बाद अगर लोग ज़रूरी ख़रीदारी के लिए उसे ढीला करेंगे तो जीएसटी कलेक्शन भी बढ़ेगा। जब सड़कों-बाज़ारों में सक्रियता बढ़ेगी तो अर्थव्यवस्था की रंगत भी कुछ तो सुधरनी ही थी। सभी नहीं तो बहुत से कल- कारखाने भी फिर से चल पड़े हैं। त्योहारी सीज़न कुछ तो आगे ले जाएगा ऐसी उम्मीद सभी को है। ऐसी गतिविधियाँ और उम्मीदें ही तो वृद्धि दर को गति देती हैं।

लॉकडाउन के बाहर

लेकिन ऐसे चुनिंदा आँकड़ों से पूरी अर्थव्यवस्था के बारे में किसी पक्के नतीजे पर पहुँच जाने का समय शायद अभी नहीं आया है। यह ज़रूर है कि पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था ने जिस तरह गोता लगाया था, इस बार हालात उसके मुक़ाबले थोड़े सुधरे हुए तो मिलेंगे।

पहले 5 महीनों में जो झटके लगे हैं, उनके बाद सिर्फ एक सितंबर के बल पर पूरी अर्थव्यवस्था अपने पुराने वैभवकाल में लौट जाएगी, यह उम्मीद बांधना शायद इस महीने के आँकड़ों के साथ ज़्यादती होगी।

पहले ही सिकुड़ गई थी अर्थव्यवस्था

मार्च महीने में अचानक लागू हुए लॉकडाउन ने सबसे बड़ा काम यह किया कि उसने अर्थव्यवस्था के उस आधार को अचानक बहुत तेज़ी से संकुचित कर दिया जिस पर विकास और विस्तार की संभावनाएँ अपने पैर जमाती हैं। लगभग सभी आर्थिक और उत्पादन गतिविधियाँ बंद हो गईं। करोड़ों लोग बेरोज़गार हो गए। बहुत से लोगों के लिए तो फिर से रोजगार पाने की संभावनाएँ भी ख़त्म हो गईं।

यह मुमकिन है कि बहुत से आँकड़े फिर से सामान्य दिखने लगें, लेकिन जब तक बेरोज़गारी दर के आँकड़े पटरी पर नहीं आते हैं, यानी वे कोरोना काल से पहले वाली स्थिति में नहीं लौटते हैं, हम यह नहीं कह सकते कि अर्थव्यवस्था की गाड़ी फिर से अपनी पुरानी रफ़्तार पर लौट जाएगी।

रफ़्तार नहीं

अभी स्थिति यह है कि 6 महीने बाद भी कई छोटी और मध्यम औद्योगिक इकाइयाँ फिर से शुरू नहीं हो सकी हैं। जो शुरू हुई हैं, वहाँ भी काम अभी पुरानी रफ़्तार पर नहीं लौट सका है। कुछ इसलिए कि बाज़ार में माँग अभी पहले जैसी नहीं है, कुछ इसलिए कि जो कामगार काम छोड़कर गाँव लौट गए थे उनमें से बहुतेरे मनरेगा को ही अपनी नियति मानकर वहीं रह गए हैं।

हमारी अर्थव्यवस्था में निर्माण यानी कंस्ट्रक्शन सबसे बड़ा क्षेत्र भले ही न हो, लेकिन इस मायने में वह सबसे बड़ा क्षेत्र ज़रूर है कि अकुशल मजदूरों को सबसे अधिक रोज़गार इसी क्षेत्र में मिलता है। सरकारी परियोजनाओं पर काम फिर से शुरू हो गया है, लेकिन निजी क्षेत्र में कंस्ट्रक्शन का काम अभी भी अटका पड़ा है। यह भी माना जा रहा है कि इस क्षेत्र पर मंदी का असर शायद सबसे ज्यादा लंबे समय तक रहने वाला है। बाकी जगह हरी पत्तियाँ भले ही नज़र आ रही हों, लेकिन इस क्षेत्र से सूखा अभी जाने का नाम ही नहीं ले रहा है।

सितंबर के सभी आँकड़े उम्मीद बंधा रहे हों ऐसा भी नहीं है। डीज़ल की ख़पत अगर अभी भी शून्य से नीचे ही है तो यह बताता है कि देश में कारोबारी गतिविधियाँ अभी सामान्य स्थिति में नहीं आ सकी हैं।

एकरूपता नहीं

फिर कुछ आँकड़े ऐसे भी हैं, जिनकी तह में जाने से पता लगता है कि मामला कुछ और ही है, जैसे बिजली की खपत के आँकड़ें। यह ठीक है कि अखिल भारतीय आंकड़ों में बिजली की खपत सितंबर में बढ़ी दिखाई देती है लेकिन ऐसा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार की बढ़ी मांग के कारण हुआ है। जबकि तमिलनाडु, महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक जैसे ज्यादा उद्योगों वाले प्रदेशों में यह मांग नहीं बढ़ी है। जाहिर है कि बिजली की खपत बढ़ने का यह आंकड़ा हमें उत्पादन में बढ़ोत्तरी के बारे में कुछ नहीं बताता।

यह ठीक है कि अगर हम अप्रैल, मई, जून के हिसाब से देखें तो हालात सुधर रहे हैं और उन्हें सुधरना ही है। सुधार का यह सिलसिला न सिर्फ बरक़रार रहना चाहिए बल्कि इसमें तेज़ी भी आनी चाहिए। लेकिन सच यही है कि जब तक कोरोना वायरस पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं होता, इससे बड़ी उम्मीद फ़िलहाल नहीं बाँधी जा सकती। कुछ नई हरी टहनियाँ हमें राहत दे रही हैं, लेकिन चौतरफा हरियाली के लिए अभी बहुत से भगीरथ प्रयत्न साधने की जरूरत है। 

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