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आर्थिक प्रतिबंधों से क्या तबाह होगा रूस? 

आर्थिक प्रतिबंधों से क्या तबाह होगा रूस? 

यूक्रेन पर हमला करने के बाद से ही रूस पर दुनिया के कई देशों ने तमाम तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या इन प्रतिबंधों से उसे कोई नुकसान होगा?

नेपोलियन बोनापार्ट ने 1806 में कॉन्टिनेंटल ब्लॉकेड का एलान करते हुए ब्रिटेन के साथ हर तरह की आर्थिक और व्यापारिक गतिविधियों पर रोक लगा दी थी। उनका मानना था कि इससे ब्रिटेन आर्थिक रूप से तबाह हो जाएगा और जो काम उनकी सेना नहीं कर सकी, वह मक़सद इस तरीके से हासिल हो जाएगा। यूरोपीय संघ ने जब 2022 में यूक्रेन पर हमले के ख़िलाफ़ रूस पर आर्थिक प्रतिबंधों का ऐलान किया तो उसकी याद आना स्वाभाविक है।

यूरोपीय संघ के ऐलान के दो दिन के अंदर ही रूसी मुद्रा रूबल का ज़बरदस्त अवमूल्यन हुआ और यह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 30 प्रतिशत नीचे गिरा। रूसी केंद्रीय बैंक को अगले ही दिन ब्याज दरों को दूने से ज़्यादा करना पड़ा, इससने 9.5 प्रतिशत से बढ़ा कर 20 प्रतिशत कर दिया। यह अव्यावहारिक दर है और दुनिया की कोई भी अर्थव्यवस्था इस दर पर ब्याज नहीं दे सकती।

रूसी रूबल का अवमूल्यन अभी और होना है क्योंकि फिलहाल ट्रेड सरप्लस वाली रूसी अर्थव्यवस्था यूरोपीय देशों में निर्यात में कमी होने से व्यापार घाटे वाली अर्थव्यवस्था बन जाएगी तो इसकी करेंसी पर दबाव बढ़ेगा।

यूरोपीय संघ के प्रतिबंध के बाद रूस अपने लगभग 630 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा नहीं निकाल पाएगा।

अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग लेनदेन की प्रक्रिया स्विफ्ट (सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन) से रूसी बैंकों को बाहर कर देने से ये बैंक पैसों का अंतरराष्ट्रीय लेनदेन नहीं कर सकेंगे। दुनिया के 200 देशों की 11 हज़ार कंपनियां इससे जुड़ी हुई हैं।

यूरोपीय संघ ने रूसी नियंत्रण वाले सभी हवाई जहाज़ों को अपने किसी सदस्य देश के किसी हवाई अड्डे पर नहीं उतरने देने का ऐलान कर दिया है। रूसी हवाई कंपनी एअरोफ़्लोत को तबाह करना इसका मक़सद है।

यूरोपीय संघ ने रूस को सेमीकंडक्टर उद्योग से जुड़ी किसी चीज का निर्यात नहीं करने का भी ऐलान किया है। हालांकि रूस चीन से सेमीकन्डक्टर उत्पाद लेता है, पर वह वाशिंग मशीन जैसी छोटी मोटी चीजों में इस्तेमाल होता है। सैटेलाइट या मिसाइल या हवाई उद्योग में इस्तेमाल होने वाला सेमीकंडक्टर उत्पाद यह अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों से ही लेता है।

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लेकिन यूरोपीय की यह आर्थिक नाकेबंदी उसकी दोहरी नीति या दोगलेपन को ही दर्शाती है, जिसे वह बड़ी होशियारी से छिपाए हुए है।

यूरोपीय संघ ने रूस से गैस खरीदने पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया, यह सवाल किसी  नहीं पूछा है। यह सवाल यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सला वैन डेर लेयेन से भी पूछा जाना चाहिए, जिन्होंने काफी बहादुरी से आर्थिक प्रतिबंधों का ऐलान किया और कहा कि पुतिन को रोकने का यही तरीका है।

यूरोपीय संघ के देश अपनी ज़रूरतों का 40 प्रतिशत प्राकृतिक गैस रूस से खरीदते हैं, बाकी गैस नॉर्वे और अल्जीरिया से लेते हैं।

यूरोपीय संघ के देश रूस से हर साल लगभग 190 बिलियन क्यूबिक सेंटीमीटर गैस खरीदते हैं। इसके अलावा ये देश यूक्रेन से सालाना लगभग 52 बिलियन क्यूबिक सेंटीमीटर गैस लेते हैं।

जनवरी 2021 में यूरोपीय बाज़ार में प्रति थर्म यानी प्रति सौ क्यूबिक सेंटीमीटर प्राकृतिक गैस की कीमत लगभग 20 यूरो थी, यह बढ़ती हुई नवंबर 2021 में 110 यूरो तक पहुंच गई। यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के बाद इसकी कीमत में आग लगी और अगले ही दिन यह 170 यूरो तक पहुंच गई। 1 मार्च यानी यह खबर लिखी जाते समय यूरोप में गैस की कीमत प्रति सौ क्यूबिक सेंटीमीटर 117 यूरो है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि प्रतिबंध जारी रहे तो यह कीमत 200 यूरो प्रति सौ क्यूबिक सेंटीमीटर तक पहुंच सकती है।

यह हाल तो तब है जब रूसी गैस कंपनी गैज़प्रोम ने युद्ध और प्रतिबंधों के बावजूद गैस की आपूर्ति बदस्तूर जारी रखी है। यदि गैस की आपूर्ति बंद हो जाए तो क्या होगा, यह अहम सवाल है।

कीमत को दरकिनार कर दिया जाए तो सवाल यह है कि क्या यूरोपीय देश बगैर गैस के रह लेंगे? पूरे यूरोपीय संघ के लगभग सारे देश सर्दियों से बचने के लिए घरों को गर्म रखने की व्यवस्था गैस से करते हैं क्योंकि यह सस्ता भी है और आसान भी। यह गैस रूस से आता है।

यूरोपीय देशों की दोमुंहापन एक और कदम से साबित होता है। जर्मनी के चांसलर ओलाफ स्कोल्ज़ ने जर्मनी में चल रहे नॉर्ड स्ट्रीम दो के कामकाज पर रोक लगा दी। पर उन्होंने यह ऐलान नहीं किया कि उनका देश नॉर्ड स्ट्रीम 1 से आने वाला गैस नहीं खरीदेगा।

नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइन है जो रूस से जर्मनी को जोड़ता है, यह बाल्टिक सागर के नीचे से गुजरता है।

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और कच्चा तेल?

अमेरिका और सऊदी अरब के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़े तेल उत्पादक देश रूस है। यह अपने उत्पाद का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा यूरोपीय संघ के देशों को बेचता है। यह यूरोपीय संघ के देशों की ज़रूरत का लगभग 40 प्रतिशत है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेन्सी के अनुसार, साल 2020-21 में यूरोपीय देशों ने रूस से रोज़ाना 4.5 मिलियन बैरल कच्चा तेल खरीदा, जो उनकी कुल ज़रूरत का 34 प्रतिशत था।

यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के ऐलान के अगले ही दिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल हो गई। यह पिछले दस साल की उच्चतम कीमत है। एक बैरल लगभग लगभग 159 लीटर होता है।

यह हाल तो तब है जब अब तक रूस से तेल और गैस की कीमत में कोई कटौती नहीं हुई है।

गैस और तेल की कीमत बढ़ी तो यूरोपीय संघ के सभी देशों में उत्पादन और लागत खर्च ही नहीं बढ़ेगा, महंगाई भी बढ़ेगी।

अब तक सिर्फ कनाडा ने रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने का एलान किया है, उसके पास के देश ब्राजील और वेनेज़ुएला हैं, जिनसे वह कच्चा तेल ज़्यादा खरीद सकता है। क्या यूरोपीय देश रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदना बंद करेंगे? शायद नहीं।

रूस ने अपनी हवाई कंपनियों पर यूरोपीय प्रतिबंधों के ऐलान के बाद यूरोप के 36 देशों की हवाई कंपनियों के रूस में उतरने से रोक दिया। इसकी चपेट में ब्रिटिश एअरवेज, स्कैंडिनेवियन एअरवेज, लुफ्तांसा ही नहीं, अमेरिका की तमाम हवाई कंपनियां भी आएंगी। क्या उन पर कोई असर नहीं पड़ेगा?

यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों का सबसे हास्यास्पद कदम रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और रक्षा मंत्री सर्गेई सोग्यू की यूरोप में स्थित जायदाद पर प्रतिबंध लगाने का है। इन लोगों की कितनी जायदाद यूरोप में है? यूरोपीय संघ सिर्फ दिखावे के लिए ऐसा कर रहा है।

यूरोपीय संघ है व्यापारिक साझेदार 

रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार यूरोपीय संघ ही है। रूस विश्व व्यापार संगठन का सदस्य 2012 में बना और उसके बाद से ही यूरोपीय संघ के साथ उसके व्यापारिक रिश्तों में गुणात्मक बदलाव आया। साल 2020 में रूस और यूरोपीय संघ के बीच 174.3 अरब डॉलर का दो तरफा कारोबार हुआ। रूस ने यूरोपीय संघ को 95.3 अरब डॉलर का निर्यात किया, जिसमें ईंधन उत्पाद सबसे ज्यादा थे। रूस ने यूरोपीय संघ को 67.3 अरब डॉलर का कच्चा तेल व गैस बेचा। दूसरी ओर, उसने यूरोपीय संघ के देशों से 79 अरब डॉलर का आयात किया।

इसके अलावा यूरोपीय संघ रूस में सबसे बड़ा विदेशी निवेशक भी है। यूरोपीय देशों ने साल 2019 में रूस में 311 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किया, जिसका बड़ा हिस्सा स्टॉक मार्केट में निवेश था। दूसरी ओर, रूस ने यूरोपीय संघ के देशों के स्टॉक मार्केट में 136 अरब डॉलर का निवेश किया।

सवाल यह है कि क्या यूरोपीय संघ के देश इतने बड़े बाज़ार को हाथ से जाने देंगे? यही सवाल रूस पर भी लागू होता है, पर यूरोपीय संघ से यह सवाल इसलिए पूछा जाना चाहिए कि उसने आर्थिक प्रतिबंधों का एलान किया है। क्या यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्थाएं इसके लिए तैयार हैं?

कोरोना का असर

कोरोना की चपेट में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था आई और यूरोपीय संघ के देशों पर इसका बहुत ही घातक असर रहा। यूरोपीय संसद के एक अध्ययन के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2020-2021 में यूरोपीय संघ के 27 देशों के कुल जीडीपी वृद्धि दर -6.3 प्रतिशत रही। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान -7.2 प्रतिशत तो विश्व बैंक का अनुमान -7.4 प्रतिशत का है। इस स्थिति के बाद अर्थव्यवस्था सुधरने लगी और इसके शुरुआती लक्षण दिखने लगे तो यूक्रेन संकट आ खड़ा हुआ। क्या यह यूरोपीय अर्थव्यवस्था को चौपट नहीं कर देगा?

यूक्रेन पर रूसी हमला निश्चित तौर पर निंदनीय है और इसे जल्द से जल्द बंद कराना ज़रूरी है। पर क्या यह मकसद आर्थिक प्रतिबंधों से हासिल हो जाएगा? रूसी अर्थव्यवस्था को चौपट करने की कोशिश में क्या यूरोपीय संघ अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार रहे हैं?

नेपोलियन बोनापार्ट ने ब्रिटेन को तबाह करने के लिए जिस कॉन्टिनेंटल ब्लॉकेड का सहारा लिया था, वही उनकी तबाही का बड़ा कारण बना। क्या यूरोपीय इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है?

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