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फ्रीबीज: चुनाव आयोग भी दलों पर लगाम कसने की तैयारी में?

फ्रीबीज: चुनाव आयोग भी दलों पर लगाम कसने की तैयारी में?

राजनीतिक दलों द्वारा कथित तौर पर बाँटी जानी वाली जिस रेवड़ी पर बहस जारी है, उस पर अब चुनाव आयोग ने भी लगाम लगाने की तैयारी की है। जानिए, चुनाव आयोग क्या चाहता है।

फ्रीबीज यानी मुफ़्त की 'रेवड़ी' बांटने को लेकर चुनाव आयोग जल्द ही एक परामर्श पत्र जारी करने की योजना बना रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार उस प्रस्तावित योजना में कहा गया है कि राजनीतिक दल विधानसभा या आम चुनावों से पहले किए गए वादों की लागत का विवरण दें और उन वादों को पूरा करने के लिए पैसे कहाँ से आएँगे, मतदाताओं को इसकी जानकारी भी दें।

द इंडियन एक्सप्रेस ने चुनाव आयोग के सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि राजनीतिक दलों को वादे करने से नहीं रोका जा सकता है, तो मतदाता को भी यह जानने का अधिकार है कि वो वादे कैसे पूरे किए जाएँगे। इसलिए चुनाव आयोग ने पार्टियों और राज्य सरकार या केंद्र सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी है। 

फ्रीबीज पर चुनाव आयोग को लेकर यह रिपोर्ट तब आई है जब 'रेवड़ी कल्चर' को लेकर आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच बहस चल रही है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले यह कहकर बहस को छेड़ा था कि हमारे देश में मुफ्त की रेवड़ी बांटकर वोट बटोरने का कल्चर लाने की कोशिश हो रही है। ये कल्चर देश के विकास के लिए बहुत घातक है। रेवड़ी कल्चर वालों को लगता है कि जनता जनार्दन को मुफ्त की रेवड़ी बांटकर, उन्हें खरीद लेंगे। हमें मिलकर उनकी इस सोच को हराना है। 

इस पर आम आदमी पार्टी का कहना है कि दिल्ली सरकार द्वारा आम जनता के लिए चलाई जाने वाली तमाम वेलफेयर स्कीम्स को रेवड़ी बताकर केंद्र सरकार आम जनता का मजाक बना रही है।

बाद में फ्रीबीज का यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गया। चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा फ्रीबीज यानी मुफ्त में देने का वादा करने के मामले को सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त महीने में तीन जजों की बेंच के पास भेज दिया।

कोर्ट से ऐसी फ्रीबीज पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई। याचिका में उन राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने की मांग की गई जो चुनाव के दौरान और बाद में मुफ्त उपहार देते हैं। सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर चर्चा के लिए एक विशेषज्ञ समिति और एक सर्वदलीय बैठक बुलाने को कहा।

बहरहाल, इसी फ्रीबीज मामले को लेकर चुनाव आयोग ने प्रस्ताव दिया है कि प्रत्येक राज्य के मुख्य सचिव और केंद्रीय वित्त सचिव - जब भी या कहीं भी चुनाव हों - एक निर्दिष्ट प्रारूप में कर और व्यय का विवरण दें।

अंग्रेजी अख़बार की रिपोर्ट में एक सूत्र के हवाले से कहा गया है, 'इसके पीछे दिमाग यह लगाया गया है कि वादे की भौतिक और वित्तीय मात्रा का निर्धारण हो... अगर यह कृषि ऋण माफी है तो क्या यह सभी किसानों, या केवल छोटे और सीमांत किसानों आदि के लिए उपलब्ध होगा। इसके अलावा, इसे कैसे वित्त पोषित किया जाएगा।' समझा जाता है कि चुनाव आयोग चुनाव से पहले आदर्श आचार संहिता में आवश्यक बदलाव करने से पहले परामर्श के लिए पार्टियों को बुला सकता है।

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