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कोरोना डॉक्टर का दिल्ली में सामाजिक बहिष्कार, पुलिस में शिकायत

कोरोना डॉक्टर का दिल्ली में सामाजिक बहिष्कार, पुलिस में शिकायत

कोरोना वायरस के ख़ौफ़ ने अजीब संवेदनहीनता पैदा कर दी है। जो डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी कोरोना से लोगों की जानें बचाने में जुटे हैं क्या उन्हें ही सिर्फ़ इसलिए प्रताड़ित किया जा सकता है कि वे कोरोना मरीज़ों का इलाज क्यों कर रहे हैं? 

कोरोना वायरस के ख़ौफ़ ने अजीब संवेदनहीनता पैदा कर दी है। जो डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी कोरोना से लोगों की जानें बचाने में जुटे हैं क्या उन्हें सिर्फ़ इसलिए प्रताड़ित किया जा सकता है कि वे कोरोना मरीज़ों का इलाज क्यों कर रहे हैं ये प्रताड़नाएँ सिर्फ़ सामाजिक भेदभाव तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि मिलते ही रास्ते बदल लेने, अपने ही घरों में घुसने नहीं देने, सामाजिक बहिष्कार करने जैसी कई तरह की प्रताड़नाएँ हैं। ऐसी ही एक प्रताड़ना से तंग आकर दिल्ली के द्वारका में एक डॉक्टर ने पुलिस में शिकायत की है। वह लोगों के बुरे बर्ताव से इतने परेशान हो गए हैं कि लॉकडाउन ख़त्म होते ही उस सोसायटी को छोड़कर कहीं और रहने की योजना बना रहे हैं।

डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के साथ ऐसा व्यवहार तब हो रहा है जब प्रधानमंत्री मोदी उनके सम्मान में कभी थाली और ताली बजवा रहे हैं तो कभी बिलजी की लाइटें बंद करवाकर मोमबत्ती जलवा रहे हैं। भारतीय सेना तो हेलिकॉप्टर से फूल बरसा रही है।

डॉक्टरों के साथ दुर्व्यवहार की ऐसी घटना सिर्फ़ दिल्ली के द्वारका में ही नहीं हुई है, बल्कि देश भर में कई जगहों से ऐसी ही रिपोर्टें आई हैं। ओडिशा में एक सरकारी अस्पताल के एक डॉक्टर ने यह रिपोर्ट दर्ज कराई कि उनके अपार्टमेंट बिल्डिंग के निवासियों ने उन पर वायरस फैलाने का आरोप लगाया। अपने बयान में डॉक्टर ने कहा कि एक निवासी ने उसे वहाँ से बाहर नहीं जाने पर बलात्कार की धमकी दी थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, सूरत के एक अस्पताल में काम करने वाली डॉ. संजीवनी पाणिग्रही ने कहा कि पड़ोसियों ने उन्हें अपनी बिल्डिंग में प्रवेश करने से रोकने की कोशिश की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें समाज से बाहर कर देने की बात कही गई। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि डॉक्टर होना एक सामाजिक कलंक हो गया है।

उत्तरी द्वारका में रहने वाले 36 वर्षीय डॉक्टर मणिशंकर माधव भी ऐसे ही सामाजिक कलंक के तौर पर देखे जाने और लोगों के बुरे बर्ताव का आरोप लगाते हैं। डॉक्टर माधव पंडित मदन मालवीय हॉस्पिटल में मुख्य चिकित्सा अधिकारी हैं। वह राजीव गाँधी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में 16 मार्च से 31 मार्च तक कोरोना वार्ड में ड्यूटी पर थे और उसके बाद उन्हें क्वॉरंटीन किया गया था। 'द हिंदू' की रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. माधव ने कहा कि तब निजी हॉस्पिटल में काम करने के दौरान उनके तीन डॉक्टर साथी कोरोना संक्रमित पाए गए थे, लेकिन उनकी रिपोर्ट निगेटिव आई थी।

पुलिस को सौंपी गई शिकायत में डॉ. माधव ने कहा है, 'वे लोग मुझसे ऐसा बर्ताव कर रहे हैं कि मैं कोरोना संक्रमित हूँ। उन्होंने लिफ़्ट का उपयोग करने पर मुझ पर आरोप लगाए और मेरे घर पर काम करने वाले को घर में ही रखने को कहा।'

वह आरोप लगाते हैं कि हाउसिंग सोसायटी के सचिव काम करने वाले को आने नहीं दे रहे हैं। वह कहते हैं कि 'चूँकि मैं और मेरी पत्नी दोनों डॉक्टर हैं और हॉस्पिटल में काम करते हैं तो घर का काम करना मुश्किल है। घर में काम करने वालों को छूट मिले होने के सरकारी आदेश दिखाने के बावजूद उसे आने नहीं दिया गया।'

डॉ. माधव आरोप लगाते हैं कि स्थानीय पुलिस से शिकायत के बाद भी एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई तो वह द्वारका डीसीपी से मिले। डीसीपी एंटो अलफ़ोंसो का कहना है कि माधव डॉक्टर की शिकायत को संबंधित अधिकारी के पास भेज दिया गया है।

देश में कई जगहों पर डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के प्रति रवैया तो कभी-कभी हिंसात्मक भी हो गया है। मध्य प्रदेश के इंदौर और उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले हुए। वे वहाँ पर स्क्रीनिंग करने गए थे कि किसी में कोई कोरोना के लक्षण तो नहीं थे। 

दरअसल, यह सब इसलिए हो रहा है कि एक तो लोगों में कोरोना वायरस का काफ़ी ज़्यादा डर बैठा हुआ है और दूसरा ग़लत सूचनाएँ या अफ़वाहें भी फैली हुई हैं।

कुछ लोग ऐसे हैं जो यह मान बैठे हैं कि क्योंकि नर्स और दूसरे स्वास्थ्य कर्मी कोरोना मरीज़ों के संपर्क में होते हैं इसलिए वे इस वायरस को फैला रहे हैं।

ऐसा डर डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के प्रति ही नहीं, बल्कि शहरों से लौटे अपने परिवार के लोगों के प्रति भी है। पिछले महीने मुंबई से 1600 किलोमीटर चलकर वाराणसी में अपने घर पहुँचे एक युवक को उसकी माँ और भाई ने घर में घुसने नहीं दिया। वह भी तब जब युवक ने हॉस्पिटल में जाकर स्क्रीनिंग कराई थी और कोरोना पॉजिटिव होने का कोई भी लक्षण नहीं दिखा था। ऐसा ही एक मामला मध्य प्रदेश में भी आया था। क़रीब पचास किलोमीटर का सफर पैदल तय कर पति के साथ इंदौर से अपने मायके उज्जैन पहुँची निलोफर नाम की महिला को उसकी माँ ने यह कहते हुए घर में नहीं घुसने दिया था कि, ‘तुम्हें घर में एंट्री दी तो हम भी मुसीबत में आ जायेंगे।’ 

अभी तीन मई को मध्य प्रदेश के गुना ज़िले में पड़ोसी ज़िले राजगढ़ से परिवार समेत लौटे मज़दूर को कोरोना के भय से गाँव में घुसने नहीं दिया गया। चिलचिलाती धूप में गाँव के बाहर बने स्कूल के शौचालय में पूरा परिवार रहा, शौचालय में ही इन्होंने भोजन पकाया और खाया

कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई में जुटे स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले भारत में ही नहीं हुए हैं, बल्कि मेक्सिको, पाकिस्तान और फिलिपींस जैसे देशों में भी हुए हैं। मेक्सिकों में नर्सों पर ऐसे 21 बार हमले हुए। एक नर्स को सार्वजनिक वाहन में जाने से मना कर दिया गया। सड़क से जा रही एक नर्स पर क्लोरिक फेंक दिया गया। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, कई नर्स अपना यूनिफॉर्म पहनने से डरने लगी हैं।

पाकिस्तान के कराची शहर में एक नर्स ग़ज़ाला भाट्टी ने कहा कि उनके मकान मालिक ने इस डर से अपार्टमेंट खाली करने को कह दिया है कि कहीं कोरोना मरीज़ों का इलाज करने के बाद वह बिल्डिंग में दूसरों में वायरस न फैला दें।

फिलीपींस के दक्षिणी प्रांत सुल्तान कुदरत में एक नर्स पर पाँच लोगों ने यह मानकर कर हमला कर दिया था कि वह अपने काम के कारण वायरस से संक्रमित था। उन्होंने उसके चेहरे पर ब्लीच डाला, जिससे उसकी आँखों को स्थायी नुक़सान की आशंका है।

ऐसे में क्या हेलिकॉप्टर से फूल बरसाने जैसे सांकेतिक व्यवहार ही सम्मान देने के लिए काफ़ी है

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