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‘राजा तो नंगा है' कहने पर क्या सज़ा होगी मिलॉर्ड?

‘राजा तो नंगा है' कहने पर क्या सज़ा होगी मिलॉर्ड?

उमर खालिद की ज़मानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के जज जुमला, चंगा, इंक़लाब शब्दों पर क्यों उखड़े? क्या ये शब्द किसी भी रूप में आपत्तिजनक हैं?

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में यह सुझाव दिया कि अदालतों की कार्रवाई स्थानीय भाषाओं में होनी चाहिए क्योंकि आम लोग अदालती भाषा और फ़ैसलों को समझ नहीं पाते। प्रधानमंत्री ने सही कहा लेकिन इसके लिए जज भी ऐसे नियुक्त करने पड़ेंगे जो स्थानीय भाषाओं और उसके मुहावरों और कहावतों को समझते हों वरना वे स्थानीय कहावतों और मुहावरों का इस्तेमाल करने पर ही लोगों को कारावास की सज़ा दे देंगे।

हाल में ऐसा ही एक वाक़या प्रकाश में आया जब दिल्ली उच्च न्यायालय में विद्वान जज 'जुमला' जैसे शब्द से उखड़ गए और कहने लगे कि यह शब्द तो प्रधानमंत्री की शान में गुस्ताख़ी है। इसके साथ ही उनको 'चंगा' और 'इनक़लाब' जैसे शब्दों के अर्थ समझने में भी दिक़्क़त हुई। हैरत की बात यह है कि इनमें से कोई भी जज दक्षिण भारत के नहीं हैं कि उनको हिंदी नहीं आती हो।

मामला उमर ख़ालिद के एक भाषण से जुड़ा था जो उन्होंने दिल्ली दंगों से कुछ पहले अमरावती, महाराष्ट्र में दिया था। हमारे पास पूरी स्पीच नहीं है इसलिए कह नहीं सकते कि जो शब्द इस्तेमाल किया गया था, वह 'जुमला' था या 'जुमलेबाज़'। वैसे शब्द चाहे जो भी इस्तेमाल किया गया हो, शब्दकोशों के मुताबिक़ यह किसी भी अर्थ में अपशब्द नहीं है। चलिए, देखते हैं, शब्दकोशों में जुमला का क्या अर्थ दिया हुआ है।

जुमला अरबी का शब्द है और इसके दो अर्थ हैं। विशेषण के तौर पर इसका अर्थ है - पूरा, संपूर्ण। संज्ञा के तौर पर इसका अर्थ है - वाक्य यानी शब्दों का वह समूह जिसका अपना सार्थक अर्थ हो। हिंदी में या आम भाषा में इसका इस्तेमाल शब्द-समूह या वाक्य के अर्थ में ही किया जाता है।

आपने देखा, जुमला का मतलब क्या है - 'शब्दों का सार्थक समूह' जो कि निहायत ही मासूम शब्द है। हाँ, अगर उसके साथ 'बाज़' शब्द लगा दिया जाए तो उसका अर्थ हो जाता है - वह व्यक्ति जो जुमलों का इस्तेमाल करता है। इसमें भी किसी को आपत्ति नहीं हो सकती क्योंकि जुमलों या वाक्यों का इस्तेमाल तो हर कोई करता है।

लेकिन राजनीतिक शब्दावली में 'जुमलेबाज़' का अर्थ थोड़ा बदल जाता है। इसका अर्थ होता है - वह व्यक्ति जो बड़ी-बड़ी बातें करे कि यह कर दूँगा, वह कर दूँगा आदि।

जैसे इंदिरा गाँधी का 'ग़रीबी हटाओ' एक जुमला था जिसके आधार पर उन्होंने चुनाव जीता लेकिन ग़रीबी हटी नहीं। ऐसे में कोई भी आलोचक इंदिरा गाँधी को जुमलेबाज़ कह सकता था।

राजनीति जुमलों का ही खेल है और इसमें वोट पाने के लिए बड़े पैमाने पर जुमलेबाज़ी की जाती है, उन्हीं के आधार पर चुनाव जीते जाते हैं। जैसे 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी, हर साल 2 करोड़ रोज़गार, हर बेघर के लिए छत, हर खाते में 15 लाख रुपए आदि। ये सब वायदे हैं जो चुनावों में किए जाते हैं और अधिकतर पूरे नहीं होते। ऐसे में कोई भी प्रतिपक्षी नेता मसलन राहुल गाँधी सत्तारूढ़ नेता मसलन नरेंद्र मोदी पर यह आरोप लगा सकता है कि उसने अपने वादे पूरे नहीं किए या झूठे वादे किए। मुझे नहीं लगता, ऐसा कहने पर किसी भी प्रतिपक्षी नेता पर कोई आपराधिक मामला बनता है या कोई अदालत उसे इस आधार पर जेल की सज़ा सुनाएगी।

 - Satya Hindi

लेकिन इसी बात को उमर ख़ालिद ने एक अलग भाषा में कह दिया कि फ़लाँ शख़्स जुमलेबाज़ है तो जज साहब की नज़र में वह एक ऐसी गुस्ताख़ी हो गई जिसकी कोई माफ़ी ही नहीं है।

रोचक बात यह है कि आज की राजनीतिक चर्चा में जुमलेबाज़/जुमलेबाज़ी शब्द का प्रवेश मोदी जी के परम प्रिय गृह मंत्री अमित शाह ने ही करवाया था जब उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था कि ‘विदेश से काला धन भारत में आने पर हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए आने की बात' एक जुमला थी। जब अमित शाह ख़ुद ही ‘15 लाख वाली बात’ को जुमला कह रहे हैं तो जिसने यह जुमला कहा यानी मोदी ने, उसे कोई जुमलेबाज़ कहे तो आपत्ति क्यों?

अब 'चंगा' पर आते हैं। दिल्ली में रहकर कोई 'चंगा' शब्द का अर्थ न जानता हो तो हैरत होना स्वाभाविक है। लेकिन उस पर भी जज साहेब ने सवाल पूछा कि यह 'चंगा' शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया। ख़ालिद के वकील को समझाना पड़ा कि चंगा का मतलब अच्छा होता है और इस शब्द का इस्तेमाल व्यंग्य के तौर पर किया गया है। इस पर एक जज साहब ने कहा कि 'आलोचना की भी सीमा’ होती है।

सुनवाई के दौरान 'ऊँट' पर भी सवाल उठा। दरअसल ख़ालिद ने किसी संदर्भ में कहा था कि अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे। पूछा गया कि ऊँट किसे कहा गया है।

निश्चित रूप से सरकार को, ख़ालिद के वक़ील ने कहा। वैसे प्रश्न तो यह है कि अगर ख़ुद मोदी के लिए भी इस कहावत का प्रयोग किया गया हो तो इस पर सवाल क्यों उठना चाहिए? 

जब भी कोई सत्ता जो ख़ुद को बहुत ताक़तवर समझती हो, उसका मुक़ाबला किसी ऐसी ताक़त से हो जो उससे ज़्यादा बलशाली हो तो इस कहावत का इस्तेमाल किया जाता है। हैरत कि माननीय जज इन मुहावरों और कहावतों का अर्थ भी नहीं जानते।

इस तरह 'इनक़लाब' शब्द पर भी प्रश्न किए गए। हर कोई जानता है कि इनक़लाब का अर्थ होता है उलटफेर या बड़ा परिवर्तन। जब भी किसी को सत्ता में हटाने या व्यवस्था में परिवर्तन की बात होती है तो नारा दिया जाता है - ‘इनक़लाब ज़िंदाबाद’! अभी पंजाब में जो नई सरकार बनी, उसके मुख्यमंत्री तो बात-बात पर 'इनक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा देते हैं। तो क्या उनको भी जेल में डाल दिया जायेगा कि क्यों इनक़लाब की बात करते हो?

इसीलिए कह रहा हूँ कि अदालतों में स्थानीय भाषा में कार्रवाई शुरू करने से पहले जजों को स्थानीय भाषाएँ सिखानी पड़ेंगी वरना होगा यही कि किसी ने कह दिया कि 'राजा तो नंगा है' तो माननीय जज साहब उसे 'देश के सबसे ताक़तवर शख़्स की शान में ग़ुस्ताखी' करने के जुर्म में सलाख़ों के पीछे करवा देंगे।

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