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पेगासस के ज़रिए कौन करवा रहा था दलाई लामा के सहयोगियों की जासूसी? 

पेगासस के ज़रिए कौन करवा रहा था दलाई लामा के सहयोगियों की जासूसी? 

तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के निकटतम सहयोगी और उनके दूसरे कर्मचारी भी पेगासस के निशाने पर थे। 

तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के निकटतम सहयोगी और उनके दूसरे कर्मचारी भी पेगासस के निशाने पर थे। 

उन पर साल 2017 से ही नज़र रखी जा रही थी और उनकी तमाम गतिविधियों की निगरानी की जा रही थी।

पेगासस प्रोजेक्ट से इसका खुलासा हुआ है। पत्रकारिता से जुड़े फ्रांस के ग़ैरसरकारी संगठन फोरबिडेन स्टोरीज ने इज़रायली कंपनी एनएसओ के बनाए स्पाइवेअर पेगासस के डेटा बैंक को हासिल किया। इसमें 50 हज़ार से ज़्यादा लोगों के फ़ोन नंबर थे जिन्हें निशाना बनाया जा सकता था। 

फोरबिडेन स्टोरीज ने 17 मीडिया संगठनों के 80 पत्रकारों की मदद से इसका पता लगाया और उसमें कुछ की फोरेंसिक जाँच की है। 

'द वायर' के अनुसार, दलाई लामा के निकटतम सहयोगी और दूसरे कर्मचारी पेगासस के निशाने पर थे। 

दिल्ली में दलाई लामा के राजदूत टेम्पा शेरिंग पेगासस जासूसी के निशाने पर थे। वे दलाई लामा के कार्यालय से जुड़े भारत व पूर्वी एशिया के प्रमुख हैं और लंबे समय से भारत में रह रहे हैं। 

 - Satya Hindi

ओबामा से मिले थे दलाई लामा

इस दौरान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक़ ओबामा से भी दलाई लामा की मुलाक़ात हुई थी, जिस पर चीन काफी नाराज़ हुआ था। उस समय तक ओबामा राष्ट्रपति पद से हट चुके थे। लेकिन उन दोनों के बीच क्या बातचीत हुई थी, यह पता चला होगा, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। 

लोबसांग सिंग्ये

तिब्बती प्रशासन के पूर्व प्रमुख लोबसांग सिंग्ये का फ़ोन नंबर भी एनएसओ की सूची में है। 

लोबसांग सिंग्ये भारत में रह रहे तिब्बतियों की देखरेख करने वाले निकाय के प्रमुख थे और कुछ दिन पहले ही उस पद से हटे हैं। वे हिमाचल स्थित धर्मशाला या दिल्ली में रहते थे। 

'द वायर' के मुताबिक़, तिब्बती प्रशासन के आला अफ़सरों ने पेगासस प्रोजेक्ट के लोगों से कहा था कि भारत सरकार यह नहीं चाहती कि दलाई लामा चीन वापस लौटने के मुद्दे पर बीजिंग से किसी तरह का समझौता करें।

नरेंद्र मोदी 2014 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, शपथ ग्रहण समारोह में लोबसांग सिंग्ये को भी बुलाया गया था। 

इसके बाद 2016 में राष्ट्रपति भवन के एक कार्यक्रम में दलाई लामा को आमंत्रित किया गया था। उस समय प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति थे। 

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इसके बाद भारत ने 2020 में तिब्बती शरणार्थियों को लेकर स्पेशल फ्रंटियर फ़ोर्स का गठन किया था। इस बल को लद्दाख के पैगोंग त्सो इलाक़े में तैनात  किया गया था। 

इसमें तिब्बती प्रशासन की भूमिका साफ नहीं है, पर यह पहली बार हुआ कि तिब्बतियों को भारतीय सैन्य बल का हिस्सा बनाया गया। 

'द गॉर्डियन' के अनुसार, दलाई लामा के वरिष्ठ सलाहकार तेन्ज़िन तल्हा और चिमी रिग्ज़ेन के फ़ोन भी पेगासस के निशाने पर थे। 

इसके अलावा सामदोंग रिनपोचे का फ़ोन नंबर भी एनएसओ की सूची में था। रिनपोचे उस ट्रस्ट के प्रमुख हैं, जिसे दलाई लामा का उत्तराधिकारी चुनने का काम सौंपा गया है। 

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दलाई लामा के पास मोबाइल फ़ोन अमूमन नहीं रहता है। 

शी जिनपिंग से मिलना चाहते थे दलाई लामा

इस अख़बार के अनुसार, दलाई लामा ने कई बार कहा है कि वे अपने पुराने मित्रों के माध्यम से बीजिंग से संपर्क बनाए रखते हैं। 

भारत को इसकी जानकारी है और वह नहीं चाहता है कि दलाई लामा बीजिंग से किसी तरह का संपर्क रखें और ख़ास कर बगैर दिल्ली की पूर्व अनुमति के। 

'द गॉर्डियन' का कहना है कि जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पहली बार 2014 में भारत आए थे, दलाई लामा की योजना उनसे मिलने की थी। लेकिन भारत सरकार ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया था।

दलाई लामा का मध्य मार्ग

दिल्ली स्थित थिंकटैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन का मानना है कि दलाई लामा मध्य मार्ग अपनाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि बीजिंग की सार्वभौमिकता को स्वीकार कर लिया जाए और चीन सरकार तिब्बत को सही अर्थों में स्वायत्तता दे। 

भारत सरकार बाहरी तौर पर तिब्बत पर बातचीत का समर्थन करती है, पर इसकी सुरक्षा एजंसियाँ नहीं चाहतीं कि दलाई लामा चीन से किसी तरह का समझौता करें। 

कोलंबिया विश्वविद्यालय के तिब्बती अध्ययन केंद्र के प्रमुख रॉबर्ट बर्नेट ने 'द गॉर्डियन' से कहा, "मेरा अनुमान है कि भारत सरकार धर्मशाला जाने वाले पश्चिम के लोगों पर नज़र रखती है, यह मुमकिन है कि दलाई लामा किसी देश में शरण माँग लें। भारत को इस पर ख़ास चिंता हो सकती है।" 

पेगासस जासूसी मामले के सामने आने से बुरी तरह फंस गई है केंद्र सरकार। इस पर क्या कहना है वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का? देखें यह वीडियो।

क्या है पेगासस प्रोजेक्ट?

फ्रांस की ग़ैरसरकारी संस्था 'फ़ोरबिडेन स्टोरीज़' और 'एमनेस्टी इंटरनेशनल' ने लीक हुए दस्तावेज़ का पता लगाया और 'द वायर' और 15 दूसरी समाचार संस्थाओं के साथ साझा किया।

इसका नाम रखा गया पेगासस प्रोजेक्ट। 'द गार्जियन', 'वाशिंगटन पोस्ट', 'ला मोंद' ने 10 देशों के 1,571 टेलीफ़ोन नंबरों के मालिकों का पता लगाया और उनकी छानबीन की। उसमें से कुछ की फ़ोरेंसिक जाँच करने से यह निष्कर्ष निकला कि उनके साथ पेगासस स्पाइवेअर का इस्तेमाल किया गया था।

प्रोटोकॉल का हवाला

सरकार ने पेगासस प्रोजेक्ट पर कहा है, "सरकारी एजंसियाँ किसी को इंटरसेप्ट करने के लिए तयशुदा प्रोटोकॉल का पालन करती हैं। इसके तहत पहले ही संबंधित अधिकारी से अनुमति लेनी होती है, पूरी प्रक्रिया की निगरानी रखी जाती है और यह सिर्फ राष्ट्र हित में किया जाता है।"

सरकार ने ज़ोर देकर कहा कि इसने किसी तरह का अनधिकृत इंटरसेप्शन नहीं किया है।

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि पेगासस स्पाइवेअर हैकिंग करता है और सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून 2000 के अनुसार, हैकिंग अनधिकृत इंटरसेप्शन की श्रेणी में ही आएगा। 

सरकार ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि ये बातें बेबुनियाद हैं और निष्कर्ष पहले से ही निकाल लिए गए हैं। 

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