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नए आपराधिक कानून 1 जुलाई से लागू होंगे, क्या है सबसे खतरनाक

नए आपराधिक कानून 1 जुलाई से लागू होंगे, क्या है सबसे खतरनाक

तीन नए आपराधिक कानून, जो हाल ही में संसद में पारित हुए और अब राष्ट्रपति की सहमति के बाद 1 जुलाई से लागू होंगे। सरकार का कहना है कि नए कानून ब्रिटिश-युग के आईपीसी की जगह लेंगे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है कि इनमें खतरनाक क्या क्या हैः

सरकार ने शनिवार को कहा कि ब्रिटिश काल के भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की जगह लेने वाले तीन नए आपराधिक कानून 1 जुलाई से लागू होंगे। ये तीन नए आपराधिक कानून हैं-  भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम। इनके लागू होने पर देश की आपराधिक न्याय प्रणाली पूरी तरह बदल जाएगी।

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी तीन अधिसूचनाओं के अनुसार, नए कानूनों के प्रावधान 1 जुलाई से लागू होंगे। संसद में इन तीनों को 21 दिसंबर को पास किया गया था। नए कानून में बस धारा 106 (2) को लागू नहीं किया जाएगा।

पिछले साल 25 दिसंबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मंजूरी मिलने के बाद इन्हें कानून बना दिया गया। वे भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 और आईपीसी की जगह लेंगे। हालाँकि, सरकार ने वाहन चालक द्वारा हिट-एंड-रन के मामलों से संबंधित प्रावधान धारा 106 (2) को लागू नहीं करने का निर्णय लिया है, जैसा कि उन ट्रक ड्राइवरों से किया गया वादा था, जिन्होंने इसका विरोध किया था।

कानून लागू होने के बाद, ट्रक ड्राइवरों ने धारा 106 (2) के प्रावधान का विरोध किया, जिसमें उन लोगों को 10 साल की कैद और जुर्माने का प्रावधान है, जो लापरवाही से वाहन चलाकर किसी व्यक्ति की मौत का कारण बनते हैं, जो गैर इरादतन हत्या की श्रेणी में आता है, और पुलिस अधिकारी को इसकी सूचना दिए बिना भाग जाता था।

केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने उस समय कहा था कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 (2) को लागू करने का निर्णय अखिल भारतीय मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के परामर्श के बाद ही लिया जाएगा।

नए कानून में आतंकवाद शब्द को पहली बार भारतीय न्याय संहिता में परिभाषित किया गया है। राजद्रोह को अपराध के रूप में खत्म कर दिया है और "राज्य के खिलाफ अपराध" नामक एक नया खंड पेश किया है। भारतीय न्याय संहिता में अलगाववादी कृत्यों, सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसक गतिविधियों, अलगाववादी गतिविधियों या संप्रभुता या एकता को खतरे में डालने जैसे अपराधों को राजद्रोह कानून में शामिल किया गया है।


इसमें सबसे खतरनाक क्या है

नए कानूनों के अनुसार, कोई भी जानबूझकर, बोले गए या लिखे हुए शब्दों से, या संकेतों से, या दृश्य प्रतिनिधित्व (वीडियो आदि) द्वारा, या इलेक्ट्रॉनिक संचार द्वारा या वित्तीय साधनों के उपयोग से, या अन्यथा, अलगाव या सशस्त्र विद्रोह को भड़काता है या भड़काने का प्रयास करता है। विध्वंसक गतिविधियाँ, या अलगाववादी गतिविधियों की भावनाओं को प्रोत्साहित करता है या भारत की संप्रभुता या एकता और अखंडता को खतरे में डालने या ऐसे किसी भी कार्य में शामिल होतो है तो उसे उम्रकैद या जेल भेजकर दंडित किया जाएगा। उसकी सजा को सात साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है। .

नए कानूनों के तहत, 'राजद्रोह' को ब्रिटिश हुकूमत के संदर्भ को हटाकर एक नया शब्द 'देशद्रोही' मिला है। साथ ही, जुर्माना लगाने की मजिस्ट्रेट की शक्ति और घोषित अपराधी घोषित करने का दायरा भी बढ़ा दिया गया है। राज्यसभा में आपराधिक बिल पेश करते हुए, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि इन कानूनों के एक बार लागू होने के बाद, 'तारीख-पे-तारीख' युग का अंत हो जाएगा और तीन साल में ऐसे मामलों में इंसाफ मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

इन कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है। वकील विशाल तिवारी द्वारा दायर याचिका में तीन आपराधिक कानूनों की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन की मांग की गई है। याचिका में दावा किया गया है कि कानून कई खामियों और विसंगतियों से ग्रस्त हैं। इन्हीं तीन विधेयकों को पहले वापस ले लिया गया था और कुछ बदलावों के साथ दोबारा मसौदा तैयार किया गया, जो संसद में पारित हो कर दिया गया। याचिका में कहा गया है कि तीनों बिल बिना किसी संसदीय बहस के पारित और अधिनियमित किए गए क्योंकि इस अवधि के दौरान अधिकांश सांसद निलंबित थे। जनहित याचिका में तीन आपराधिक कानूनों की जांच करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में तुरंत एक विशेषज्ञ समिति गठित करने और इसके सदस्यों में जज, वरिष्ठ वकील और कानूनदां शामिल करने के निर्देश देने की मांग की गई है।

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