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क्या भाजपा योगी आदित्यनाथ का विकल्प तलाश रही है?

क्या भाजपा योगी आदित्यनाथ का विकल्प तलाश रही है?

गोरखपुर में हाल ही में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं हैं, जिससे पत्रकार स्वदेश कुमार सिन्हा को लग रहा है कि भाजपा योगी आदित्यनाथ का विकल्प तलाश रही है। बेशक उनके तर्कों से कोई सहमत न हो, लेकिन यह तो तय है कि योगी आदित्यनाथ का बढ़ता कद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में कुछ लोगों को जरूर खटक रहा है।

पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर में कुछ ऐसी घटनाएँ हुईं, जिसका देश की राजनीति पर भी दूरगामी असर पड़ सकता है। गोरखपुर कहें, या समूचे पूर्वांचल ; यहाँ राजनीति के दो ध्रुव हमेशा से मौज़ूद रहे हैं, जिसे लोकप्रिय भाषा में मंदिर या हाते की राजनीति कहते हैं। मंदिर का अर्थ है- गोरखनाथ मंदिर और हाते का मतलब है- बाहुबली हरिशंकर तिवारी का निवास स्थान। अगर मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने गुजरात को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनाया, तो इससे बहुत पहले गोरखपुर या कहें, समूचे पूर्वांचल को योगी आदित्यनाथ और उनसे पहले दिग्विजयनाथ, अवैद्यनाथ हिन्दुत्व की उग्र प्रयोगशाला बना चुके थे। 

इस तथ्य से बहुत कम लोग परिचित होंगे, कि 1990 में गोरखपुर विश्वविद्यालय में हो रहे अखिल भारतीय इतिहास कांग्रेस के 32 वें सम्मेलन के एक सत्र पर तत्कालीन महंत अवैद्यनाथ तथा उनके साथ आए ढेरों कार्यकर्ताओं ने कब्जा कर लिया था तथा उन्होंने इरफ़ान हबीब और आर एस शर्मा जैसे बड़े इतिहासकारों को करीब-करीब बंधक बना लिया था और हॉल का गेट बंद करके राम मंदिर की अपनी अवधारणा को प्रस्तुत किया, उस समय वे गोरखपुर से भाजपा के सांसद थे तथा राम जन्मभूमि मुक्ति समिति के अध्यक्ष भी थे। वे इतिहास कांग्रेस सम्मेलन में न तो निमंत्रित थे और न ही डेलीगेट थे, बाद में इस मामले को रफ़ा-दफ़ाकर दिया गया था, क्योंकि तत्कालीन वाइसचांसलर प्रतिमा अस्थाना ख़ुद ही संघी मानसिकता की थीं। 

इतनी बड़ी घटना को गोरखपुर के किसी भी राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक ने प्रकाशित नहीं किया, केवल स्वतंत्र चेतना नामक एक स्थानीय दैनिक ने इसे प्रकाशित किया, जिसमें मैं कार्यरत था। बाद में इसकी एक लम्बी रिपोर्टिंग गौतम नवलखा द्वारा संपादित वैचारिक पत्रिका सांचा में प्रकाशित हुई थी। योगी आदित्यनाथ उन्हीं महंत अवैद्यनाथ के शिष्य हैं।

योगी आदित्यनाथ की भूमिका से सभी परिचित हैं। आज़ादी के बाद गोरखपुर में केवल दो हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए और दोनों ही में उनके ऊपर आरोप लगे। हालाँकि चुनाव जीतने के बाद इन्होंने अपने ऊपर चल रहे आपराधिक मुकदमे ख़ुद ही हटवा दिए। गोरखपुर की राजनीति हमेशा ब्राह्मण-ठाकुर के बीच घूमती रही है। मंडल कमीशन आने के बाद यहाँ पर चुनाव में पिछड़े वर्गों की भागीदारी ज़रूर बढ़ी। भाजपा बनियों अर्थात व्यापारियों की पार्टी शुरू से मानी जाती रही है, पर चुनाव जीतने के लिए हमेशा ब्राह्मण और क्षत्रियों को आगे किया जाता रहा। योगी आदित्यनाथ के भाजपा की राजनीति के परिदृश्य में आने के बाद यह माना जाता रहा है, कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों में व्यापक असंतोष है, यही कारण है कि एक ब्राह्मण नेता शिवप्रताप शुक्ल को ; जो कभी भी गोरखपुर विश्वविद्यालय में छात्रसंघ का चुनाव तक नहीं जीत सके थे, उन्हें न केवल राज्यसभा में भेजा गया, बल्कि उन्हें केन्द्रीय मंत्री भी बनाया गया तथा आजकल उन्हें अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया है।

2002 में योगी आदित्यनाथ ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीटों पर अपनी पसंद के उम्मीदवारों को टिकट न मिलने पर हिन्दू महासभा के टिकट पर डॉ राधामोहन दास अग्रवाल को भाजपा उम्मीदवार शिवप्रताप शुक्ल के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया और उसमें राधामोहन दास ने भारी विजय प्राप्त की। उस समय हिन्दू महासभा का अर्थ- गोरखपुर मंदिर ही समझा जाता था। गोरखपुर और आस-पास के जिलों में हिन्दू महासभा के प्रत्याशी खड़े होते थे, वे भले ही चुनाव न जीतते हों, लेकिन वे बहुत से भापजा के प्रत्याशियों की हार का कारण बन जाते थे। राधामोहन दास अग्रवाल की गोरखपुर सदर की सीट से विजय के बाद भाजपा ने योगी आदित्यनाथ के सामने एक तरह से आत्मसमर्पण कर दिया। राधामोहन दास जब वाराणसी में मेडिकल के छात्र थे तब वे समाजवादी युवजन सभा से जुड़े थे। वहीं से उनका जुड़ाव स्वदेशी जागरण मंच से हुआ, जो संघ की ही एक शाखा थी, यद्यपि वे संघ से कभी जुड़े नहीं थे। उनकी छवि योगी आदित्यनाथ के मुक़ाबले उदारवादी थी और उनकी एक छवि सर्वसुलभ नेता की भी थी, जिसके कारण वे 2007, 2012 और 2017 में लगातार चुनाव जीतते रहे।

भाजपा ने जब मनोज सिन्हा के मुक़ाबले योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया, तो सभी राजनीतिक प्रेक्षक चौंक गए थे। वास्तव में मोदी और अमित शाह योगी आदित्यनाथ की उग्र हिन्दुत्व की छवि को पार्टी के रूप में भुनाना चाहते थे। शाहीन बाग आंदोलन के बाद उत्तर प्रदेश में दंगे हुए, मुस्लिम युवकों को जेलों डाला गया। ढेरों पत्रकारों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों में बंद कर दिया गया। उस समय मुख्यमंत्री जैसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति जिस तरह से खुलेआम ठोंक देने जैसे असंवैधानिक शब्द का प्रयोग कर रहा था, उससे सब चौंक गये थे। इन सबसे मोदी की तुलना में एक नये योगी मॉडल की चर्चा होने लगी। नूंह और गुड़गांव में अभी दुर्भाग्यपूर्ण दंगों की आग शान्त भी नहीं हुई थी, कि अनेक चैनलों ने दंगों को शान्त करने के लिए योगी मॉडल को बड़े ज़ोर-शोर से प्रचारित करना शुरू कर दिया। यह बात प्रचारित की जाने लगी कि ट्विटर पर मेवात माँगे बुलडोजर ट्रेंड कर रहा है। एक चैनल ने तो अपना शीर्षक ही लगा लिया- ‘मेवात-नूंह में भी चलेगा योगी का बुलडोजर माडल’। कहने की जरूरत नहीं कि प्रशासनिक कार्रवाइयों में दोषियों की गिरफ़्तारी के साथ-साथ बुलडोजर का प्रयोग शुरू हो गया।

आमतौर पर ऐसे निर्माण को ढहाने का काम मुख्यतः राजनीतिक निर्णयों से होता है, लेकिन कानूनन यह अवैधानिक निर्माण कार्यों को ख़त्म करने के नाम पर किया जाता है। यह एक ऐसा माडल बन गया है, जिसका प्रयोग अब धड़ल्ले से हो रहा है। ऐसा नहीं है कि इस तरह का काम और प्रयोग पहले नहीं हुआ है, खूब हुआ है और होता ही आ रहा था, लेकिन इसका प्रयोग करते हुए माडल की दावेदारी अभी हाल की घटना है, खासकर भाजपा शासित राज्यों में यह खूब देखा गया। मामा का बुलडोजर भी खूब चला है, लेकिन योगी का बुलडोजर भाजपा शासित राज्यों में 'सबसे लोकप्रियता' की श्रेणी में आ गया है। चैनलों और मीडिया के‌ द्वारा ‘बाबा का बुलडोजर’ का जिस तरह से प्रचार किया गया, वह योगी माडल के साथ-साथ योगी आदित्यनाथ को एक उभरते नेता एवं शासक की तरह स्थापित करने की ओर ले गया है। 

"भारत को योगी आदित्यनाथ को फ्रांस भेजना चाहिए। वहाँ दंगा नियंत्रण में नहीं आ रहा है, कसम से वे इसे 24 घंटे में नियंत्रित कर देंगे।" यह झूठा पोस्ट डालने वाला नरेंद्र विक्रमादित्य यादव निकला, लेकिन पोस्ट प्रो० एन० जान कैम नाम के एकाउंट से डाला गया था। इस झूठे पोस्ट की ज़्यादा खोज़बीन किए बिना उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री ऑफिस ने जबाबी पोस्ट ट्वीट किया था- ‘जब भी कानून और व्यवस्था के हालात दुनिया के किसी भी हिस्से में उठेंगे, विश्व कानून और व्यवस्था को बदल देने वाले ‘योगी माडल’ की चाह होगी।’

 वास्तव में योगी आदित्यनाथ के प्रशंसक उन्हें मोदी के बाद प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं। 2022 में गोरखपुर सदर की सीट से योगी आदित्यनाथ ने चुनाव लड़ा, जिससे राधामोहन दास अग्रवाल की उम्मीदवारी पर ग्रहण लग गया। ऐसा कहा जाने लगा कि उनका पॉलिटिकल कैरियर समाप्त हो गया है, पर अभी तीन महीना बीता भी नहीं था कि उनके किस्मत का दरवाज़ा खुल गया, पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में भेज दिया। उन्हें केरल और लक्ष्यद्वीप का पार्टी प्रभारी बनाया गया और अभी हाल में महासचिव बना दिया गया। क्या ऐसा 2024 के चुनाव तक योगी आदित्यनाथ के बढ़ते कद को कम करने के लिए किया गया है?

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक बार राधामोहन ने बताया था, कि- उनके पास आज कोई कार नहीं है, एक मारुति 800 गाड़ी थी, जिसका एक्सीडेंट होने के बाद उन्होंने उसे बेच दिया। दिल्ली में भी वे एयरपोर्ट पर उतरकर संसद भवन मैट्रो से जाते हैं। मैट्रो से अपने आवास तक जाने के लिए पार्लियामेंट की फेरी सेवा की सहायता लेते हैं।

 कभी योगी आदित्यनाथ के सबसे करीबी रहे डॉक्टर साहब के रिश्ते बाद के दौर में ख़राब होते गए। प्रदेश सरकार के ख़िलाफ़ आलोचना के चलते यह मान लिया गयाकि ये मुख्यमंत्री के विरोधी हो गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि राधामोहन ने एक बार कानून व्यवस्था को लेकर अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ ट्वीट कर दिया था, जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया, जिसके चलते पार्टी ने उन्हें 'कारण बताओ' नोटिस भी ज़ारी कर दिया था। इसी तरह एक बार एक इंजीनियर पर कार्रवाई न होने पर वे अपनी ही सरकार से भिड़ गए थे, यद्यपि योगी आदित्यनाथ के समर्थक मानते हैं कि राधामोहन दास का कद इतना बड़ा नहीं है कि वे मुख्यमंत्री को चुनौती दे सकें। 

 राधामोहन दास अग्रवाल पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाजपा का एक उदारवादी चेहरा हैं। गोरखपुर में राधामोहन दास को आगे बढ़ाने का यह कदापि अर्थ नहीं है कि भाजपा आदित्यनाथ से अपना पिंड छुड़ाना चाहती है। सम्भव है कि 2024 के चुनावी रण में भाजपा बैलेंस बनाने के लिए राधामोहन दास जैसे कुछ अन्य चेहरों को सामने लाए, परन्तु ये बातें अभी भविष्य के गर्भ में ही छिपी हैं।

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