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पश्चिमी यूपी में BJP से 'अपनों' की नाराज़गी से पूरे प्रदेश में संदेश जाएगा?

पश्चिमी यूपी में BJP से 'अपनों' की नाराज़गी से पूरे प्रदेश में संदेश जाएगा?

पश्चिमी यूपी में आख़िर बीजेपी के कोर वोटर या समर्थक ही क्यों नाराज़ हैं? क्या इनकी नाराजगी से भाजपा के लिए मुश्किल स्थिति हो गई है? क्या पूरे प्रदेश में इसका ग़लत संदेश जाएगा?

आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को 400 सीट जीतने का लक्ष्य दिया हुआ है। 2019 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी हिन्दी बेल्ट में भारी समर्थन के बल पर सत्ता में वापसी करने में सफल रही थी तब उत्तराखंड, हिमाचल, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात की शतप्रतिशत व बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और महाराष्ट्र की 90 प्रतिशत सीटों पर जीत मिली थी। इसके अलावा उत्तर प्रदेश की 64 सीटों पर जीत अहम थी।

वर्तमान परिदृश्य में भाजपा के लिए किसी भी राज्य में पूर्व के प्रदर्शन को दोहराना आसान नहीं दिखाई देता है। हिन्दी बेल्ट के सभी प्रदेशों में भाजपा 2024 के चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन करने की स्थिति में दिखाई देती है, मगर शत-प्रतिशत या पिछला प्रदर्शन दोहराना सम्भव नहीं लगता। इन प्रदेशों में यदि इंडिया गठबंधन 20-25 प्रतिशत सीटें भी जीतने में कामयाब हुआ तो भाजपा स्पष्ट बहुमत के आँकड़े से दूर हो जाएगी क्योंकि कोई नया प्रदेश ऐसा नहीं दिखाई देता, जहाँ से हिन्दी बेल्ट की कमी की भरपाई की जा सके। इन स्थितियों में एक बार फिर सरकार बनाने की सम्भावनाओं को जिन्दा रखना है तो उत्तर प्रदेश में बीजेपी को न केवल अपना पिछला प्रदर्शन दोहराना होगा, बल्कि कुछ सीटे बढ़ाना आवश्यक है। 

2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद उत्तर प्रदेश और विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा बेहद मजबूत स्थिति में रही है, लेकिन किसान आन्दोलन ने उसके वोट आधार को कुछ कम किया व उसके बाद महिला खिलाड़ियों के बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आरोपों पर सरकार के रवैए और फिर महिला खिलाड़ियों के खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के विरुद्ध बड़ा असंतोष पैदा हुआ। इसे जयंत चौधरी की अगुआई वाले राष्ट्रीय लोकदल से गठबंधन कर संतुलित करने की कोशिश की गई। लेकिन इसी बीच जाटों पर अधिक फोकस ने भाजपा के परम्परागत समर्थक रहे राजपूत व त्यागी समाज को नाराज कर दिया है। मेरठ, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में राजपूत समुदाय की विशाल पंचायतों में लोटे में नमक डालकर भाजपा को हराने का प्रण लिया गया है और ‘रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर बचन न जाई’ के उद्घोष  को दोहराते हुए प्रभू श्रीराम की सौगन्ध ली गई है। 

राजपूत समाज कई अन्य बातों जैसे- गुजरात भाजपा के नेता परषोत्तम रूपाला की कथित राजपूत विरोधी टिप्पणी या जनरल वीके सिंह के टिकट काटे जाने से नाराज बताया ही जा रहा है। 

इसके साथ ही भाजपा नेतृत्व द्वारा जिस तरह गुजरात, उत्तराखंड और हरियाणा में मुख्य मंत्रियों को बदला गया व राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में स्थापित नेताओं को जबरन रिटायर कर नये अनजान से चेहरों को मुख्यमंत्री बनाया गया व उसके बाद पैदा आम धारणा कि अब यदि स्पष्ट बहुमत से केन्द्र में सरकार बन गई तो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हटाया जा सकता है, की प्रतिक्रिया भी हो सकती है। 

इसके अलावा बेरोजगार युवाओं में बेरोजगारी व अग्निवीर जैसी स्कीम से भी नाराजगी है। सेना में राजपूत रेजिमेंट होने पर गर्व व सेना की सेवा राजपूत समाज की प्राथमिकता में रही है।

एक चैनल पर कल आंदोलनकारी ठाकुर अभिषेक सोम बोल रहे थे कि हमसे सेना की नौकरी छीन ली, हम चुप रहे, हमसे प्रतिनिधित्व छीना गया, हम चुप रहे, अब हमारी अस्मिता पर सवाल उठाया जा रहा है, अब हम चुप नहीं रहेंगे। उन्होंने कहा कि हमें राष्ट्रवाद के नाम पर मूर्ख बनाया गया, अब हम इकरा या इमरान क्या, ओवैसी को भी वोट दे देंगे लेकिन भाजपा को सबक सिखाकर रहेंगे।

पश्चिम में सैनी समाज भी भाजपा का परम्परागत वोट रहा है लेकिन कम प्रतिनिधित्व से नाराज होकर सैनी समाज भी पंचायतें कर भाजपा के प्रति नाराजगी का इजहार कर चुका है। वर्तमान लोकसभा चुनाव के लिए अब तक घोषित प्रत्याशियों में जहां समाजवादी पार्टी ने सैनी शाक्य मौर्य समाज के छह प्रत्याशी दिए हैं तो भाजपा ने उसके आधे सिर्फ तीन।

इन हालातों को यदि नहीं सम्भाला जा सका तो भाजपा को प्रथम चरण की आठ सीटों पर तो दुश्वारियों का सामना करना ही पड़ेगा, साथ ही पूरे प्रदेश में भी एक संदेश जा सकता है जो बीजेपी के लिए सुखद तो नहीं ही होगा।

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