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बिहार में सिर्फ 27% युवाओं को रोज़गार, अनुच्छेद 370 पर पड़ेंगे वोट?

बिहार में सिर्फ 27% युवाओं को रोज़गार, अनुच्छेद 370 पर पड़ेंगे वोट?

बिहार में 15 से 29 साल की उम्र के लगभग 27.6 प्रतिशत लोग ही किसी तरह के रोज़गार में है।  बिहार को सोचना है कि उसका विधानसभा अनुच्छेद 370 पर काम करेगा या रोज़गार पर। 

भारतीय जनता पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव को भी राष्ट्रवाद और अपने गढ़े हुए नैरेटिव पर ले जाने की कोशिश की है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह अकारण ही नहीं पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना का मुद्दा उठाते हैं तो स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अनुच्छेद 370 के मुद्दे को बीच चुनाव प्रचार में उछालते हैं।

बेरोज़गारी का मुद्दा

बीजेपी के विपरीत राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने सरकार बनने पर 10 लाख लोगों को नौकरी देने का मुद्दा उठाया । तेजस्वी के इस ऐलान पर बीजेपी ने पहले मजाक उड़ाया, लेकीन जब मुद्दे की तासीर देखी तो बीजेपी को भी 19 लाख रोज़गार के मौके बनाने का वायदा करना पड़ा।

ये वायदे पूरे होंगे या नहीं, आज ये सवाल अहम नहीं है, अभी सवाल यह है कि चुनाव में सबसे अधिक संख्या में वोट डालने वाले बिहारी युवक बेरोज़गारी के मुद्दे को लेकर कितने गंभीर है।

इससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि जिस समय प्रधानमंत्री अनुच्छेद 370 का मुद्दा उठाते हैं, उस समय बिहार में रोज़गार की क्या स्थिति है। 

ज़मीनी सच्चाई

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने एक अध्ययन के बाद जो आँकड़े निकाले हैं, वो तो बिहार में बेरोज़गारी की भयावहता को दर्शाते हैं। अख़बार ने लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट यानी एलएफ़पीआर सर्वे के आधार पर कहा है कि बिहार में 15 से 29 साल की उम्र के लगभग 27.6 प्रतिशत लोग ही किसी तरह के रोज़गार में है। इस मामले में यह राज्य नीचे से पाँचवे स्थान पर है। छत्तीसगढ़ जैसे छोटे और कुछ साल पहले अलग हुए झारखंड में भी क्रमश: 43.6 और 36.4 प्रतिशत लोग किसी न किसी नौकरी में हैं।

पश्चिम बंगाल में यह दर 42.3 प्रतिशत, दिल्ली में 41.9 प्रतिशत और केरल में 36 प्रतिशत है। बिहार के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भी बिहार से ज़्यादा यानी 31.1 प्रतिशत लोग काम पर हैं। राष्ट्रीय औसत 38.1 प्रतिशत है। 

कम लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट का मतलब है कि कई लोगों ने ना चाहते हुए भी नौकरी क्षेत्र से बाहर हो गये हैं, यानी उन्हें नौकरी मिली ही नहीं। बेरोज़गारी दर के साथ-साथ एलएफपीआर भी नौकरियों की कमी की सही तसवीर पेश करता है। 

महिलाओं की स्थिति

सीता की जन्मभूमि बिहार में इन नौकरियों में महिलाओं की स्थिति तो और भी दयनीय है। सिर्फ 4.3 प्रतिशत बिहारी महिलाओं के पास किसी तरह का रोज़गार है। इस मामले में यह राज्य पूरे देश में सबसे निचले पायदान पर है। रोज़गार के मामले में बिहार में महिलाओं की स्थिति राष्ट्रीय औसत 24.5 प्रतिशत से बहुत ही नीचे है। पश्चिम बंगाल 22.2 प्रतिशत, असम 12.7 प्रतिशत  बिहार से ऊपर है। और तो और, हरियाणा और उत्तर प्रदेश भी क्रमश: 15.3 और 13.6 प्रतिशत के साथ बिहार से बहुत ऊपर है। 

यह सच है कि भारत में नौकरियों में महिलाओं की भागेदारी दूसरे देशों के मुकाबले बेहद कम है, यह लगातार गिर रहा है। लेकिन बिहार की स्थिति वाकई चिंताजनक है। 

बेरोज़गारी

एलएफ़पीआर सर्वे के अनुसार, बेरोज़गारी के मामले में बिहार पूरे देश में दूसरे नंबर पर है। यह केरल (35.2 फ़ीसदी) के ठीक बाद 31 फ़ीसदी पर है। बिहार से कम बेरोज़गारी दर तेलंगाना (27.4 फ़ीसदी) और तमिलनाडु में (24 फ़ीसदी है)। दूसरी ओर गुजरात में 8.4 फ़ीसदी, छत्तीसगढ़ में 9 फ़ीसदी और मध्य प्रदेश में 10 फ़ीसदी बेरोज़गारी है। भारत में 15 से 29 साल के बीच बेरोजगारी दर 17.3 फीसदी है। यानी बिहार की स्थिति बहुत ही दयनीय है। 

निश्चत वेतन पर काम करने के मामले में तो बिहार की स्थिति इससे भी गयी बीती है। पूरे बिहार में सिर्फ 10.4 प्रतिशत लोगों को तयशुदा पगार मिलती है।

निश्चित पगार नहीं

मध्य प्रदेश में 14.4 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 14.8 प्रतिशत, यूपी में 15.7 प्रतिशत, ओडिशा में 16 प्रतिशत लोगों को निश्चित वेतन मिलता है। पूरे देश में 23.8 प्रतिशत का औसत है।

नैशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में कुल बेरोज़गारी की दर 9.8% रही जबकि राष्ट्रीय औसत 5.8% है। बेरोजगार स्नातकों की सबसे ज्यादा संख्या बिहार में है। शिक्षा क्षेत्र का भी बिहार यही हाल है।

नीतीश कुमार के 15 साल के 'सुशासन' के बावजूद बिहार की 12 करोड़ की आबादी में केवल 27 इंजीनियरिंग कॉलेज, 2 एनआईटी, 5 मेडिकल कॉलेज, 11 डेंटल कॉलेज और 11 विश्वविद्यालय हैं।

सालाना 2 करोड़ में बिहार को कितना रोज़गार

जिस समय नरेंद्र मोदी राज्य विधानसभा चुनाव में अनुच्छेद 370 का मुद्दा उठाते हैं, बिहार के युवक उनसे पूछ सकते हैं कि सालाना दो करोड़ रोज़गार में बिहार की क्या हिस्सेदारी रही है।

लेकिन सवाल यह है कि जब चुनाव वास्तविक और ज़मीनी मु्द्दों पर नहीं, भावनात्मक मुद्दों पर लड़े जाएंगे तो ये सवाल गौण हो ही जाएंगे। इसी प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मंदिर-कब्रिस्तान और ईद-दीवाली के मुद्दे उठाए थे। उस चुनाव में उनकी पार्टी बहुत बड़े अंतर से चुनाव जीत गई थी। अब बिहार को सोचना है कि उसका विधानसभा अनुच्छेद 370 पर काम करेगा या रोज़गार पर। 

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