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बेगूसराय में कड़ा मुक़ाबला, क्या गिरिराज को हरा पाएँगे कन्हैया?

बेगूसराय में कड़ा मुक़ाबला, क्या गिरिराज को हरा पाएँगे कन्हैया?

सारे देश की नज़रें बेगूसराय सीट पर टिकी हुई हैं। कहा जा रहा है कि अगर कन्हैया कुमार मुसलिम मतों के विभाजन में सफल हो गए तो वह गिरिराज सिंह की जीत सुनिश्चित कर देंगे।

क़रीब साल भर पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के बेगूसराय से चुनाव लड़ने की ख़बर विभिन्न न्यूज़ चैनलों और वेब पोर्टलों पर चलने लगी। यह भी ख़बर सामने आई कि लालू यादव ने इस सीट से महागठबंधन की ओर से कन्हैया कुमार को लड़ाने की सहमति दे दी है। लेकिन बाद में आरजेडी के सांसद मनोज कुमार झा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्पष्ट किया कि इस संबंध में पार्टी या सहयोगी दलों के साथ किसी भी फ़ोरम पर औपचारिक या अनौपचारिक किसी तरह की कोई बातचीत नहीं हुई है। 

इसे लेकर कयासों का दौर चलता रहा और जब सीटों के बँटवारे की बात हुई तब यह देखा गया कि महागठबंधन की बैठकों में तेजस्वी, उपेन्द्र कुशवाहा, मुकेश सहनी, जीतन राम माँझी, शरद यादव वगैरह तो थे लेकिन वाम दलों की उपस्थिति नहीं थी। 

ख़बरें यह भी थीं कि वाम दलों के घटक सीपीआई ने अपने लिए 4 से 6 सीटें माँगीं थीं और बेगूसराय पर वह किसी तरह का कोई समझौता नहीं करना चाहती थी। उधर, सीपीआई माले भी कम से कम 3 सीटें माँग रही थी। कुछ ऐसा ही हाल सी.पी.एम. का था जो अपने लिए 3 सीट चाह रही थी। वाम दल इससे कम सीटों पर झुकने के लिए तैयार नहीं थे और उसमें भी पूर्व शर्त यह थी कि बेगूसराय पर कोई बातचीत नहीं होगी, यह सीट कन्हैया कुमार के लिए होनी चाहिए ही चाहिए। यह एक फंतासी में जीने वाली स्थिति थी और व्यावहारिक धरातल पर इन शर्तों का माना जाना लगभग असंभव था।  

हक़ीक़त यह है कि सीपीआई माले को छोड़कर किसी भी अन्य वाम दल के लिए किसी सीट पर दावा करना सिर्फ़ हठधर्मिता ही है। 

ख़ैर, यह अव्यावहारिक समझौता नहीं होना था, सो नहीं हुआ। सीपीआई अलग ही चुनाव में गयी और उसने बेगूसराय से कन्हैया कुमार को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। महागठबंधन ने अपने पुराने साथी आरजेडी के डॉ. तनवीर हसन को अपना उम्मीदवार घोषित किया। एनडीए की ओर से यहाँ गिरिराज सिंह लड़ रहे हैं। 

बाज़ी किसके हाथ लगेगी 

बेगूसराय में बाज़ी किसके हाथ लगेगी इस सवाल का जवाब जानने के लिए बेगूसराय की आबादी के बारे में ज़रूरी होगा। लगभग 19 लाख मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में भूमिहार वोटरों की आबादी सबसे अधिक है। लगभग इतनी ही या इससे थोड़ा ही कम मुसलिम मतदाता हैं। यादवों की तादाद तीसरे नंबर पर है। बाक़ी जातियों और वर्गों की तादाद इन तीनों के बाद ही है। 

मैंने यहाँ किसी की सम्भावना को टटोलने के लिए सबसे पहले इसी कारक को सामने रखा है क्योंकि पूरे बिहार या पूरे उत्तर भारत में मतदाता जाति के आधार पर बँटे हुए हैं और बेगूसराय इससे अछूता नहीं है। 

बेगूसराय के भूमिहार और मुसलिम मतदाता इस क्षेत्र के उम्मीदवारों की किस्मत तय करने में सबसे ज़्यादा निर्णायक भूमिका अदा करेंगे।

क्या सोच रहे भूमिहार मतदाता 

इस बात को जानने और समझने के लिए जब मैं बेगूसराय पहुँचा तो स्थिति समझने में बहुत देर नहीं लगी। बरौनी रेलवे स्टेशन से उतरकर मैंने सिमरिया में रात बिताने की सोची। सिमरिया 2 पंचायतों में बाँटा गया है। सिमरिया -1 और सिमरिया-2। सिमरिया -1 में लगभग 5,000  वोटर हैं, जिनमें भूमिहारों की आबादी सबसे अधिक है। 

यहाँ के एक पूर्व ज़िला पार्षद से बातचीत हुई और जब मैंने कहा कि आपलोगों ने तो इस सीट को बहुत हॉट बना दिया है तो उनका जवाब था कि बिलकुल नहीं। हम लोगों ने नहीं दिल्ली वालों ने इसे बेवजह हवा दी हुई है, जबकि ज़मीन पर ऐसा कुछ नहीं है। हमने पूछा कि भूमिहार मतदाता क्या सोच रहा है उन्होंने कहा कि 90% भूमिहार बीजेपी को वोट करेगा। 10% में जो कुछ कांग्रेस वाले हैं वह तनवीर हसन को देंगे और इसी में से कुछ वोट कन्हैया को भी मिल जायेगा। 

इसके बाद कन्हैया के गाँव बीहट में जाने का मौक़ा मिला। यहाँ 10 युवा चुनावी चर्चा कर रहे थे। चर्चा के केंद्र में कन्हैया और गिरिराज ही थे। कोई भी लड़का कन्हैया कहकर नहीं बल्कि उन्हें 'कनहैवा' कह कर ही संबोधित कर रहा था। उनकी बात सुनकर लगा कि भूमिहार मतदाताओं ने अपना मत तय कर लिया है और उनका वोट बीजेपी के उम्मीदवार गिरिराज सिंह को मिलेगा। 
अगली सुबह मैं गिरिराज सिंह के रोड शो को सिमरिया घाट से लेकर विभिन्न इलाक़ों में फ़ॉलो कर रहा था तब सिमरिया में हर 10 में से 8 घरों की मुंडेर पर बीजेपी के झंडे लहरा रहे थे। इसके अलावा दिनकर पुस्तकालय में कई भूमिहारों से बातचीत का मौक़ा मिला तो उन्होंने कहा कि कन्हैया को अपने परिवार का भी पूरा वोट नहीं मिलेगा। 

बेगूसराय के मुसलिम कहाँ हैं 

यह बहुत ही ज्वलंत सवाल है। बेगूसराय भ्रमण के दौरान और विभिन्न लोगों से बातचीत के दौरान जो बात हवा में तैर रही थी वह यह कि यहाँ मुसलिम वोटर्स बँटे हुए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि मुसलिमों का बड़ा और निर्णायक तबक़ा महागठबंधन के उम्मीदवार तनवीर हसन के साथ खड़ा है। लेकिन यहाँ मुसलिम वोटर्स को 3 धड़ों में बाँटा जा सकता है। एक तबक़ा वह है, जो सबसे बड़ा है और तनवीर हसन के साथ है। एक दूसरा तबक़ा युवाओं का है, जिसमें कन्हैया का क्रेज है।  इन दोनों के इतर एक बहुत छोटा तबक़ा मुसलिमों का ऐसा है जो 'वेट एंड वॉच' वाली स्थिति में है। यह बौद्धिक तबक़ा है जो यह सुनिश्चित करना चाह रहा है कि भूमिहार का वोट किसे मिलेगा कन्हैया को या गिरिराज को 

यह तबक़ा कन्हैया के साथ जाने की सोच रहा है, लेकिन यदि भूमिहारों की बहुतायत आबादी कन्हैया को वोट करती है और भूमिहार गिरिराज के पक्ष में गए तो ये तनवीर हसन के लिए वोट करेंगे। इनका सीधा मक़सद बीजेपी विरोधी मजबूत ख़ेमे की तरफ़ जाना दिखाई दिया।

यह कहा जा सकता है कि बेगूसराय में सबसे अधिक उहापोह में और विभाजित मैंडेट वाला वर्ग मुसलिम वोटरों का ही हैं।

ओबीसी किसके साथ है

यह बिलकुल साफ़ है कि यादव वोटर्स की 90% आबादी आरजेडी के उम्मीदवार के पक्ष में वोट कर सकती है। बाकी 10 % ‘देशभक्त’ हिन्दू यादव  बीजेपी को भी वोट करेंगे। कुछ वोट कन्हैया को भी मिल सकते हैं। मल्लाहों की जहाँ तक बात है, यह तबक़ा 2014 में पूरी तरह बीजेपी के साथ गया था लेकिन इस बार इसमें भी विभाजन है। मल्लाहों के वोट तनवीर हसन को भी मिल सकते हैं और बीजेपी को भी। कुर्मी, कुशवाहा सहित ओबीसी का दूसरा ब्लॉक बीजेपी की तरफ़ झुका हुआ है।  दलितों के वोट भी बँटते दिख रहे हैं। इसमें से बीजेपी को भी मिलना है, आरजेडी को भी और सीपीआई को भी। दलितों में भी एक तबक़ा तेज़ी से उभरा है जो अपने आपको हिन्दू स्वाभिमान से जोड़ रहा है और उनमें फिर एक बार मोदी सरकार का जबरदस्त क्रेज है। 

संघर्ष में कौन कहाँ है 

ज़मीन पर देखेंगे तो यह समझते देर नहीं लगेगी कि मुक़ाबले में गिरिराज सिंह और तनवीर हसन ही हैं। जीत इन दोनों में से ही किसी की होने की उम्मीद है, यह बात बीजेपी के लोग भी और आरजेडी के लोग भी मान रहे हैं। सिर्फ़ ये दोनों ही नहीं, सामान्य मतदाता भी यह निश्चित तौर पर मान रहे हैं कि मुक़ाबला तनवीर हसन और गिरिराज सिंह के ही बीच है। दबी जुबान से सीपीआई के कार्यकर्ता भी यह मानकर चल रहे हैं। 

सीपीआई क्या सोच रही है 

कहा जा रहा है कि सीपीआई को यह अहसास है कि वह हार-जीत की दौड़ से बाहर हो चुकी है। शुरुआत से ही उसकी हताशा साफ़ देखी जा सकती है और ये संघी स्टाइल में काम करते दिख रहे हैं। आज से 15 दिन पहले किसी शातिर न्यूज़ पोर्टल का हवाला देते हुए सीपीआई के लोगों ने लिख दिया कि तेजस्वी ने अपने बयान में सीपीआई उम्मीदवार के समर्थन की बात कही है। जबकि यह पूरी तरह फ़ेक था। एक और हास्यास्पद स्थिति देखने को मिली जब कुछ कॉमरेड सोशल मीडिया पर तनवीर हसन की कन्हैया के साथ की किसी पुरानी तसवीर का हवाला देते हुए लिख रहे थे कि तनवीर साहब ने कन्हैया को समर्थन कर देने का फ़ैसला किया है अब सीपीआई यह काम कर रही है कि ख़ुद तो नहीं जीत सकते लेकिन मुसलिम वोटर्स पर फ़ोकस कर तनवीर हसन को हरा दो। इससे बीजेपी का काम मुफ़्त में आसान हो रहा है और निश्चित रूप से आरजेडी के उम्मीदवार के लिए मुश्किल खड़ी हो रही है। 

अंतिम रूप से क्या होगा 

यदि मुसलिम मतों का विभाजन नहीं रुका तो बीजेपी उम्मीदवार का जीतना आसान और लगभग तय हो जाएगा लेकिन अंतिम समय में मुसलिम वोटर्स ने एक साथ होकर अगर महागठबंधन के पक्ष में वोट करने का निर्णय ले लिया तो पासा महागठबंधन की तरफ भी पलट सकता है भले ही जीत का मार्जिन बेहद कम हो। लेकिन अगर कन्हैया मुसलिम मतों के विभाजन में सफल हो गया तो भी उसके लिए दूसरे स्थान पर आना मुश्किल ही होगा। हाँ, इस स्थिति में वह आरजेडी उम्मीदवार को हरवाकर बीजेपी के गिरिराज सिंह की जीत ज़रूर सुनिश्चित करेंगे। 

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