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मार्च 1948 में जिन्ना की ढाका यात्रा में ही पड़ गई थी बांग्लादेश की नींव?

मार्च 1948 में जिन्ना की ढाका यात्रा में ही पड़ गई थी बांग्लादेश की नींव?

मुहम्मद अली जिन्ना ने मार्च 1948 में ढाका यात्रा के दौरान बांग्ला और उर्दू भाषा को लेकर जो कुछ कहा था, वहीं से विवाद की शुरुआत हुई। क्या इस कारण ही बांग्लादेश का निर्माण हुआ?

क्या बांग्लादेश की नींव मार्च 1948 में ही पड़ गई थी जब पाकिस्तानी राष्ट्र के निर्माता मुहम्मद अली जिन्ना ने बांग्लाभाषियों के बीच जाकर उनके सामने कह दिया था कि उनकी भाषा उर्दू और सिर्फ उर्दू होगी? 

बांग्लादेश के निर्माण के 50 साल पूरे होने पर ये सवाल बंगालियों को ही नहीं, मातृ भाषा को प्यार करने वाले हर व्यक्ति के मन में कौंधती होगी। इसके साथ ही यह सवाल पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों को भी परेशान कर रहा होगा कि आख़िर क्या हुआ कि मुसलमानों के लिए अलग देश बनने के 24 साल बाद ही मुसलमानों का एक हिस्सा उससे टूट कर अलग हो गया। 'टू नेशन थ्योरी' आखिर इस तरह और इतनी जल्दी क्यों पिट गई?

जिन्ना की ढाका यात्रा

मुहम्मद अली जिन्ना 19 मार्च 1948 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की राजधानी ढाका पहुँचे। उन्होंने 21 मार्च को ढाका रेस कोर्स मैदान में एक जनसभा को संबोधित किया। उन्होंने उसमें बहुत ही कड़े शब्दों में उन लोगों को आगाह किया जो उनके शब्दों में 'तोड़फोड़ की कार्रवाई में लिप्त थे और पाकिस्तान को छिन्न-भिन्न करने की साजिश रच रहे थे।'

क्या कहा था जिन्ना ने?

क़ायदे आज़म ने 24 मार्च, 1948 को ढाका विश्वविद्यालय के कर्ज़न हॉल में छात्रों को संबोधित किया। उनका यह भाषण इस लिहाज़ से ऐतिहासिक था कि उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि 'तमाम पाकिस्तानियों की भाषा उर्दू और सिर्फ उर्दू ही हो सकती है।' 

उन्होंने कहा, 

बोलचाल की आम भाषा सिर्फ एक हो सकती है, राज्यों और समुदायों के बीच संपर्क की सिर्फ एक भाषा हो सकती है और वह भाषा सिर्फ उर्दू हो सकती है और कोई भाषा नहीं।


मुहम्मद अली जिन्ना, 24 मार्च, 1948 का बयान

सिर्फ उर्दू?

उन्होंने कहा, "राज्य की भाषा सिर्फ उर्दू हो सकती है, यह वह भाषा है जिसे दसियों लाख मुसलमानों ने सींचा है, यह वह भाषा है जो पूरे पाकिस्तान में हर हर कोई बोल और समझ सकता है।"

उन्होंने कहा,

और सबसे बड़ी बात तो यह है कि वह भाषा है जिसमें इसलामी संस्कृति और मुसलिम परंपरा समाहित हैं। यह वह भाषा है जो दूसरे मुसलिम देशों की भाषाओं के नज़दीक है।


मुहम्मद अली जिन्ना, 24 मार्च, 1948 का बयान

इसलाम के दुश्मन?

जिन्ना ने कहा कि 'ये बातें पाकिस्तान और इसलाम के दुश्मनों को मालूम हैं और इसलिए वे लोग इसके जरिए पाकिस्तान के कुछ लोगों को उकसाना चाहते हैं और ग़ैर बांग्लाभाषियों व बंगालियों के बीच भेद पैदा करना चाहते हैं, इसलिए इस विषय पर मतभेद करने और आन्दोलन का कोई औचित्य नहीं है।' 

उन्होंने इसके साथ ही कहा,

मैं साफ कर दूँ, किसी तरह की गलतफ़हमी न रहे, यदि इस देश के सभी हिस्से एक साथ आगे बढ़ना चाहते हैं तो उनकी एक ही भाषा होनी चाहिए और वह सिर्फ उर्दू ही हो सकती है।


मुहम्मद अली जिन्ना, 24 मार्च, 1948 का बयान

सही थे जिन्ना?

जिन्ना अगले दिन ही लौट गए। उसके बाद उन्होंने 28 मार्च को रेडियो पर पूरे पाकिस्तान को संबोधित किया। उसमें उन्होंने वही बातें दुहराई जो उन्होंने ढाका में कही थीं। 

विश्लेषकों का कहना है कि जिन्ना की बात सिरे से ग़लत थी। भारत से पाकिस्तान गए लोगों की भाषा उर्दू थी और उर्दू बोलने वालों की संख्या तीन प्रतिशत थी। वहां के लोग पंजाबी, सिंधी, पश्तो, दारी वगैरह भाषाएं बोलते थे। सबसे अधिक पंजाबी बोली जाती थी। 

यह बात भी ग़लत थी कि उर्दू मुसलिम देशों की भाषा के करीब थी। फारसी, अरबी, तुर्की वगैरह से लिपि को छोड़ कर उर्दू से कोई समानता नहीं थी।

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भाषा से ही शुरुआत

बांग्लादेश के इतिहास का अध्ययन करने वाले डच प्रोफ़ेसर विलियम वॉन शिंडल ने अपनी किताब 'ए हिस्ट्री ऑफ़ बांग्लादेश' में लिखा कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच शुरुआती विवाद भाषा की वजह से ही हुआ। 

फ़रवरी 1948 में जब असेंबली के एक बंगाली सदस्य ने प्रस्ताव पेश किया कि असेंबली में उर्दू के साथ-साथ बांग्ला का भी इस्तेमाल हो तो तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान ने कहा कि पाकिस्तान उपमहाद्वीप के करोड़ों मुसलमानों की मांग पर बना है और मुसलमानों की भाषा उर्दू है। इसलिए यह अहम है कि पाकिस्तान की एक कॉमन भाषा हो, जो केवल उर्दू ही हो सकती है। उसके बाद जिन्ना की ढाका यात्रा ने बंगालियों की बची खुची उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया और उन्हें लगने लगा कि उनके साथ न्याय नहीं हो सकता।

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बांग्ला भाषा को लेकर ढाका में प्रदर्शन करते हुए लोग

भाषा आन्दोलन

बांग्ला भाषा के पक्ष में आन्दोलन ज़ोर पकड़ने लगा। जनवरी 1952 में यह चरम पर था और 27 जनवरी को सिर्फ उर्दू भाषा के आदेश के ख़िलाफ़ ढाका में हड़ताल रखी गई। इसे सख़्ती से कुचला गया। यह आन्दोलन फरवरी में एक बार फिर भड़का। 

ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने 19 फरवरी 1952 को एक बार फिर हड़ताल रखी, बड़े पैमाने पर धर-पकड़ हुई और सैकड़ों छात्रों को गिरफ़्तार किया गया। 

विश्वविद्यालय के छात्रों ने 21 फरवरी को परिसर और मेडिकल कॉलेज में प्रदर्शन किया और गिरफ़्तार छात्रों को रिहा करने और बांग्ला भाषा को मान्यता देने की माँग की। 

पुलिस ने ढाका विश्वविद्यालय के दरवाजे पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर गोलियाँ चलाईं। इस गोलीबारी में अब्दुस सलाम, रफ़ीक उद्दीन अहमद, सफीउर रहमान, अब्दुल बरकत और अब्दुल जब्बार की मौके पर ही मौत हो गई। बड़ी तादाद में दूसरे छात्र गंभीर रूप से घायल हुए।

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ढाका में बना भाषा शहीद स्मारक

इस दिन का महत्व इससे समझा जा सकता है कि यूनिसेफ़ ने 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस घोषित कर रखा है। 

दुनिया के तमाम बंगाली 'एकुशे फ्रेबुआरी दिवस' हर साल मनाते हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि बांग्लादेश की नींव मुहम्मद अली जिन्ना के उस ऐतिहासिक भाषण के साथ ही पड़ गई थी। उसके बाद जो कुछ हुआ, वह इतिहास बन चुका है। 

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