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भारतीय कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली विदुषी कपिला वात्स्यायन नहीं रहीं

भारतीय कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली विदुषी कपिला वात्स्यायन नहीं रहीं

भारतीय शास्त्रीय नृत्य, कला, स्थापत्य और कला इतिहास को अंतरराष्ट्रीय कला मंच पर स्थापित करने वाली कपिला वात्स्यायन नहीं रहीं। उन्होंने दिल्ली स्थित अपने निवास पर 92 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। उनके भाई और कवि व आलोचक केशव मलिक ने इसकी पुष्टि की है।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य, कला, स्थापत्य और कला इतिहास को अंतरराष्ट्रीय कला मंच पर स्थापित करने वाली कपिला वात्स्यायन नहीं रहीं। उन्होंने दिल्ली स्थित अपने निवास पर 92 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। उनके भाई और कवि व आलोचक केशव मलिक ने इसकी पुष्टि की है।

25 दिसंबर, 1928 को पंजाबी पारंपरिक परिवार में जन्मी कपिला जी अथक परिश्रम और बहुआयामी प्रतिभा के बल पर विश्व कला जगत में अपने लिए जगह बनाई। उनके लिए कला एक नदी के समान थी जिसका प्रवाह जारी रहता है, पर नदी अपना रास्ता बदलती रहती है।

कला यात्रा

उन्हें मुख्य रूप से नृत्य कला के लिए याद किया जाता है, जहां उन्होंने न केवल शीर्ष के गुरुओं से कई तरह का नृत्य सीखा, बल्कि उसमें बदलाव किया, विश्व पटल पर उसे पेश किया और उसकी समीक्षा को नया आयाम दिया।

कला के प्रति कपिला वात्स्यायन ने अच्छन महाराज से कथक, गुरु अमोबी सिंह से मणिपुरी और मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई से भरतनाट्यम सीखी। उन्होंने दिल्ली के फ़िरोज शाह कोटला ग्राउंड पर 1945 में हुए पहले नृत्य महोत्सव में कथक प्रस्तुत किया था।

कला लेखन

वह बाद में पश्चिमी नृत्य शैली की ओर मुड़ी, पर वहां उनका मन नहीं रमा और वह एक बार फिर भारतीय नृत्य की ओर लौटीं। उन्होंने भारतीय नृत्य कला के मूर्त और अमूर्त को जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने नृत्य की विभिन्न मुद्राओं का ज्यामितीय और गणितीय अध्ययन किया और कई लेख लिखे, जिन्हें कला जगत की धरोहर समझा जाता है। उन्होंने कला पर 20 किताबें लिखीं, जिनमें कुछ हैं, द स्क्वैयर एंड द सर्कल ऑफ़ इंडियन आर्ट्स, भारत : द नाट्य शास्त्र, डान्स इन इंडियन पेंटिग, क्लासिकल इंडियन डान्स इन लिट्रेचर एंड आर्ट्स और ट्रांसमिशन्स एंड ट्रांसफ़ॉर्मेशन्स लर्निंग थ्रू द आर्ट्स इन एशिया

उन्होंने जयदेव की कविताओं पर पी एचडी की थी और गीत गोविंद पर शोध किया था।

कपिला वात्स्यायन को कमलादेवी चट्टोपाध्याय और रुक्मिणी देवी अरुंडेल जैसे कला मर्मज्ञों का सानिध्य मिला था। वह इंदिरा गांधी सेंटर फ़ॉर आर्ट्स के संस्थापकों में एक थीं। वह सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ टिबेटन स्टडीज़, सेंटर फ़ॉर कल्चरल रिसोर्स एंड ट्रेनिंग और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर से जुड़ी हुई थीं।

राज्यसभा

उन्हें 2006 में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया, पर उन्होंने एक विवाद के कारण जल्द ही इस्तीफ़ा दे दिया उन्हें 2007 में एक बार फिर राज्यसभा भेजा गया। उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 

हिन्दी के प्रख्यात छायावादी कवि हीरानन्द सच्चिदानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' से उनका विवाह हुआ, लेकिन दोनों 1969 में अलग हो गए।

मशहूर लेखक अशोक वाजपेयी ने कपिला वात्स्यायन की मृत्यु पर दुख जताते हुए अपने फ़ेसबुक पेज पर लिखा, 'एक महान विदुषी, तीक्ष्ण बुद्धि, रचनात्मक व्यक्ति और महान संस्था निर्मात्री कपिला वात्स्यायन की मृत्यु पर मैं बेहद दुखी हूं। भारत की कला जगत ने एक पुरोधा खो दिया है, वह कला, सोच और कल्पना को जोड़ने वाली अथक व्यक्तित्व थीं'

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