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रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन से किसका भला होगा ? 

रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन से किसका भला होगा ? 

इस साल गेहूं का रेकॉर्ड उत्पादन होने की उम्मीद है लेकिन किसानों को उससे क्या फायदा होगा। सरकार की नीतियां क्या हैं, वरिष्ठ पत्रकार हरजिंदर ने उसी तरफ इशारा किया है।

किसानों की मेहनत एक बार फिर रंग लाई है। इस बार गेहूं का उत्पादन पिछले सारे रिकार्ड तोड़ने जा रहा है। सरकारी अनुमान पर अगर भरोसा किया जाए तो इस बार देश में गेहूं का उत्पादन 44.4 लाख टन तक बढ़ सकता है। 

पिछले साल गर्मी का मौसम जल्दी आ टपकने के कारण गेंहूं के उत्पादन में काफी कमी आई थी। इस थोड़ी सी कमी ने ही बाजार को काफी प्रभावित किया था और पिछले दिनों बाजार में जो गेहूं के दाम बढ़े हैं, उसके पीछे एक कारण यह भी था। और इसी वजह से सरकार के गेहूं के निर्यात पर पाबंदी भी लगानी पड़ी। इस बार शायद ऐसा न हो। लेकिन असल सवाल यह है कि क्या इसका किसानों को कोई सीधा फायदा मिल सकेगा?

बहुत सी फसलों के मामले में हमने देखा है कि अधिक उत्पादन के बाद बाजार में उस जिंस के दाम टूट जाते हैं और बढ़ा हुआ उत्पादन किसानों के लिए फायदे के बजाए घाटे का सौदा हो जाता है। आलू और प्याज जैसी फसलों में तो यह हर कुछ साल बाद होता है।

लेकिन गेहूं का मामला इससे थोड़ा अलग है। देश के बहुत से हिस्सों में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर इसकी सरकारी खरीद होती है। जहां यह व्यवस्था है वहां किसानों के सामने बाजार भाव टूटने का डर नहीं रहता। लेकिन बिहार जैसे राज्यों में जहां सरकारी खरीद का पक्का इंतजाम नहीं है या उन जगहों पर जहां खरीद का इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है, वहां बाजार भाव टूटेगा और किसान घाटे में रहेंगे। 

पिछले दिनों गेहूं के दाम खुले बाजार में जिस तरह तेजी से बढ़े उससे ऐसे किसानों ने भी एक उम्मीद बांधी थी कि नई फसल आने पर इस बार शायद कुछ बेहतर दाम मिल जाएं। लेकिन गेहूं के बढ़े दामों ने खाद्य मुद्रास्फीति को बहुत तेजी से बढ़ा दिया था। जिसे नियंत्रित करने के लिए सरकार ने अपने स्टाक से 30 लाख टन गेहूं खुले बाजार में लाने का फैसला किया। इससे मुद्रास्फीति में तो थोड़ी सी कमी आने की उम्मीद बांधी जा रही है लेकिन किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया।

गेहूं के अधिक उत्पादन और किसानों की कमाई पर केंद्रीय कृषि उत्पादन मूल्य आयोग की एक रिपोर्ट काफी महत्वपूर्ण है। आयोग ने पिछले 50 साल में किसानों की आमदनी पर विस्तृत अध्ययन किया है। हरित क्रांति शुरू होने के बाद से 1920 तक। यही वह दौर है जब गेहूं का उत्पादन काफी तेजी से बढ़ा। यह अध्ययन पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में किया गया है।

इस अध्ययन में ऐसे साल की गणना की गई जिनमें किसानों को लागत यानी सी-टू से तीस फीसदी अधिक आमदनी हुई। इस दौरान पंजाब में सिर्फ साल साल ही ऐसे थे जब किसानों की आमदनी लागत से तीस फीसदी अधिक हुई। बाकी प्रदेशों में तो इसकी संख्या और भी कम रही। उत्तर प्रदेश में तो सिर्फ एक ही साल ऐसा हुआ।

यह हालत तब है जब न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार सी-टू से 50 फीसदी अधिक आमदनी पर सभी सरकारें अपनी सहमति जताती रही हैं। और वर्तमान सरकार तो खैर किसानों की आमदनी दुगनी करने की बात करती रही है। 

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